
सुभाष राय
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार
दुष्यंत ने यह शेर आजाद हिंदुस्तान में रहते हुए कहा था। इसमें आज की जमीनी हकीकत का जितना साफ-सुथरा बयान है, उसका कोई सानी नहीं। हम आजाद देश के लोग हैं। अंग्रेजों की दासता से इस देश को मुक्त हुए 63 साल हो गये। इन वर्षों में हम कितने आगे बढ़ गये, यह किसी से छिपा नहीं है। हमने परमाणु बम बना लिया, हम चंद्रमा पर अपना यान भेजने में कामयाब हो गये, हम विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनने के दावेदार हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अब भी इस देश में लोग भूख से मर रहे हैं, किसान आत्महत्याएं कर रहे है, बेरोजगारों की विशाल फौज काम-धंधे की तलाश में तमाम दफ्तरों के खाक छान रही है, लड़कियां गर्भ में ही मारी जा रही हैं, भ्रष्टाचार अपने चरम पर है, अपराधियों ने कानून-व्यवस्था का अपहरण कर रखा है, किसी की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।
हिंदुस्तान आजाद हुआ था तो एक बंटवारा झेलना पड़ा था पर आजादी के बाद बचा हुआ देश कई टुकड़ों में बंट गया है। देश के दो चेहरे साफ-साफ दिखायी पड़ते हैं। एक अमीर भारत, दूसरा गरीब भारत। कुछ लोगों के पास बेइंतहा धन आ रहा है। वे वैभव और ऐश्वर्य की चमक में जी रहे हैं। उनके पास बड़े उद्योग हैं, कंपनियां हैं, उनकी पीठ पर सरकार का वरद हाथ है। वे धन के बल पर मेधावी दिमाग खरीदते हैं और उनका इस्तेमाल अपना वैभव बढ़ाने में करते हैं। यह चमकता भारत है। दूसरी ओर वे लोग हैं, जो दो वक्त की रोटी के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी कोई गारंटी नहीं कि उनके परिवार को रोटी मिल ही जाये। उनके बच्चे धूल-मिट्टी में पैदा होते हैं और अपने पांवों पर खड़े होते ही पेट की आग बुझाने के दुष्कर उद्यम में झोंक दिये जाते हैं। पढ़ाई-लिखाई तो उनके लिए सपना है, वे या तो बड़े बाबुओं के घर में, सेठजी की फैक्ट्री में मजूरी करने लगते हैं या भीख मांगते हैं। यह गरीब भारत है और यही असली भारत है।
जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो क्रांतिकारी केवल अंग्रेजों को भगाने की रणनीतियां बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने में ही अपना समय नहीं लगाते थे, वे आजाद भारत के लिए अपने सपने बुनने में भी अपनी ऊर्जा खपाते थे। चाहे वे महात्मा गांधी और उनके नरमपंथी अहिंसावादी दल के लोग रहे हों या फिर सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और चंद्रशेखर जैसे गरम दल के लोग, सभी इस बात पर भी चिंतन करते रहते थे कि आजाद भारत कैसा होना चाहिए। उनके सपनों में एक ऐसा देश था, जो अपने पांवों पर मजबूती से खड़ा होगा, जहां सबको प्रगति और विकास के समान अवसर होंगे, जहां सबका जीवन सुरक्षित और खुशहाल होगा, जहां ऊंच-नीच का, जाति-पांति का कोई भेदभाव नहीं होगा और हर नागरिक को भारतीय होने के नाते समान सामाजिक अधिकार होंगे, जहां आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से कमजोर लोगों को सबके बराबर लाने के लिए सरकारें विशेष प्रयास करेंगी।
