: बबलू मल्लाह के एनकाउंटर के बाद भी नहीं आई शांति : अपहरण की घटनाओं से घबराए बीहड़वासी : 27 अगस्त 2010 की सुबह पांच बजे मेरा मोबाइल बजा पहली बार फोन कट गया, फिर दुबारा घंटी बजी तो मैंने उठाया और उठाते ही कान में आवाज पड़ी, ‘गुड मार्निंग अभिषेक सो रहे हो क्या?’ आवाज औरैया एसपी सुभाष दुबे की थी। मुझे आभास हो गया कि कोई गुडवर्क की ही खबर होगी। नही तो इतनी सुबह कप्तान साहब शिकायत करने के लिए तो कॉल नहीं करेंगे। अपनी निंद्रा भंग करते हुए मैंने जवाब दिया, ‘गुड मार्निंग सर, सो नहीं रहा था, ब्रश करने जा रहा था। क्या हुआ सुबह-सुबह ही?’ उधर से जवाब आया, ‘अरे हमने एक डकैत का एनकाउंटर किया है।’ हां, मुझे पता था, औरैया पुलिस डकैत बबलू मल्लाह की तलाश में राखी के दिन से ही लगी थी। रात में ही अस्ता के खूंखार जंगलों में यमुना के किनारे बबलू अपने एक साथी के साथ मार डाला गया था। मैने भी कप्तान साहब को बधाई दी और ब्रश करने के बाद खबर ब्रेक करवाने के साथ ही दो मग से कौवा स्नान करके घटनास्थल की ओर रवाना हो गया।
मुठभेड़ स्थल अस्ता चौकी से तीन किलोमीटर दूर जंगलों में था। दो खतरनाक खाइयों और दर्जन भर से अधिक खतरनाक टीलों को पार करने के बाद दूर यमुना के पास हलचल ने बता दिया कि यही बबलू मल्लाह मारा गया है। रास्ते भर दर्जनों लोग बारिश से पैदा बीहड़ी फिसलन और बबूल के कांटों के जख्मों को झेलते और गिरते-गिराते पुलिस बल के साथ घटना स्थल पर आ गए, जहां से नदी के उस पार जालौनी माता का मंदिर सुबह के धुंधलके में स्पष्ट दिख रहा था। मौके पर सीओ औरैया डीके राय, अपर पुलिस अधीक्षक राजेंद्र कुमार, इंस्पेक्टर औरैया, एसओजी की टीम सहित दर्जन भर पुलिस कर्मी मौजूद थे। रात भर की मेहनत और सुबह की नर्मी को अपने आप में जज्ब करते हुए ओस की बूंदें, थकान के बाद की माथे पर उभरी पसीने की बूंद सरीखी नुमाया हो रही थी।
पास ही बबलू मल्लाह की लाश और उसके साथी की लाश इस बात की गवाही दे रही थी कि बीहड़ शांति की ओर दो कदम और बढ गया है। साथ ही बीहड़ वक्त के थपेड़ों से बाहर निकलने के लिए अंगडाई ले रहा है। अचानक कानों में आवाज गूंजी, ‘कप्तान साहब जिंदाबाद, कप्तान साहब जिंदाबाद, औरैया पुलिस जिंदाबाद।’ मेरे लिए इस तरह के नारे कोई नई बात नहीं थे। पुलिस नेता भले ही न हो, पर शांति के लिए नेतृत्व जरूर कर रही है। अभी पिछले साल के मार्च में डाकू भान सिंह अयाना शिखरना गांव के बीहड़ों में अपने तीन साथियों के साथ मारा गया था। मैंने लोगों का गुस्सा देखा था, कोई भानसिंह के मुंह पर थूक रहा था तो कोई मुर्दे शरीर पर जूते बरसा रहा था। बाद में मुझे यह भी मालूम हुआ कि मुखबिरी करने वाले ने डाकू भानसिंह की लाश पर हथियारों से भी वार किया था। बीहड में वक्त बेवक्त बदमाशों ने राज करने की नाकाम कोशिश ही की है। डाकू फूलन से लेकर दस्यु बबलू मल्लाह ने न सिर्फ बीहड़ों को मौतों से नवाजा बल्कि इन बीहड़ों को दुनिया के आगे मौत की घाटी ही साबित करने का काम किया है। बबलू मल्लाह बीहड़ के खूंखार गैंग निर्भय गुर्जर के साथ भी काफी समय तक रहा ।
