यह एक कहानी है, जिसे रूपक के रूप में प्रस्तुत किया गया है. कहानी में अखबारों में होने वाली घटना को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है. कहानी का कालक्रम पंजाब के किसी अखबार को बनाया गया है. कहानीकार जय प्रताप सिंह ने अपने कहानी के माध्यम से अखबारों में चलने वाली राजनीति, मालिकों के चरित्र और स्टॉफ के साथ होने वाली परेशानियों को भी रूपक के माध्यम से उकेरने का प्रयास किया है – एडिटर
: बाबूजी अखबार के दफ्तर में चपरासी, उप संपादक, संपादक और अन्य कर्मचारियों के ऊपर जुर्माना लगाते थे : जय कंप्यूटर पर बैठकर खबरों की दुनिया में खोया हुआ था। उसकी उंगलियां तेजी के साथ की बोर्ड पर दौड़ रही थीं। उसके अगल बगल तीन आदमी उसे जोर-जोर से उसे हिला रहे थे। उसमें से एक गोरा-चिट्टा नाटे कद का आदमी हाथ में पीली पर्ची का बंडल और कांख में दबाए एक अखबार को लिए खड़ा था। वह लगातार बोलता जा रहा था। अचानक जय गुस्से में आकर की बोर्ड पर जोर से हाथ पटका और खड़ा हो गया। तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? चपरासी हो तो अपनी औकात में रहो। तुम्हें जुर्माना ही तो चाहिए…। अभी ले लेना। मैं कोई अपराधी थोड़े हूं कि मुझे पकडऩे के लिए चार लोग खड़े हो।
कम्प्यूटर बंद करो और बाबूजी के पास चलो। मैनेजर ने भी अपनी आवाज को गति देते हुए बोला। तुम पहले 100 रुपये की पर्ची काटो फिर बात करना। बगल में खड़े तीसरे आदमी ने उसके हाथ में पेन पकड़ाते हुए कहा। यह कोई गल्ती नहीं है। सिर्फ एक शब्द ही तो गलत हुआ है और उसका 200 रुपया जुर्माना। मैं नहीं दूंगा- जय ने जवाब दिया। चलो बाबूजी के पास। चपरासी बाबूजी के आफिस की ओर जाते हुए कहा। चपरासी आगे-आगे और उसके पीछे-पीछे दोनों आदमी जय को पकड़े एक बड़े से हाल की ओर लिए जा रहे थे। बीस फुट लंबा और पंद्रह फुट चौड़ा एक बड़ा सा हाल था। उसके एक किनारे एक लंबा चौड़ा मेज रखा हुआ था। किनारे-किनारे सोफा और कुर्सियां करीने से रखी हुई थीं। उन कुर्सियों पर जालंधर शहर की मानी जानीं हस्तियां सफेद कुर्ता-पाजामा पहने माथे पर लंबा सा तिलक लगाये गुपचुप बैठे हुए थे। बीच बीच में मुस्करा भी दिया करते थे।
वहां पर रखा मेज फाइलों के बोझ तले दबा जा रहा था। उन्हीं फाइलों के बीच से माथे पर तिलक, गले में रामनामी दुपट्टा डाले बाबूजी ने अपना थोबड़ा बाहर निकाला। बाबूजी के सिर के बाल लगभग उजड़ा चमन हो चुका था, लेकिन उसकी भरपाई मूंछें पूरी कर दे रही थीं। वह हर समय सफेद वस्त्रों को ही धारण करते थे। बाबूजी बहुत बड़े धार्मिक किस्म के व्यक्ति थे। वे हर समय अपने जैसे ही धार्मिक लोगों के बीच घिरे रहते थे। यह बात अलग है कि इन धार्मिक लोगों पर लोग मुंह पीछे अपराधी और बलात्कारी होने का आरोप भी लगाते थे। लेकिन इन लोगों पर केस दर्ज होना तो दूर पुलिस पास तक फटकती नहीं थी। कुल मिला जुलाकर बाबूजी धर्म के ठेकेदारों से घिरे रहते थे। बाबूजी कुर्सी पर जब एक बार पसर जाते थे तो फिर जल्दी उठना नहीं चाहते, क्योंकि उनका अग्रभाग इस कदर बढ़ा हुआ था कि वह हमेशा बाहर आने को बेताब रहता था।
