: सामाजिक ताने-बाने के लिए जायज है खाप पंचायतों का खटराग : उत्तर भारत के कुछ राज्यों में खाप पंचायतों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। सामाजिक ताने-बाने को बरकरार रखने में इन खाप पंचायतों की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता। यह बात और है कि हरियाणा में खाप पंचायतों के कई फरमान दर्जनों युवक-युवतियों की मौत का कारण बने हैं, जबकि कई ऐसे फरमान जारी किए गए हैं, जिन्होंने दंपतियों के जीवन में तूफान खड़ा करने का काम किया है। पंचायतों के कई तुगलकी फरमानों पर सरकार की खामोशी वोट बैंक के कारण बनी रही। आखिरकार न्यायालयों ने खाप पंचायतों के तुगलकी फरमानों पर अपनी नजरें टेढ़ी करना शुरू कर दिया। न्यायालयों के कड़े रुख के कारण इन पंचायतों पर कुछ हद तक लगाम लगी है। साथ ही आम लोगों ने अब ऐसी पंचायतों के निर्णयों के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिम्मत जुटाना शुरू कर दिया है। खाप पंचायतों ने कोर्ट के तीखे तेवरों को देखते हुए अपने वजूद को बचाने के लिए अब राजनीति का सहारा लेना शुरू कर दिया है। हिंदू मैरीज एक्ट में बदलाव के प्रयास सिरे चढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें जोर पकडऩे लगी हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या खाप पंचायतों के वजूद को खत्म कर दिया जाना चाहिए? शहरों में पश्चिमी संस्कृति हावी होती जा रही है, लेकिन गांवों में इसका व्यापक असर अभी तक नहीं हुआ है। ग्रामीण आंचल में अभी भी एक-दूसरे के प्रति प्रेम व भाईचारे की भावना है। यही कारण है कि गांव के लोग गांव की लडक़ी, चाहे वह किसी भी जाति या समुदाय की हो, को अपनी बहन व बेटी के समान मानते हैं। कमोबेश यही स्थिति गोत्र की है। एक गांव के लोग दूसरे गांव के समान गोत्र के लोगों को अपना भाई मानते हैं। यह परंपरा दशकों से चली आ रही है। खाप पंचायतें इसी परंपरा को आगे तक ले जाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। एक गांव से दूसरे गांव में समान गोत्र में शादी करने का विरोध पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। साथ ही शादी के बाद व बच्चे पैदा होने के बाद खाप पंचायतें जब अपनी निद्रा तोडक़र दंपति को भाई-बहन के रूप में रहने के फरमान सुनाती हैं, तो इन पंचायतों के निर्णयों पर प्रबुद्ध ही नहीं, आम आदमी भी हतप्रभ रह जाते हैं। समान गोत्र में तीन-चार साल पहले शादी कर चुके लोगों को गांव निकाला देने के फरमान कहीं न कहीं कुछ लोगों के निहित स्वार्थों की ओर इशारा करते हैं। अगर इन पंचायतों को अपना वजूद बचाना है और विश्वसनीयता को बरकरार रखना है, तो हर हाल में ऐसे निर्णयों से बचना ही होगा।
अब बात करते हैं एक ही गांव व एक ही गोत्र में शादी करने की। भले ही देश विकास के पथ पर अग्रसर है। कानून दो बालिगों को शादी करने की छूट दिए हुए है। लेकिन ग्रामीण परिवेश में इस तरह की शादी को सहन करना हर किसी के वश में नहीं है। ऐसी शादियां एक तरह से राखी के बंधन को मंगलसूत्र की डोर में बदलने का काम करती हैं। भले ही कानून ऐसी शादी को पूरी तरह मान्यता देता है, लेकिन सामाजिक कानून की नजर में इन शादियों को मान्यता दिया जाना आसान नहीं है। देहात में ऐसी शादियां आम आदमी की नजर में किसी अपराध से कम नहीं होती। यही कारण है कि खाप पंचायतों के तेवर उस समय उग्र हो जाते हैं, जब एक ही गांव के युवक-युवती घर से भागकर शादी रचा लेते हैं। खाप पंचायतों के कड़े निर्णयों या लडक़ा-लडक़ी के परिजनों के गुस्से के कारण ऐसे कई जोड़े मौत के आगोश में समा चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि बचपन से अपनी बहन मानने वाले जब युवा होकर उसे पत्नी का दर्जा देने पर आमादा होते हैं और भाई समान युवक को युवती अपने पति के रूप में स्वीकार करने को तैयार हो जाती है, तो सामाजिक ताने-बाने के बिगडऩे की आशंका प्रबल हो जाती है। ऐसी स्थिति में खाप पंचायतों के गुस्से को किसी हद तक जायज भी माना जा सकता है। लेकिन यहां यह भी सवाल उठता है कि ऐसी गलती करने वाले युवक-युवतियों को मौत का फरमान सुनाना किस हद तक जायज है?
माननीय अदालतों के पूर्व में लिए गए निर्णयों पर सवाल उठाने का कोई औचित्य ही नहीं है। अदालतें कानून के मुताबिक अपना काम करती हैं। उनके निर्णय पूरी तरह जायज होते हैं। यही कारण है कि अब खाप पंचायतों ने अदालतों के निर्णयों का विरोध करने की बजाय कानून में संशोधन कराने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया है। इन पंचायतों के संघर्ष के साथ ही राजनीति ने भी अपना काम करना शुरू कर दिया है। विपक्ष के कुछ नेता खाप पंचायतों के महत्व को पहले से ही स्वीकार कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के कुछ नेता वोट बैंक खिसकते देख, पहले तो पंचायतों के सुर में सुर मिलाते हैं और ऊपर से डंडा आने के बाद अपने बयान से मुकर जाते हैं। ऐसे में खाप पंचायतों को इस बात की जरा भी उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि उनके पक्ष या विपक्ष में राग अलापने वाले नेता सही मायने में किस हद तक उनका साथ निभाएंगे। इन पंचायतों को वक्त की नजाकत देखते हुए पूरी तरह संयम से काम लेना होगा। साथ ही पूर्व में लिए गए निर्णयों पर मंथन भी करना होगा, ताकि भविष्य में उन्हें अदालतों के कठोर रुख का सामना नहीं करना पड़े।
लेखक नरेन्द्र वत्स पत्रकार हैं.

