: सामर्थ्यवान को छूट, छोटों को बंदरघुड़की क्यों :आखिर क्यों सारे नियम-कानून लघु समाचार पत्रों के प्रकाशकों व सम्पादकों से ही आरएनआई और डीएवीपी फालो कराना चाहता है? बड़ों को छूट और छोटों को आये दिन बंदर घुड़की क्यों? प्रेस रजिस्ट्रार द्वारा समाचार पत्र के मत्थे पर अखबार के नाम के अलावा कुछ भी लिखे जाने के मामले में लगातार दोहरी नीति अपनाई जा रही है। बड़े समाचार पत्र मत्थे पर सब कुछ लिखते हैं, उन्हें तो आरएनआई के अधिकारी रोकते नहीं और लघु एवं मध्यम तथा भाषाई समाचार पत्र यदि शीर्षक के अलावा कुछ मत्थे पर छापते हैं तो उन्हें परेशान किया जाता है, उन्हें रजिस्ट्रेशन नम्बर ही नही दिया जाता, और तो और छोटे पत्रों से सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग वालों को भी तमाम तकलीफ है। ये सम्पादक का कार्ड ही जल्दी नही बनाते, मनमाना कानून बता कर टहला देना, इन सबकी दिनचर्या बन चुकी है।
बड़े अखबार मालिक व कुछ बड़े पत्रकार साथी भी अखबार के नाम पर हंसते है और छोटे अखबारों को सौदेबाज ठहराते हैं, जबकि वे यह अच्छी तरह से जानते हैं कि अखबार का नाम भारत सरकार के समाचार पत्र के रजिस्ट्रार के कार्यालय से पंजीकृत होता है। इन सबों की यह आपत्तियां केन्द्रीय सूचना-प्रसारण मंत्री, राज्यों के सूचना मंत्रिगण व शीर्ष संपादकों-प्रकाशकों की पिछले साल हुई एक बैठक में भी खुलकर जाहिर हुई। वहीं प्रकाशकों/संपादकों की न्यूनतम योग्यता तय किये जाने की बात भी उठी। घिसे-पिटे 1867 में बने प्रेस अधिनियम में भी बदलाव पर चर्चा हुई। केन्दीय सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने इसमें व्यापक संशोधनों के प्रारूप को कानून में बदलने की प्रक्रिया के बाबत भी बताया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि नामों के पंजीकरण, मान्यता, विज्ञापन-मुद्रण, प्रसार आदि के कानून लचर हैं, जिसके चलते भ्रष्टाचार का मकड़जाल बेहद मजबूत है। इनमें बदलाव बेहद आवश्यक है, जिससे आम आदमी के लिए लड़नेवालों को सच में लाभ मिल सके। लघु समाचार पत्र सौदेबाज नही होते, मै यह नहीं कहता लेकिन जब इन्हें सौदेबाज कहा जाता है, तो ‘सामना’ या ‘दोपहर का सामना’ का नाम लोग क्यों भूल जाते हैं, जो छाती ठोंककर विवादित खबरों को व सम्पादकीय को लिखकर हिंसा का बीजारोपण करते हैं, उस पर मौजूदा कानूनों के तहत भी कोई कार्रवाई नहीं होती न ही प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक कोई कार्रवाई करने के लिए किसी अधिकारी को निर्देशित करते है और न ही छोटे अखबारों पर उंगली उठाने वाले सजग प्रहरी कहलाने वाले बड़े क्या न्यायालय तक जाने की हिम्मत जुटा पाते हैं?
इन बातों को लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य बड़ी मानसिकता को यह बताना भर है कि हर छोटा अखबार जिसका नाम कुछ भी हो सकता है, सौदेबाज नहीं होता। यदि सौदेबाजी करेगा भी तो कस्बा, तहसील, स्तर पर बेहद छोटी। ‘बड़े’ कैसी सौदेबाजी करते हैं यह केन्द्रीय/राज्य सचिवालयों या किसी भी सरकारी दफ्तरों में देखी जा सकती है। इससे भी अधिक देखना हो तो प्रदेश की राजधानी लखनऊ व देश की राजधानी दिल्ली सहित अन्य राज्यों की राजधानियों में पत्रकारों की कालोनियों के कार गैरेजों और प्रेस क्लबों के बॉरों पर नजर डाली जा सकती है। यहां मेरे द्वारा किसी पर कोई आरोप लगाने की मंशा नहीं है, वरन सच का आइना दिखाना भर उद्देश्य है।
हां, जो लोग सूचना क्रांति के इस दौर में गांवों के करोड़ों लोगों को टीवी/इंटरनेट से जोड़ने की बात करते हैं, उन्हें भी बताना चाहूंगा कि अभी भी न जाने कितने गांव ऐसे हैं, जहां ग्रामीणों की झोपड़ी में पिछले 63 सालों में पीली रोशनी फेंकने वाला एक छोटा सा बल्ब भी नहीं जला है, ऐसे उपेक्षित इलाकों की खबर छोटे अखबार ही पहले देते हैं, बड़े बाद में…और यह भी काफी हद तक सच्चाई ही है कि छोटों के हक पर भी डाका डालने का काम बड़े ही करते चले आ रहे हैं।
मेरा तो यह मानना है कि छोटे अखबारों को लघु-उद्योग के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। जब बड़े अखबार के चमचमाते दफ्तरों में बड़ी सी श्रीगणेश-लक्ष्मी की मूर्ति रखकर ‘शुभ-लाभ’ के जगमग टाइल्स लगाकर ‘अखबार’ को उद्योग में बदला जा सकता है, तो छोटे अखबारों के लिए भी सुविधाओं की वकालत क्यों नहीं की जा सकती? सच तो यह है कि छोटे अखबार ही सहज ढंग से ग्रामीण समस्याएं उठाते हैं। इसके सुबूत में बांदा जिले के कर्बी से छप रहे ‘खबर लहरिया’ अखबार को देखा जा सकता है। ऐसे कई नाम और भी हैं जो कि रैम्प पर उतरती माडलों और हसीनाओं को कभी अखबार में स्थान नहीं देते बल्कि ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रशासन के समक्ष प्रमुखता से रखते हैं। बेशक कानून-कायदे और योग्यता का निर्धारण हो मगर छोटे अखबारों को नजरअंदाज करते हुये कतई नहीं।
लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

