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कौन जिम्मेदार है इन नत्थों की मौत का?

राजेश त्रिपाठी: फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा होता है इसलिए ऐसा करना व्यावसायिक मजबूरी है, लेकिन सच्चाई इससे परे है। भारत का हर वह ‘नत्था’ जो वर्षों से सूखे, अकाल की मार और ऋण का बोझ झेल रहा होता है, उसे एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। ऐसी ही उसकी नियति है। फिल्म का नत्था एक प्रतीक है भारत के मेहनतकश किसानों के मुसलसल झेले जा रहे दर्द का, जो एक दिन उन्हें तोड़ ही देता है। वर्षों से सूखा, महाजन के ऋण के बोझ के तले दबे इन नत्थाओं का जीना मुहाल हो जाता है, उनके लिए बस एक ही रास्ता बचता है-आत्महत्या।

राजेश त्रिपाठी: फिल्म ‘पीपली लाइव’ का ‘नत्था’ भले ही न मरता हो और उसकी मौत का इंतजार करते मीडिया को भले ही निराशा हुई हो, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। फिल्में अक्सर सुखांत होती हैं, इनमें करो़ड़ों रुपया लगा होता है इसलिए ऐसा करना व्यावसायिक मजबूरी है, लेकिन सच्चाई इससे परे है। भारत का हर वह ‘नत्था’ जो वर्षों से सूखे, अकाल की मार और ऋण का बोझ झेल रहा होता है, उसे एक न एक दिन मरना ही पड़ता है। ऐसी ही उसकी नियति है। फिल्म का नत्था एक प्रतीक है भारत के मेहनतकश किसानों के मुसलसल झेले जा रहे दर्द का, जो एक दिन उन्हें तोड़ ही देता है। वर्षों से सूखा, महाजन के ऋण के बोझ के तले दबे इन नत्थाओं का जीना मुहाल हो जाता है, उनके लिए बस एक ही रास्ता बचता है-आत्महत्या।

साल-दर-साल सरकारी उपेक्षा और प्रकृति की बेरुखी की मार झेलते इन लोगों तक सरकारी मदद पहुंच ही नहीं पाती। वह या तो उन लोगों के द्वार तक जा कर ठिठक जाती है, जिनके जिम्मे उसके वितरण का भार है या फिर बिचौलिये उसका बंदरबांट कर लेते हैं। चाहे विदर्भ हो, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड या कोई और प्रदेश, पिछले कुछ वर्षों में वहां से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती रही हैं। किसानों की हालत कितनी खराब है, सूखे के चलते वे कितने बेहाल हैं, इसका पता हाल की एक खबर से चला, जिसमें झारखंड के एक गांव के 2000 किसान परिवारों ने राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमति मांगी थी। झारखंड के इस गांव के लोगों ने सतही लोकप्रियता पाने के लिए यह कदम नहीं उठाया। पिछले दो साल से पड़ रहे सूखे ने उनको इस स्थिति में ला दिया है कि इसके अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं बचा। राज्य में औसत से 42 प्रतिशत कम बारिश हुई है और सूखे के चलते खेत सूख गये हैं और फसलें नष्ट हो गयी हैं।

किसानों के पास जो पूंजी थी वह उन्होंने बीज-खाद खरीदने में गंवा दी और वह भी मिट्टी में मिल गयी। उन लोगों ने सोचा था कि फसल होगी तो उनके पेट भरने का साधन भी हो जायेगा और लिया गया ऋण भी चुकता हो जायेगा। उनकी सारी उम्मीद आकाश के बादलों पर टिकी थी, जिनकी बेरुखी से उनकी जान पर बन आयी है। अब उन्होंने राज्यपाल और राष्ट्रपति से आत्महत्या की अनुमित मांगी है। आजाद भारत में शायद ऐसा पहली बार हुआ है जब पूरे गांव ने आत्महत्या की अनुमित मांगी है। जाहिर है यह किसी भी आजाद देश के लिए गर्व की नहीं बल्कि शर्म की बात है, जो अपने किसानों, गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर करने वाले नागरिकों को जिंदगी की आम सहूलियतें तक नहीं जुटा पाता। जहां देश को अन्न जुटाने वाले किसान भूखों मरने को विवश हों, उस देश में विकास की बातें लोगों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। राष्ट्र में जाने कितनी जन कल्याण की योजनाएं टल रही हैं फिर ऐसी सहायता इन मुसीबत के मारे किसानों तक क्यों नहीं पहुंच पातीं। क्यों हिंदुस्तान के इन नत्थाओं को अपनी जिंदगी वक्त से पहले खत्म कर लेनी पड़ती है।

ऋण के बोझ और सूखे की मार से देश में जितने किसानों ने आत्महत्या की है, उन पर गौर करें तो सिहरन होती है। राष्ट्र के लिए हर नागरिक का जीवन बहुमूल्य होता है। सत्ता में चाहे कोई भी दल हो उसका यह परम कर्तव्य होता है कि वह अपने नागरिकों की चाहे वह किसी भी वर्ग के हों, जीवन की सुरक्षा की गारंटी दे और उनकी आम जरूरतों को पूरा करने की कोशिश करे। यह बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि इसमें अब तक की सारी सरकारें असफल रही हैं। जब चुनाव आते हैं नेता गला फाड़-फाड़ कर विकास का राग अलापते नजर आते हैं और कुर्सी मिलते ही ठंड़े घरों में आरामदायक कुर्सियों में देश के विकास और जन कल्याण की वे योजनाएं बनाने में लग जाते हैं, जिनका लाभ या तो पहुंचता ही नहीं या फिर पहुंचता भी है तो ऊंट के मुंह में जीरे की तरह।