बाबूजी बिलकुल अलग किस्म के धार्मिक व्यक्ति थे। वह कभी भी अपनी जेब से दान नहीं करते थे। बल्कि उनके दान करने का तरीका ही कुछ अलग होता था। बाबूजी अखबार के दफ्तर में चपरासी, उप संपादक, संपादक और अन्य कर्मचारियों के ऊपर जुर्माना लगाते थे। उस जुर्माने की रकम को धार्मिक कामों में लगाते थे। उनकी सबसे बड़ी जो महानता थी, वह यह कि कर्मचारियों के खून पसीने से निचोड़े गये पैसों को शहीद फंड में भिजवा देते थे। इस शहीद फंड से जम्मू कश्मीर में हो रहे शहीद परिवारों के पास ट्रक के ट्रक रसद पहुंचाते थे। जिस समय रसद का ट्रक जाना होता था, उस समय उप संपादकों के कान खड़े हो जाते थे। बढ़ी हुई सेलरी और ओवर टाइम तो हर माह जुर्माने में कट जाता था।
बाबूजी इन सबके बावजूद दया के मूर्ति थे। इस बात का सबूत उस समय मिलता था, जब किसी उप संपादक के पास जुर्माने की रकम देने के लिए जेब में पैसे नहीं हुआ करते थे। उस समय उससे रजिस्टर पर साइन कराकर कर पीली या लाल पर्ची पकड़ा दिया जाता था और वह कैश देने से छुट्टी पा जाता था। अब तो आप सोच रहे होंगे कि ऐसे समय में जेब में पैसा न रहना ही अच्छा है। लेकिन आप इतने चालाक मत बनिए। हमारे महान बाबूजी ऐसे थोड़े महान और दया के मूर्ति थे। वह पैसा वेतन से सूद ब्याज सहित काट लिया जाता था। ऐसा ही कुछ जय के भी साथ होने वाला था।
फाइलों के लगे ढेर के बीच से सिर को ऊपर उठाते हुए दया के मूर्ति बाबूजी ने लालच भरी निगाहों से जय को घूरते हुए कहा- की बात है पुत्तर? तूसी क्या काम है? बाबूजी यह जुर्माने की पर्ची नहीं काट रहा है? कह रहा है कि मेरी गल्ती नहीं है। मैनेजर ने जय का हाथ पकड़ कर उनके पास धक्का देते हुए कहा। तुम क्यों नहीं पर्ची कटा रहे हो। बाबूजी यह हेडिंग गलत नहीं है। आप भी इसको पढ़ लीजिए। जय ने रुआंसे स्वर में जवाब दिया। बाबूजी यह झूठ बोल रहा है। खबर और हेडिंग दोनों गलत है। चपरासी ने जल्दी से अखबार को हाथ में पकड़ाते हुए कहा। वह गलत कह रहा है तो गलत है। तुम पहले पर्ची कटाओ फिर जाओ। बाबूजी ने गुस्से से अखबार को एक तरफ फेंकते हुए कहा और फिर अपनी निगाहें फाइलों के बीच गड़ा दी। कितने की पर्ची कटवानी है? जय ने कहा। तुमने हमारा कीमती समय बर्बाद किया है। अब तुम्हें 300 रुपये की पर्ची कटवानी पड़ेगी। बाबूजी ने फाइलों के बीच खोए खोए ही जवाब दिया। लो पर्ची पर साइन करो। चपरासी ने पर्ची को आगे बढ़ा दिया।
जय अभी पर्ची पर साइन कर ही रहा था कि बाबूजी ने कहा कि तुम काम करो तो आदमी बन जाओगे। हां बाबूजी मैं आदमी बनना चाहता हूं। जबसे यहां पर आया हूं, आदमी रहा ही नहीं। पर्ची हाथ में पकड़े पकड़े जय ने जवाब दिया। अब बताओ तुम क्या हो? तूसी अब फंस गये हो, तुम्हें बताना ही पड़ेगा कि तुम क्या हो। जय अपने आपको तत्काल संभाल लिया।। उसे समझ में आ गया कि यह खूसट बुड्ढा सबसे कहलवाता था कि कहो कि तुम गधे हो। जय गधा नहीं बनना चाहता था। लेकिन कुछ न कुछ तो उसे कहना ही था। जो आप हैं, वही मैं भी हूं। आप लोगों के बीच रह रहा हूं, वही बन गया हूं। उसने दोहराते हुए कहा कि जो आप हैं वही मैं हूं। जोर से बोलो तुम क्या हो? गधा हूं। जय ने गधा शब्द पर जोर देते हुए बोला। थोड़ी देर के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।
