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तुम बहुत गंदी औरत हो!

[caption id="attachment_2363" align="alignleft" width="99"]मनु मंजू शुक्‍ला मंजू [/caption]: क्या पुरुष की यौन इच्छाओं को पूर्ण करना ही नारी है : अनगिनत सवालों ने मुझे कभी परेशान नहीं किया, हर सवाल का उत्तर मैं खोज लेती और अपने आप को उन सवालों के घेरे से बाहर निकाल लेती, पर यह प्रश्न मेरे अंतःकरण को अनगिनत सवालों के मायाजाल में ऐसे फंसा लिया कि मैं अभिमन्यु की तरह अपने आप को चक्रव्यूह में फंसा महसूस करने लगी और तिल तिल घुटने लगी! इस प्रश्न से मेरी अंतरात्मा विचलित होने लगी! इस प्रश्न ने मेरे पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख दिया था! यह प्रश्न एक महिला ने मुझसे तब किया जब मैंने उसके पति का सत्य रूप उसके तथा उस पुरुष के जन्मदाता के सामने रख दिया था!

मनु मंजू शुक्‍ला

मनु मंजू शुक्‍ला

मंजू

: क्या पुरुष की यौन इच्छाओं को पूर्ण करना ही नारी है : अनगिनत सवालों ने मुझे कभी परेशान नहीं किया, हर सवाल का उत्तर मैं खोज लेती और अपने आप को उन सवालों के घेरे से बाहर निकाल लेती, पर यह प्रश्न मेरे अंतःकरण को अनगिनत सवालों के मायाजाल में ऐसे फंसा लिया कि मैं अभिमन्यु की तरह अपने आप को चक्रव्यूह में फंसा महसूस करने लगी और तिल तिल घुटने लगी! इस प्रश्न से मेरी अंतरात्मा विचलित होने लगी! इस प्रश्न ने मेरे पूरे व्यक्तित्व को बदल कर रख दिया था! यह प्रश्न एक महिला ने मुझसे तब किया जब मैंने उसके पति का सत्य रूप उसके तथा उस पुरुष के जन्मदाता के सामने रख दिया था!

उसे मेरे सत्य पर कोई विश्वास नहीं हुआ उसे लगा की मैं झूठा आडंबर कर रही हूँ या यूं कहें कि उसके पति परमेश्वर ने जो मेरा रूप उसे दिखाया, उस मायाजाल में फंसकर वो मेरे चरित्र का चरितार्थ नहीं कर पा रही थी और अनगिनत ह्रदय आच्छादित करने वाले शब्द बाणों से मेरे ह्रदय को विच्छेदित कर रही थी और मैं विषम सी उसके शब्द बाणों को झेल रही थी, उस दिन से यह प्रश्न मेरे अंतःकरण को खाए जा रहा था! क्या वह सत्य कह रही थी ?

मैं हूँ क्या? क्या है मेरा व्यक्तित्व? क्या वाकई में मैं औरत हूँ? अगर हूँ तो क्या सच में गन्दी औरत हूँ? औरत का क्या रूप होता है?  इन अनंत सवालों में मेरा फंसा मन अपने आप से प्रश्न करता रहा और मैं उत्तर खोजती रही, पर आज उन सवालों के मायाजाल से निकलकर सारे प्रश्नों के उत्तर दे रही हूँ स्वयं को और आज मैं कह सकती हूँ कि हाँ! मैं नारी हूँ ! मुझमें नारीत्व के सारे गुण हैं! मैं अपने सारे फ़र्ज़ निभा रही हूँ! मैंने सत्य अवलोकन किया, सत्य मार्ग चुना तो मैं गन्दी कैसे हो सकती हूँ? मेरे ईश्वर ने जो सत्य मार्ग मुझे दिखाया मैं उसी पर चली हूँ! मेरे ईश्वर ने जो कहा मैंने वही मार्ग चुना, वही किया जो उसकी मंशा थी और यह भी सच है कि कोई मनुष्य दूसरे जैसा नहीं हो सकता! हर मनुष्य का एक रूप होता है और वह उसी के अनुसार अभिनय करता है! मैंने भी वही किया तो मैं गलत कैसे हो सकती हूँ? यह तो उस औरत की अन्तः कुंठा थी, जो उसके शब्दों से बाहर निकलकर आई थी!