बात डकैतों की हो और मुखबिरों की न हो तो अजीब लगेगा, कहानी अजीतमल के अमावता गांव के प्रधान ‘लाला’ की है, जिसने दस्यु निर्भयको 5 साल पहले गोलियों से छलनी किया था, तब इसका श्रेय पुलिस ले भागी और लाला गुर्जरों के निशाने पर आ गया। मेरी मुलाकात लाला से दो साल पहले अजीतमल कोतवाली में हुई, जब डाकू भान सिंह से बचने के लिए वो गनर की तलाश में था। तब के आईजी जोन, कानपुर बीपी सिंह ने दो लोगों को गनर दिया था, जिसमें लाला प्रधान भी था। पर वक्त बदलते देर नहीं लगती डाकू भान सिंह मार डाला गया और बीहड़ में गुर्जर गैंग खत्म हो गया। एक बार फिर बीहड़ में चहलकदमी शुरू हुई और जालौन का गैंग औरैया में सक्रिय हुआ।
अजीतमल में मुठभेड़ हुई और जालौन पुलिस की डायरी में मुठभेड़ जालौन दिखा दिया गया और औरैया के बीहड़ से एक मुठभेड़ की कहानी का श्रेय जालौन को मिल गया, जबकि एसपी जालौन प्रसस्ति-पत्र औरैया पुलिस को भेज कर अपनी ही भद पिटवाते रहे। पर ज्यादा दिन बीहड़ खमोश नहीं रह सका और मल्लाह गैंग का लीडर बबलू बन गया। यमुना पार से लेकर बीहड़ तक उसकी तूती बोलने लगी। औरैया पुलिस के लिए बबलू फिर सिरदर्द बना और पुलिस ने बबलू को निपटाने की योजना बना डाली। 27 अगस्त की सुबह ही बबलू मल्लाह अपने साथी के साथ अस्ता के जंगलों में मारा गया। अस्ता वही जगह है, जहां 80 के दशक में कुसुमा नाइन, फक्कड़ और लाला राम ने बेहमई नरसंहार का बदला लेने के लिए यहां दर्जनों लोगों को मौत के घाट उतारा था। एक बार फिर अस्ता का नाम चंबल घाटी की फिजाओं में बबलू मल्लाह के मौत के बाद तैर रहा है। बबलू के इरादे थे कि वो बीहड़ के गांवों में प्रधानी के चुनावों के लिए अपनी ताकत के बल पर फरमान जारी करेगा, पर अफसोस बबलू का सपना हकीकत में नहीं बदल पाया। पुलिसिया सूत्र बताते हैं कि बीहड़ में फरमान जारी कराने के लिए बबलू कई प्रधानों के संपर्क में था।
अब उम्मीद जताई जाने लगी कि बीहड में पंचायती चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष होंगे। पर ठीक अगले ही दिन औरैया के ही बिधूना कस्बे से अपहरण करके बीहड़ में कैद एक और पकड़ इटावा के बकेवर से लाखों रूपए देकर छूटी। फिर से बीहड़ में मौत और दहशत का शंखनाद बज गया? आखिर ये नया गैंग कौन है और इसका क्या इतिहास है? यह इटावा पुलिस के लिए चुनौती बन गया है, क्योंकि पंचायत चुनावों में लगभग सभी गैंग फरमान जारी करते ही रहते हैं। फिर से चंबल घाटी का भविष्य अधर में नजर आ रहा है। युवा वर्ग उत्साहित था कि चंबल में अब पंचायत चुनावों में डकैतों का दखल नहीं होगा, पर पंचायत चुनाव आते-आते घाटी में अपहरण का दौर और मौत की दहशत बबलू के खात्मे के बाद भी जारी है।
कुछ ही दिनों पूर्व बबलू की कैद से 10 लाख रूपए देकर एक पकड़ छूटी थी, क्या हुआ उन 10 लाख रूपयों का कुछ पता नहीं? क्या बबलू ने इससे फायर पावर बढाया था या फिर बबलू का कोई और आका था? इटावा के बकेवर का कौन सा गैंग है, जो सक्रिय है? क्या वो भी चंबल घाटी में फरमानों की तैयारी कर रहा है? कहीं चुनावों से पहले अपहरण उद्योग फिर से घाटी को दो दशक पीछे पहुंचा देगा? बुंदेलखण्ड से सटे क्षेत्रों में पंचायती चुनावों से पहले की अपशकुन वाली घटनाएं कहीं शासन और पुलिस के लिए चुनौती तो नहीं बनने जा रही?
लेखक अभिषेक शर्मा औरैया में ईटीवी के पत्रकार हैं.

