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साहित्य जगत

मुक्तिबोध की तरह अंधेरे के कव‍ि थे सकलदीप सिंह

प्रख्‍यात कवि एवं आलोचक सकलदीप सिंह के गोलोकवासी होने पर कोलकाता में उनकी याद में एक शोक सभा का आयोजन किया गया. शोकसभा में सकलदीप को श्रद्धांजलि देने के लिए साहित्‍य जगत के तमाम कथाकार, आलोचक व कवि जुटे. जिसमें सकलदीप के जीवन से जुड़े सभी तथ्‍यों एवं पहलुओं को याद किया गया. पेश है डा. अभिज्ञात की रिपोर्ट-  एडिटर


[caption id="attachment_2355" align="alignleft" width="99"]सकलदीप सिंहसकलदीप जी[/caption]प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से कवि-आलोचक सकलदीप सिंह की स्‍मृति में कोलकाता में जनसंसार के सभाकक्ष में एक शोकसभा का आयोजन किया गया। जिसमें साहित्य की दुनिया से जुड़े लोगों ने सकलदीप सिंह के योगदान को याद किया। कवि अरुण कमल ने कहा कि सकलदीप सिंह से मेरी कई मुलाकातें हुई हैं और मैं उनकी रचनाशीलता को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। साहित्य में सकलदीप सिंह का अवदान सराहनीय है। आलोचक डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि वे अच्छे कवि ही नहीं अच्छे गद्यकार भी थे। वे हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी साहित्य के भी अच्छे ज्ञाता थे।

 

सकलदीप सिंह

प्रख्‍यात कवि एवं आलोचक सकलदीप सिंह के गोलोकवासी होने पर कोलकाता में उनकी याद में एक शोक सभा का आयोजन किया गया. शोकसभा में सकलदीप को श्रद्धांजलि देने के लिए साहित्‍य जगत के तमाम कथाकार, आलोचक व कवि जुटे. जिसमें सकलदीप के जीवन से जुड़े सभी तथ्‍यों एवं पहलुओं को याद किया गया. पेश है डा. अभिज्ञात की रिपोर्ट-  एडिटर


सकलदीप सिंह

सकलदीप जी

प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से कवि-आलोचक सकलदीप सिंह की स्‍मृति में कोलकाता में जनसंसार के सभाकक्ष में एक शोकसभा का आयोजन किया गया। जिसमें साहित्य की दुनिया से जुड़े लोगों ने सकलदीप सिंह के योगदान को याद किया। कवि अरुण कमल ने कहा कि सकलदीप सिंह से मेरी कई मुलाकातें हुई हैं और मैं उनकी रचनाशीलता को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। साहित्य में सकलदीप सिंह का अवदान सराहनीय है। आलोचक डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि वे अच्छे कवि ही नहीं अच्छे गद्यकार भी थे। वे हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी साहित्य के भी अच्छे ज्ञाता थे।

 

 

श्रीहर्ष ने कहा कि अपने दौर में सकलदीप सिंह, अवधनारायण सिंह एवं विमल वर्मा की त्रयी साहित्य में बेहद सक्रिय थी। सकलदीप जी अंतर्मुखी व्यक्ति थे लेकिन जब बोलते थे तो गहरे आशय के साथ। उन्हें साठ के दौर में साहित्य जगत में व्यापक स्वीकृति मिली हुई थी। वे समस्याओं से जूझने वाले रचनाकारों में से एक थे। नकली आजादी और मोहभंग के साठ के दौर की आइसोलेशन की मानसिकता उनकी कविताओं में व्यक्त हुई है।