बाबूजी जय का चेहरा एकटक देखे जा रहे थे। उनका चेहरा तमतमा उठा। उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए कहा कि लड़का निडर है। हां बाबूजी यह निडर है। मैनेजर ने हां में हां मिलाया। देखो यह बात कंपनी में नहीं जानी चाहिए। किसी से भी मत कहना। मैनेजर की ओर नजर दौड़ाते हुए बाबूजी ने कहा। बाबूजी हम किसी से नहीं कहेंगे। मैनेजर, चपरासी और चीफ ब्यूरों ने दोनों हाथों को जोड़े लगभग कांपते हुए कहा। लो बेटा बर्फी खाओ। बाबूजी ने बर्फी का डिब्बा आगे बढ़ाते हुए कहा। जय ने नियमानुसार मिठाई के डिब्बे में से तीन बर्फी निकाला और पीछे मुड़ गया। उस संस्थान का सबसे बड़ा नियम यह था कि जो 100 रुपये जुर्माना दे उसे एक पीस बर्फी और 300 रुपये देने पर तीन पीस बर्फी दिया जाता था। जय पीछे मुड़ा नहीं कि उलटे पांव ऐसे भागा जैसे कि अभी अभी पुलिस कस्टडी से भागा हो।
वह कंप्यूटर को ऑन किया और सबकुछ भूल कर खबरों की दुनिया में खो गया। कितने की पर्ची कटाए हो? एक उप संपादक साथी ने सवाल किया। तीन सौ रुपये का। फिर वह काम में व्यस्त हो गया। यह कोई एक दिन की बात नहीं थी, बल्कि रोज ही किसी न किसी को जुर्माना देना ही पड़ता था। अभी वह पिछली बातें भूल भी नहीं पाया था कि वही चपरासी, जिसका पढ़ाई से दूर दूर का रिश्ता नहीं था, पीली पर्ची लिए आ धमका। यह खबर तुमने क्यों नहीं लगाई? उसने जागरण अखबार हाथ में पकड़ाते हुए कहा। नहीं लगाई तो क्या? चलो छोटे बाबूजी बुलाए हैं। उसने सीट से उठाते हुए कहा। जय इस बार कोई बहस नहीं किया। क्योंकि बहस करने पर ही उसने 100 रुपये की जगह तीन सौ रुपये अभी अभी देकर आया था।
चपरासी आगे-आगे और वह पीछे-पीछे चल दिया। तुमसे यह खबर क्यों छूट गयी? छोटे बाबूने कहा। सर, यह खबर रिपोर्टर ने मेरे पास नहीं भेजा था। मुझे क्या मालूम कि शहर से 100 किलोमीटर दूर क्या हो रहा है। जय ने जवाब दिया। 200 की पर्ची काटो और चलो। छोटे बाबू ने लगभग झिड़कते हुए कहा। सर अब मैं पर्ची नहीं काट सकता। मेरी पूरी सेलरी ही जुर्माने में चली जाएगी, मैं पंद्रह दिन में बारह सौ रुपया जुर्माना दे चुका हूं। अब नहीं दे सकता। जय ने रोते हुए कहा। नहीं दे सकते तो सीढिय़ों से नीचे उतर जाओ। उसने पर्ची कटाई और रोते हुए वापस अपनी सीट पर आ गया। इस बार पैसा भी दिया और बर्फी भी नहीं मिली। क्योंकि छोटे बाबू जो जुर्माना लगाते थे, उसका बर्फी नहीं मिलता था। बर्फी सिर्फ बड़े बाबूजी ही देते थे।