आजादी के बाद हमने अपने संविधान में भी इन सपनों को ध्यान में रखते हुए उन्हें पूरा करने के लिए हर संभव कानूनी और संवैधानिक व्यवस्थाएं की। बेशक अच्छे इरादों के साथ आजाद भारत अपने कदमों पर आगे बढ़ चला लेकिन आज हम कहां आ गये हैं, थोड़ा रुक कर देखें तो लगता है कि हम कहीं भटक गये, रास्ता भूल गये, क्रांतिकारियों के सपने भुला बैठे। आजाद भारत में अपनी भाषा को सम्मान नहीं दिया गया, सांप्रदायिक सद्भाव की बलि चढ़ा दी गयी, जाति-पांति के विभाजन को और गहरा किया गया, भ्रष्टाचार को शिष्टाचार की तरह मान्यता दे दी गयी, देश के ऊपर स्वार्थचिंतन को वरीयता दी गयी, गरीबों की प्रवंचना का मजाक उड़ाने में गर्व का अनुभव किया जाने लगा। हमने राष्ट्रीय जीवन के लिए जरूरी मर्यादाओं, नैतिकताओं को ताक पर रख दिया। सत्तानायकों और उनके सहयोगी नौकरशाहों ने धीरे-धीरे अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए वही तौर-तरीके अपनाने शुरू कर दिये, जो कभी गोरे अपनाते थे। इसका भयानक परिणाम आज हमारे सामने है।
एक विशाल समाजवादी लोकतंत्र भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय, जाति और स्वार्थ की अनेक दीवारों में बंटा हुआ है। देश एक संकल्पहीन, शक्तिहीन और स्खलित सत्ता के हाथ में दिशाहीनता की राह पर बढ़ रहा है। जो अमीर हैं, उन पर लक्ष्मी बरस रही है, जो गरीब हैं, वे शासकों के छल-प्रपंच और पाखंड की चक्की में निरंतर पिसने को अभिशप्त हैं। आम आदमी के लिए सरकारें अपनी सारी योजनाएँ बनाने के दावे करती हैं, पर आम आदमी अपनी नियति के कठिन चक्र में और उलझता चला जा रहा है। महंगाई आसमान पर है। भोजन, कपड़ा और छत की न्यूनतम जरूरतें पूरी कर पाना टेढ़ी खीर हो गया है। जनता की मदद करने, जीवन को आसान बनाने और संरचनागत विस्तार को अंजाम देने की जिम्मेदारियां जिन सरकारी अफसरों पर हैं, वे अपराधियों और ठेकेदारों के गुलामों की तरह काम कर रहे हैं। रिश्वत उनका जन्म सिद्ध अधिकार बन गया है। उनकी सांठ-गांठ चूंकि राजनेताओं से भी है, इसलिए वे निर्भय और उन्मुक्त वनराज की तरह लूट के उत्सव का आनंद उठा रहे हैं।
बेरोक-टोक जनता के धन का अपव्यय ही नहीं हो रहा है बल्कि न्यायसंगत और नियमानुकूल काम के लिए भी घूस उगाहने की असीम उत्कंठा ने सारे तंत्र को धन लोलुप पगलाये अराजक तंत्र में तबदील कर दिया है। यहां तक कि देश की प्रतिष्ठा को बेचकर भी पैसा बना लेने की आसुरी मनोवृत्ति ने समूचे परिदृश्य को घेर रखा है। कामनवेल्थ खेलों की आड़ में अभी जो अंधेरगर्दी और लूटपाट मची हुई है, उससे कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि राजनेता और नौकरशाह कितने लालची, धूर्त, थेथर और ढीठ हो गये हैं। छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सांप्रदायिक और तुष्टीकरण की राजनीति ने मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों और हिंदुओं को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। जातियों के नाम पर आरक्षण ने जाति भेद को खतरनाक स्थिति तक पहुंचा दिया है। हर जाति आरक्षण के नाम पर तलवारें खींचे हुए है।
सत्ता की संकल्पहीनता के कारण कई राज्यों में भाषायी उन्माद इतना बढ़ गया है कि नागरिकों को अपने देश में ही भाषा और बोली के नाम पर भेदभाव, अभद्रता और हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है। सत्ता और राजनीति का दोगला चरित्र खुलकर सबके सामने आ चुका है, पर विकल्पहीनता के कारण जनता कोई बदलाव नहीं कर पाती है। इस निरुपायता से कई विकराल समस्याओं ने जन्म लिया है। सत्ता के निर्मम स्वार्थ, गरीबों की निरंतर उपेक्षा और राष्ट्रीय संकल्प के अभाव में जहां भ्रष्टाचार एक विकट महामारी की तरह देश के स्वास्थ्य को चबा रहा है, वहीं लचर शासन और अतिशय लोकतांत्रिक उदारता ने आतंकवाद को इतना विकराल रूप धारण करने का अवसर दिया है कि अब हमारी समझ में नहीं आ रहा कि उससे निपटें तो कैसे।