रही बात प्रश्नोत्तर की तो यदि भोजन बनाना, कपडे धोना, बच्चों का लालन-पालन करना ही औरत होता है तथा परिवार को भोजन कराना औरत होता है तो एक नौकर भी पूरी श्रद्धा भाव से अपने स्वामी की सेवा में पूर्णतया समर्पित होता है! चाहे वो नर हो या नारी, वह अपने मालिक के लिए भोजन भी बनता है, कपडे धोता है, घर की देखभाल करता है, तब तो वो सच में एक नारी होता है और नारी से ज्यादा महान होता है! क्या पुरुष की यौन इच्छाओं को पूर्ण करना ही नारी है? संतान को जन्म देना और उनका लालन-पालन करना नारी रूप है तो मुझे लगता है कि यह स्वार्थ पूर्ण रूप है!

नारी का रूप इतनी सीमित सीमाओं में कैसे बंधा हो सकता है ? यदि उसके लिए यही नारी का रूप है तो मुझे लगता है कि शायद उसके हिसाब से मैं नारी नहीं हूँ क्योंकि मेरा रूप इससे व्यापक है-

“नारी प्रकृति है

नारी धरा है

सृजन की शक्ति

ईश्वर में है

पर नारी सृजनकर्ता है

नारी सृष्टि पालक है

नारी असीम अस्मिता है”

और यदि मैंने गलत को गलत कहा, गलत को सुधारने के लिए उसका अपमान किया तो इसका मतलब मैं नारी नहीं, यह गलत है, क्योंकि यदि मैंने उस पुरुष को डांटा, उसे बुरा-भला कहा तो मैंने माँ का रूप निभाया! माँ भी अपने बच्चे को उसकी गलती पर डांटती है और मारती भी है! यदि मैंने उसकी निंदा की और उसे बार-बार जताया कि तुम्हारा रास्ता गलत है तो मैंने एक अच्छे मित्र की भूमिका निभायी! यदि मैंने उसका बुरा स्वरुप उसके जन्मदाता को दिखाया तो मैंने एक गुरु की भूमिका निभायी और यदि मैंने उसका सच दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया तो सच्चे समाजसेवक की भूमिका निभाकर कई जिंदगियों को बचा लिया और शायद मैंने अपना अच्छा प्रयास किया तो इतना कुछ करने के बाद भी अगर कोई यह प्रश्न उठाता है कि मैं नारी नहीं हूँ तो यह प्रश्न उसके लिए प्रश्नचिन्ह है?

नारी जननी है

नारी गृहणी है

नारी भगनी है

नारी ब्रहम संसार

नारी नहीं तो यह पुरुष कैसा

क्योंकि नारी के गर्भ में

सिमटा जीव संसार

नारी की जब स्मिता पर

होता है प्रहार

तो वही बन जाती है

अग्नि का अंतिम द्वार

क्योंकि स्त्री का मतलब गुरु बनकर सत्य मार्ग दिखाना, माँ बनकर गलत राहों से बचाना, सखा बनकर सत्य और झूठ का परिचय कराना है ! स्त्री सृजनात्मक शक्ति है, वह माँ है, जन्मदात्री है! वह जीवन के मूल स्त्रोत से जुड़ती है और सौम्य है! उसकी शक्ति करूणा है, उसकी शक्ति ममता है! उसकी शक्ति सूरज जैसी नहीं है, उसकी शक्ति चन्द्रमा जैसी है! क्रोध आने पर वह प्रचंड अग्नि के समान होती है तथा सौम्य होने पर जल का प्रवाह कर देती है यह सत्य रूप है नारी का! मैं भी यही रूप हूँ और हमेशा रहूंगी ….।

लेखिका मनु मंजू शुक्‍ला अवध रिगल टाइम्‍स की संपादक और समाज सेविका हैं.

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