खोपड़ी मत खाओ
नत्था को लेकर अब और मत पकाओ..
ओ यारों छोड़ो जाओ…
खोपड़ी मत खाओ…
जइसे कुर्सी दोनो ओर हत्थे होते हैं,
वइसे ही न्यूज चैनलो में भी कई नत्थे होते हैं..
फिल्मी नत्थे के लिए..
अब कितना पकाओगे?खोपडि़या फट जाएगी क्या पाओगे?
फालतू में मरेंगे दो चार…
होगा लाइव, खोपड़ी फटी चार मरे..
इसीलिए मनुहार है…
ओ यारों छोड़ो जाओ…
खोपड़ी मत खाओ,
फिल्मी नत्था का इस्लेशण हुआ…
विश्लेषण हुआ…
अब क्या नत्था का ट्रांसलेशन कराओगे?
जरा दिमाग लगाओ..और बताओ…
के नत्था कहां पाया जाता हैं…
क्या सिर्फ पिपली गांव में…
डूबती हुइ नाव में?
बाढ़ के चपेटो में या बंजर पड़े खेतो में..
गंदी सी धोती में…जली हुई रोटी में…
बढ़ी हुई दाढ़ी में…या मिसेज नथिया की फटी हुई साड़ी में?
बूझो और बताओ..ना समझ आए तो सुनकर जाओ…
सच तो ये है…के
बड़ी सी एक बिल्डिंग के…एसी की ठंड़ी में…
कुर्सी पर बैठकर की बोर्ड की डंडी में..
फुटेज, इंजेस्टिंग में..सपनों की डंपींग में
दुधिया से रौशनी के हिडेन सी गर्दिश में…
मर चुके विचारो में..
टीआरपी के जुगाड़ों में…
नौकरी बचाने में..
बॉसवे को पटाने में…जिंदगी गुजार दी…
पत्रकार तो बन ना सके नथ भी उतार दी…
तो फर्क क्या है भाई….
पिपली का नत्था मरता है..खेत की बुआई में…
दिल्ली के वुडलैंडी नत्थे मरते हैं…छंटाई में..
अंतर बस इतना सा…रह गया है यारों…
कि फिल्मी नत्था की कहानी…शुरु हुई आत्म हत्या से
अपुन न्यूज के नत्थों की कहानी कहीं आत्म हत्या पे बंद न हो…
इसीलिए मनुहार है…
के उस नत्थे में मत उलझो…
जरा खुद पे तरस खाओ
…गफलत से अच्छा है…
कि मिडिया के नत्थों के भी फ्यूचर का अंदाजा लगाओ
तो यारों छोड़ो जाओ…
खोपड़ी मत खाओ…
जइसे कुर्सी दोनो ओर हत्थे होते हैं,
वइसे ही न्यूज चैनलो में भी कई नत्थे होते हैं..
विष्णु शंकर एक कवि और पत्रकार के साथ कई विधाओं के जानकार हैं. 15 साल पहले बिहार से दिल्ली भाग आए थे. पहले वैज्ञानिक बनना
चाहते थे, फिर ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा शुरू किया लेकिन यह अधूरा ही छूट गया. आगे दिल्ली विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में बीए ऑनर्स, फिर नाटकों की शुरुआत की. डीयू में तमाम नाटकों और नुक्कड़ (सोलो) में खूब रगड़ाई हुई. एनएसडी के नेशनल फेस्टिवल में कई नाटकों में अभिनय किया. पुर्ननवा नाम की नाट्य मंडली बनाकर भिखारी ठाकुर के नाटकों के साथ-साथ उर्दू के कुछ कहानियों का दिल्ली और देश भर में मंचन और हबीब तनवीर साहब के नाट्य मंडली नया थियेटर के लोभ में भोपाल में 6 माह डेरा डाला. चाय-पानी पिलाते रहे. जेएनयू के गंगा ढाबे की चस्केबाजी और आनंद पटवर्धन के साथ डॉक्यूमेंट्री लेकर दिल्ली के टोले-मोहल्लो में घुमे. जनसत्ता और दैनिक जागरण में फिल्म और कल्चरल मुद्दों पर लिखते रहे. 8-9माह नॉर्थ ईस्ट में घुमक्कड़ी और पत्रकारिता की. 2003 के अंत में आज तक पहुंचे, जुर्म…वारदात..सिनेमा आजतक…और क्या-क्या करते बनाते रहे, फिर स्टार न्यूज पहुंचे. ‘कौन है’ का प्रोडक्शन, रिपोर्टिंग करते रहे. यहीं पर m2-3 फिल्में बनाईं, जिसमें बेनजीर भुट्टो पर बनी फिल्म को विशेष सराहना मिली, फिर शूटआउट और ब्लास्ट नाम का प्रोग्राम प्रोड्यूस किया. हां, स्टार के एक फिल्मी प्रोग्राम में क्लैप एंकर भी बने। पढ़ने का शौक तथा लेखन और निर्देशन में विशेष रुचि है. गाहे-बगाहे अभिनय में भी हाथ आजमा लेते हैं. एक आनेवाली फीचर फिल्म के लिए पटकथा लेखन कर रहे हैं. कुल मिलाकर कहीं पहुंच नहीं सके तो अब तक नत्था बने हुए हैं.