आलोचक कथाकार डॉ.शरणबंधु ने कहा कि सकलदीप सिंह की कविताओं को पढ़कर मुक्तिबोध की बार-बार याद आती है। सकलदीप सिंह भी उन्हीं की तरह अंधेरे के कवि हैं। आजादी के मोहभंग के कारण जो बदहवास और बेगानी पीढ़ी पैदा हुई, वे भी उन्हीं में से थे। उनकी कविता है ‘जैसे तैसे जी रहा हूं’, इसी को सम्बोधित है। ‘यह जो जैसे तैसे जीने की स्थिति है’, रसिया के सपने का बिखर जाना है, अपने देश का खोखला प्रजातंत्र है, इन सबको लेकर उनकी कविता अलग ढंग से सोच रही थी। उनकी कविता आस्थाहीन आदमी की आवाज ही नहीं उसकी चीख है। वह व्यक्ति जो मनुष्य की तरह जीना चाहता है, निराशा की स्थिति में बोहेमियन बन गया। 1960 की हंग्री पीढ़ी, श्मशानी पीढ़ी, जिससे राजकमल चौधरी आदि जुड़े रहे, उनकी कविताएं एब्सर्ड स्थितियों की कविता है। उसकी एक झलक उनकी क्षेपक की एक कविता मेरी पृथ्वी लौटा दो में देखी जा सकती है, जिसमें फंतासी का प्रयोग किया गया है। सकलदीप सिंह एक नयी पृथ्वी की तलाश के कवि हैं। अंधेरे के इस कवि ने सबसे अधिक प्रकाश छिपाये रखा है।

आलोचक परशुराम ने कहा कि मेरी उनसे व्यक्तिगत अंतरंगता नहीं थी, लेकिन सेंट्रल वाला कॉफी हाउस जब तक चलता रहा मेरी अक्सर वहां उनसे मुलाकात होती रही। मैं अपनी बात अपने ढंग से रखता, वे भी अपनी बात अपने तरीके से कहते थे। वे अपने निजी जीवन और कष्ट की चर्चा किसी से नहीं करते थे। रचनात्मक धरातल पर ही बातें होतीं। कविताओं के अलावा उन्होंने गद्य भी काफी लिखा है। उनमें नयापन मिलता था। अपनी पत्रिका के लिए मैंने उनसे निर्मल वर्मा के विजन पर लिखवाया। हालांकि मुझे जहां उनसे असहमति थी मैंने अपने सम्पादकीय में उसका उल्लेख किया। मेरे कहने पर उन्होंने पंचदेव पर भी लिखा था। वे गीतों के विरोधी थे, लेकिन स्वयं गीत गुनगुनाते थे और गाते भी थे। हालांकि गीतों के सम्बंध में मैं उनसे लम्बी बात करना चाहता था किन्तु संयोग नहीं जुटा।

गीतेश शर्मा ने कहा कि साहित्य की दुनिया में एक दूसरे से सुख दुख से वास्ता रखने की प्रवृत्ति इधर कम होती जा रही है, जो दुख का विषय है। यह संतोष का विषय है कि सकलदीप सिंह जैसे रचनाकार की शोक सभा में महानगर के कई रचनाकार उपस्थित हैं। कथाकार सिद्धेश ने उनसे जुड़े निजी संस्मरणों की चर्चा की। कथाकार विमलेश्वर ने कहा कि जब तक वे जीवित थे, हमने उनके लिखे को वह महत्व नहीं दिया जिसके वे हकदार थे, लेकिन अब लगता है कि हमने एक बड़ा रचनाकार खोया है।

कथाकार विजय शर्मा ने कहा कि 1980 के दौर में मैं कोलकाता में रचनाकारों के सान्निध्य में आया। उन दिनों रचनाकारों में एक बौद्धिक बेचैनी थी। मुझे नहीं मालूम था कि भविष्य में इसे कोलकाता का स्वर्णयुग कहा जाने लगेगा। उन्हीं दिनों साहित्यिक अड्डों पर मेरी सकलदीप सिंह से भी मुलाकात हुई। उनके लेखों और गोष्ठियों में उनकी बातों को सुनकर मुझे सुखद आश्यर्य भी हुआ था कि हिन्दी में भी संरचनावाद जैसे विषय पर बात हो सकती है। वे मानते थे कि साहित्य में अध्ययन से उपजी समझदारी भी आवश्यक है, इसके बगैर ज्यादा दूरी तय कर पाना मुमकिन नहीं है। वे मानते थे कि रचना संवेदना के आधार पर होती है इसलिए विषय वस्तु से एक दूरी बनाकर रखनी चाहिए। वरना रचनाकार खुद पार्टी हो जाता है। वह जज नहीं कर सकता। रचनाकार को विषयवस्तु में इन्वाल्व नहीं होना चाहिए। यथार्थ शब्दों की जगलरी है। चित्रांकन से व्यू लिमिटेड हो जाता है। फल देखने में तो ठीक लग सकता है किन्तु उसके भीतर की सडऩ को चित्र नहीं दर्शा सकता।

