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तेरा-मेरा कोना

क्‍या सचमुच आजाद हैं हम!

: सबने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाया होता तो आज देश भ्रष्टाचार का दंश नहीं झेल रहा होता : आज खुला अंबर है। दूर-दूर तक फैला आसमान है और हम आजाद हैं। हम हमेशा इस बात का रोना रोते हैं कि हमने क्या खोया, लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि हमने आजादी के बाद क्या पाया। आज हम पूरी तरह से आजाद हैं। हमारे लिए इससे बड़ी खुशी और फक्र की बात और क्या हो सकती है। याद रखिए ये जश्न मनाने का दिन है, बीती बातों को भुलाने का नहीं। ‘ये मत सोचो कि इस देश ने तुम्हें क्या दिया, बल्कि ये सोचो कि तुमने देश को क्या दिया’  ये पंक्तियां राष्ट्र के लिये हमें बिना किसी शर्त के अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए प्रेरित करती है।

: सबने अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाया होता तो आज देश भ्रष्टाचार का दंश नहीं झेल रहा होता : आज खुला अंबर है। दूर-दूर तक फैला आसमान है और हम आजाद हैं। हम हमेशा इस बात का रोना रोते हैं कि हमने क्या खोया, लेकिन यह कोई नहीं सोचता कि हमने आजादी के बाद क्या पाया। आज हम पूरी तरह से आजाद हैं। हमारे लिए इससे बड़ी खुशी और फक्र की बात और क्या हो सकती है। याद रखिए ये जश्न मनाने का दिन है, बीती बातों को भुलाने का नहीं। ‘ये मत सोचो कि इस देश ने तुम्हें क्या दिया, बल्कि ये सोचो कि तुमने देश को क्या दिया’  ये पंक्तियां राष्ट्र के लिये हमें बिना किसी शर्त के अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए प्रेरित करती है।

आज हम अपने अधिकारों के प्रति तो भली-भांति सजग हैं और अधिकारों के हनन का खतरा पैदा होते ही कई लोकतांत्रित माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या हममें से किसी ने, कभी देश के प्रति अपने फर्ज जानने या फर्ज अदा करने का तनिक भी प्रयास किया। जवाब न में ही होगा। फिर देश के मौजूदा हालात और उसके जिम्मेदारों को भला बुरा कहने का हक आपको किसने दिया।

अगर हम सबने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभाया होता तो आज देश भ्रष्टाचार का दंश नहीं झेल रहा होता। सरकारी मशीनरी ने कायदे से काम किया होता तो आज दंतेवाड़ा की नक्सली बर्बरता देश के सामने कभी नहीं आती। सरकारों ने बयानबाजी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री तो कर ली, लेकिन समस्या तो जस की तस है। पहले ये पता करने की कोशिशें होनी चाहिये कि आखिर नक्सली चाहते क्या हैं, वह व्यवस्था से इतने नाराज़ क्यों हैं। देश पहले से ही आतंकवाद की मार झेल रहा है, ऐसे में कम से कम हम अपने घर में तो नाराज़ सदस्यों को मना ही सकते हैं।

वैसे हम खुशकिस्मत हैं, जो अपने देश में आजादी की सांस ले रहे हैं। आज हमारे देश में हमें विचारों की अभिव्यक्ति की, शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की और कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता है, पर शायद यह भी हमें रास नहीं आ रही है। अपने ही देश पर कीचड़ उछालने से पहले हम जरा उन इस्लामिक देशों के हालात के बारे में तो सोचें, जहां महिलाएं बुर्के के बिना बाहर नहीं निकल सकतीं, जहां कोई खुलेआम अपनी आवाज नहीं उठा सकता। वहां तानाशाही चलती है और उसका विरोध करने वाले को मौत का फतवा सुनाया जाता है। हमारे देश में अभी भी मिट्टी की वही सोंधी महक है, जो राम और कृष्ण, महावीर और बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद, और बापू और सरदार पटेल के समय थी। बस वक्त बदल गया है।

आज हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब कुछ हैं। हमारे धर्म व वेशभूषा भले ही अलग-अलग हैं पर दिलों में एकता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कई तरह की भाषायें, आचार-विचार और रहन-सहने की तब्दीलियां मिलेंगी। लेकिन जो नहीं बदला वो है हमारे भारतीय होने का जज्बा। आज ‘भारतीयता’ का सूत्र हम सभी के दिलों को जोड़े हुए है। हम भारत वासियों के लिये भारत देश नहीं माता है, जिसकी गोद में रहते हुए उसके बच्चे लगातार कामयाबी का झण्डा गाड़ रहे हैं। लेकिन 365 दिनों में से केवल दो दिन ही ऐसे होते हैं, जब हम अपने वतन, अपनी भारत माता को नमन करते हैं।

क्यों न हम आजादी के इस पावन पर्व को उसी जोश व जुनून से मनाएं। जिस जोश से हम दूसरे त्योहार मनाते हैं। सच बताइये क्या देश भक्ति के गीत सुनकर आपके रोयें खड़े नहीं हो जाते। तब ऐसा लगता है कि वाकई देश की आजादी के लिये लोगों ने कितनी कुर्बानियां दी हैं। हमें आजादी विरासत में देकर शहीद हो गये, केवल इसलिये कि हम उस कुर्बानी को महज़ दो दिन याद कर बाकी दिन अपना स्वार्थ साधने में मसरूफ रहें। क्यों न इस बार आजादी की एक नई शुरुआत की जाये, एक नई सोच के साथ। आईए, आज कुछ सोचें अपने वतन के लिए, अपने मुल्क के लिये। हममें से जो जैसा भी है, जहां भी है, अगर अपने देश के काम आ जाए तो ये हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। क्योंकि वक्त सोचने का नहीं, कुछ कर दिखाने का है।

लेखक शैलेन्‍द्र द्विवेदी भोपाल में रिजनल चैनल में कार्यरत हैं.

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