वह कंप्यूटर पर बैठा-बैठा अपनी किस्मत को रो रहा था कि कहां आ कर मैं फंस गया। यह सब इन्सान नहीं बल्कि हैवान हैं। वह बहुत पहले ही चला जाना चाहता था, लेकिन क्या करे? घर जाने के लिए उसके पास पैसा ही नहीं बचता था। सेलरी तो साढ़े छह हजार थी, लेकिन जुर्माना और पीएफ काटने के बाद चार हजार रुपये हाथ में आते थे। जो मकान का किराया और रोटी में ही खत्म हो जाता था। पीएफ भी मात्र एक बहाना था। वह पैसा कहां जाता था, कुछ पता नहीं। उसका कोई प्रूफ भी नहीं था। जो लोग पांच छह सालों तक काम करते थे, उनमें से किसी किसी को पीएफ कार्ड दे दिया जाता था। एडिटोरियल हेड और मैनेजर अपनी पूरी ऊर्जा बाबूजी को खुश करने में लगा देते थे। वे लोग बारी बारी से सभी उप संपादकों का जुर्माना जानबूझकर लगवाते थे। वे लोग इतने योग्य थे कि अन्य किसी अखबार में कोई उन्हें ट्रेनिंग में भी न रखे। लेकिन पंजाब के इस चर्चित अखबार में बतौर समाचार संपादक और मैनेजर थे।
ऐसी घटनाएं अक्सर सभी के साथ होती थी। समाचार संपादक और मैनेजर भी जुर्माने से अछूते नहीं थे। जुर्माना इसलिए भी काफी आता था क्योंकि यहां पर प्रत्येक उप संपादक से आठ घंटा ही नहीं बल्कि बारह-बारह घंटा गुलामों की तरह खटाया जाता था। ऊपर से प्रत्येक उप संपादक से चार से लेकर आठ-आठ पेज बनवाया जाता था। सहूलियत सिर्फ इतनी थी कि पेज सेट करने के लिए एक पेजनेटर मिलता था।
एक दिन की घटना तो अभी तक नहीं भूला है। हुआ यूं कि जय एक दिन जालंधर सिटी डेस्क पर बैठा था। उसी समय बाबूजी ने उसको अपने पास बुलाया और हाथ से लिखा हुआ एक कागज पकड़ाते हुए कहा कि इसे चार नंबर पेज पर लीड बना लेना। अच्छी तरह से खबर बनाना, यह मेरी खबर है। वह खबर गीता वाटिका मंदिर के प्रधानगी के चुनाव के बारे में था। जय ने उस खबर को अच्छी तरह से पढ़ कर चार नंबर पेज की लीड बनवाने के बाद उसकी प्रूफरीडिंग भी करवाई। खबर चूंकि बाबूजी का था इसलिए उस खबर को काफी अच्छी तरह से पढऩे के बाद ही पेज पर लगाया गया।
सुबह जब अखबार खोला तो उसमें प्रधानगी का चुनाव पांच को, की जगह छपा था कि प्रधानमंत्री का चुनाव पांच को। जय को फिर बाबूजी के सामने पेश होना पड़ा। तूसी तो बलंडर कर दिया है। मेरे पास पांच सौ लोगों का फोन आ चुका है कि कैसे लोगों को भर्ती किए हो। अब तुम्हें दो हजार रुपये जुर्माना देना पड़ेगा। बाबूजी ने गुस्से में कहा। बाबूजी दो हजार रुपये कैसे? एक ही शब्द तो गलत है। बाकी अंदर सब ठीक है। एक शब्द का 100 रुपये ही हुआ। जय ने आत्मविश्वास के साथ कहा। ठीक है 100 रुपये की पर्ची कटवाओ। बाबूजी फिर अपने काम मे व्यस्त हो गये। जय ने पर्ची कटवाया और नियमानुसार एक बर्फी उठाते हुए कमरे से बाहर हो गया। वह बाबूजी की मूर्खता पर काफी खुश था। उसे इस बात पर हंसी आ रही थी कि इस गधे को यह नहीं मालूम कि यह मात्र एक शब्द की गलती नहीं बल्कि एक प्रतिष्ठत अखबार के लिए बलंडर था। वह फिर अपने कामों में जुट गया और बहुत ही जल्द उस कालकोठरी से निकलने के बारे में सोचता रहा।
लेखक जय प्रताप सिंह गाजियाबाद में एक अखबार में सब एडिटर हैं और उन्हें कहानियां लिखने का शौक है.