डॉ.अभिज्ञात ने कहा कि वे मानते थे कि रचनाकार को एक्टीविस्ट नहीं होना चाहिए। स्वयं नक्सलबाड़ी आंदोलन का वे उदाहरण देते थे कि उससे जुड़े कई रचनाकार एक्टीविस्ट बन गये। फिर रचनाशीलता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता नहीं रह गयी। लेखक को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसका मोर्चा लेखन ही है। लेखक क्रांति के लिए वातावरण तो तैयार कर सकता है मगर उसके बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है। सकलदीप जी नेशनल लाइब्रेरी में लम्बे अरसे तक जाकर पढ़ते रहे। अंग्रेजी व पाश्चात्य साहित्य उनके अध्ययन का केन्द्र था और उन्होंने आधुनिकता क्या है, संरचनावाद क्या है, जैसे विषयों पर लिखा और हिन्दी लिखने पढऩे वालों को साहित्य की नयी प्रवृत्तियों से प्रशिक्षित करने का भी कार्य किया। वे किसी के साथ बातचीत के दौरान यह ताड़ लेते थे कि उसका पढऩे लिखने से कितना ताल्लुक है।

उन्हें यदि यह पता लग जाता था कि सामने वाला उनकी बातों की रेंज को नहीं समझ पायेगा तो वे चुप हो जाते थे। इसलिए लोगों को वे अंतर्मुखी लगते थे। साहित्य के गूढ़ मुद्दों पर उनकी पैनी निगाह रहती थी। उन्होंने कहा कि उनकी मृत्यु के एक डेढ़ वर्ष पूर्व उनसे बातचीत पर एक आलेख मैंने लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैंने लिखना छोड़ दिया है और अब मैं साहित्य से रिटायर हो चुका हूं। तो उस लेख पर कुछ तीखी प्रतिक्रियाएं हुई थीं। लेख के प्रकाशित होने के कुछ दिन बाद ही वे कोलकाता से अपने बेटे के पास गुवाहाटी चले गये थे, वहां मैंने लेख पर लोगों की प्रतिक्रियाओं से अवगत कराया तो उन्होंने कहा था मैं ‘पोयम्स इन बोंस’ का कवि हूं। मुझे जो कुछ कहना था मैंने अपनी रचनाओं में कह दिया है। अब लोगों की यह जिम्मेदारी है कि मेरी कही बातों की तह तक पहुंचे।

डॉ.अभिज्ञात ने बताया कि उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें से आखिरी तीन मैंने प्रकाशित किये हैं। उनके कई लेख हैं, जो या तो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं या अप्रकाशित किन्तु पुस्तकाकार कोई गद्य कृति नहीं आयी है। उनके पुत्र से सम्पर्क नहीं हो पा रहा है जिससे यह पता चल सके कि उनकी रचनाएं महफूज हैं या नहीं। देर सबेर उनके लिए प्रकाशक मिल ही जायेगा।

स्‍मृति सभा में अरुण कमल, डॉ.शंभुनाथ, डॉ.शरणबंधु, गीतेश शर्मा, राज मिठौलिया, श्रीहर्ष, सिद्धेश, परशुराम, विमलेश्वर, नूर मुहम्मद नूर, विजय शर्मा, कुसुम जैन, सेराजखान बातिश, डॉ.अभिज्ञात, प्रेम कपूर, अमिताभ चक्रवर्ती, कुशेश्वर, आलोक शर्मा, जितेन्द्र जितांशु, राजेन्द्र केडिया ने उन्हें अपनी पीढ़ी का अग्रणी रचनाकार बताया एवं उनसे जुड़ी स्मृतियों को ताजा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता विमल वर्मा ने की।

लेखक डा. अभिज्ञात कोलकाता पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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