पाकिस्तान और चीन लगातार हमारे देश को अस्थिर बनाने के कुचक्र में लगे हुए हैं, लेकिन हम दृढ़ता से उन्हें चेतावनी देने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। जो लोग हमारी सीमाओं में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और पाकिस्तानी झंडा फहराते हैं, हमारे जननायक उनके मानवाधिकार की चिंता में डरे-सहमे खामोश असहाय कुछ न कर पाने की कापुरुषता का निरीह प्रदर्शन करते दिखते हैं। इस देश की जनता ने कातर होकर देखा है आतंकवादियों के सामने नेताओं को गिड़गिड़ाते हुए और उनकी मांग पर देशद्रोहियों को जेल से निकालकर उनके हवाले करते हुए। जनता ने आतंकवादियों से लड़ते हुए प्राण निछावर कर देने वाले बहादुर पुलिस अधिकारियों की मंशा पर नेताओं को शक करते हुए भी देखा है।
बटला कांड कैसे भूल जायेगा। आतंकवाद से लड़ने के प्रश्न पर भी राजनीतिज्ञों में राष्ट्रीय मतैक्य नहीं दिखता। इसका भी दलहित में फायदा उठाने की कोशिशें की जाती हैं। इसी तरह का रवैया नक्सलवाद को लेकर भी है। अभी तक सरकारें तय नहीं कर पायीं कि आखिर नक्सलवाद से कैसे निपटा जाय। आदिवासियों की गरीबी, उनके जीवन की यंत्रणा सत्ता के प्रमाद में हमने कभी देखी ही नहीं, उन्हें जंगलों से विस्थापित कर उनका जीवन ही छीन लिया गया। जब नक्सलियों ने उनकी मदद शुरू की तब भी हमारी नींद नहीं टूटी। अब जब इन उपेक्षित आदिवासी गढ़ों पर उनकी पकड़ मजबूत हो गयी और वे सत्ता को चुनौती देने लगे तो बारूद की गंध सत्ता के गलियारों तक पहुंची। परंतु अब भी सरकार को समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाये। लड़ाई हो या बात।
लड़ाई दीर्घकालिक समाधान नहीं दे सकती मगर बातचीत का रास्ता भी कैसे निकले, जब तक एक-दूसरे पर भरोसा न हो। जब भी कोई पुल बनाने की कोशिश होती है, शासन के सिपहसालारों की गलतियां उसे नाकाम कर देती हैं। रास्ता बन ही रहा था कि नक्सलियों के नेता आजाद को पकड़कर मार दिया गया। अब ममता बनर्जी पर नक्सलियों ने भरोसा जताया तो ममता की ही घेरेबंदी की जा रही है। इस संभावना पर कोई सोच ही नहीं रहा कि हो सकता है ममता बनर्जी पर उनका भरोसा उन्हें जंगलों से बाहर लाने में कामयाब हो जाये। सच माने तो सरकार का मतलब केवल गलतियां करना रह गया है।
यही है हमारी 63 साल की आजादी। जो समर्थ हैं, वे पूरी तरह आजाद हैं, भ्रष्टाचार के लिए, उत्पीड़न, जुल्म और अन्याय के लिए। जो कमजोर हैं, वे सर उठाने के लिए, अन्याय का प्रतिकार करने के लिए भी आजाद नहीं है। यह कैसी आजादी है कि बहुसंख्य जनता अपने ही देश के मुट्ठी भर ताकतवर लोगों के हाथों की गुलाम है। ऐसी गुलामी लंबे समय तक नहीं चल सकती। इसी मानसिकता ने नक्सलवाद को ताकत दी और यह मानसिकता अगर जारी रही तो युद्ध के कई और मोर्चे खुल जायेंगे।
इस कठिन परिस्थिति में मीडिया और न्यायपालिका से जो उम्मीदें थीं, वह भी पूरी नहीं हो रही हैं। न्यायतंत्र अपने ही बोझ के नीचे चरमरा रहा है, छोटी अदालतें अपनी बड़ी अदालतों के आदेश भी हवा में उड़ा रही हैं। शहाबुद्दीन के मामले ने सबको स्तब्ध कर दिया। वहां भी भ्रष्टाचार का घुन प्रवेश पा चुका है। मीडिया हालांकि पूरी तरह सोया नहीं है, हाल के वर्षों में उसने अपने तेवर दिखाये जरूर हैं लेकिन वह भी विज्ञापनी होड़ में मनोरंजन, मस्ती और मनोराज्य की त्रिवेणी में टीआरपी के गोते लगा रहा है। लगता है कि आजादी के असली मायने कहीं खो गये हैं। इसकी चमक वापस लाने के लिए शायद एक और लड़ाई लड़नी पड़े। दुष्यंत के शेर पर ही बात खत्म हो तो बेहतर..
नजरों में आ रहे हैं नजारे बहुत बुरे
होठों में आ रही है जुबां और भी खराब ।
लेखक सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक अमर उजाला, आगरा के संपादक रहे और इन दिनों आगरा में ही ‘डीएलए’ अखबार में संपादक (विचार) पद पर कार्यरत हैं. सुभाष से संपर्क 09927500541 के जरिए किया जा सकता है.