सरकार यों तो किसानों और गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने की बातें करती है, लेकिन ये रुपये जिन लोगों के लिए होते हैं उन तक न पहुंच कर बीच में ही गायब हो जाते हैं। प्रभावशाली लोग ही यह धन हड़प लेते हैं और गरीब बेचारा सोचता रह जाता है कि दिल्ली की दरियादिली की गंगा उन तक क्यों नहीं पहुंची, बीच में ही क्यों सूख गयी। दरअसल हमारे यहां केंद्र से गरीबों के लिए राज्यों तक ऐसे सूखा पीड़ितों व गरीबों के लिए भेजे जानेवाली धनराशि के बंटन की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र पैसा राज्य में भेज देता है और राज्य से उसके उपयोग का प्रमाणपत्र मांगता है, जो राज्य दे भी देता है लेकिन सचमुच वह पैसा जरूरतमंदों तक पहुंचा या नहीं इस बात की निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि धन का सही उपयोग हुआ या नहीं। रही बात राज्य सरकारों के उपयोग प्रमाणपत्र देने की तो वह कागजी कार्रवाई पूरा करने में हमारा देश पूर्ण दक्ष है। देश में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे कि नहर बनी नहीं, बोरिंग हुई नहीं और उसके मद में पैसा जरूर खर्च हो गया। जहां के नेता करोड़ों का घोटाला पलक झपकते कर लेते हों, भ्रष्टाचार जहां एड़ी से चोटी तक व्याप्त हो वहां ऐसा होना कोई अचरज की बात नहीं।

वर्षों पहले एक कार्यक्रम ‘न्यूजलाइन’ टीवी पर आता था उसके एक एपीसो़ड में दिखाया गया था कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक जगह नहर खोदी जानी थी, जिसे सिर्फ कागज पर खोद दी गयी। बाद में जब पता चला कि सरकारी अधिकारी निरीक्षण को आ रहे हैं तो वह नहर भर दी गयी। इस बार कागज कुछ इस तरह तैयार किये गये जिनमें कहा गया कि नहर सही नहीं बनी थी इसलिए उसे बंद भर दिया गया। उस कार्यक्रम को जिस पत्रकार ने पेश किया था वे आज एक साप्ताहिक के संपादक हैं। जाहिर है सरकार की इस तरह से पोलपट्टी खोलने वाले कार्यक्रम की उम्र ज्यादा नहीं होनी थी और न्यूज लाइन जैसा लोकप्रिय और सार्थक कार्यक्रम भी अकाल मौत का शिकार हुआ। वैसा सुना है कि उसे पुनर्जीवित करने के प्रयास हो रहे हैं। जिस देश का यह हाल हो, वहां के किसान और गरीब–गुरबा किसी भी सरकार से क्या उम्मीद कर सकते हैं। सरकार चाहे दक्षिणपंथियों की हो या वामपंथियों की या फिर किसी और पंथ या विचार को मानने वालों की, अगर उनकी सत्ता में नागरिक गरीबी और भूख के चलते आत्महत्या करते हैं तो इस तरह की हर मौत उनके सिर पर कलंक का वह दाग है, जो वे वर्षों तक नहीं धो पायेंगे। ऐसे में विकास की हर बात, जनकल्याण का हर नारा एक गाली लगता है।

सरकार के लिए जरूरी है कि वह किसानों-जरूरतमंदों की हर मुमकिन सहायता करे। अनपढ़ गरीब अगर बैंक तक नहीं पहुंच पाते तो बैंक खुद उन तक जाये, उन्हें महाजनों के अनाप-शनाप ब्याज से बचाये। हमने गांवों में देखा है कि किसी गरीब किसान ने कभी महाजन या बड़े काश्तकार से मामूली सा कर्ज लिया तो वह बढ़ते-बढ़ते हजारों हो जाता है और वह बेचारा ब्याज भरता रहता है और मूल जैसा का तैसा रह जाता है। कर्ज के बोझ दबा वह बेचारा कर्ज अदा करने के लिए उस महाजन या काश्तकार के यहां बेगार खटने लगता है। उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी वहां बेगार खटते-खटते मर-खप जाती है पर सौ-पांच सौ रुपये का कर्ज हजारों में पहुंच जाता है और कर्ज लेने वाले की कई पीढ़ियों की अमोल मेहनत तक उसे चुकाने के लिए कम पड़ जाती है। गांव का रुख बरसों से नहीं किया। गांव बदले हैं, किसानों की हालत भी बदली है लेकिन आज भी कई गांव देश के ऐसे हैं जिनकी खुशहाली या बदहाली प्रकृति पर निर्भर है। देश में नहरों का अब भी वैसा जाल नहीं बिछाया जा सका कि इसका कण-कण पानी पाकर तृप्त हो और धरती सोना उगलने लगे।

मौसम और महाजन के ऋण की मार सहने को आज भी हिंदुस्तान के हजारों नत्था मजबूर हैं। इनके लिए सरकारी विकास का हर दावा महज एक छलावा और भ्रम ही लगता है। सही मायने में हिंदुस्तान उस दिन आजाद होगा जब गांव-गांव तक खुशहाली पहुंचाने का गांधी का सपना पूरा होगा। गांधी जी ने जब देश के बारे में सोचा तो उनकी दृष्टि और दिमाग में सबसे पहले गांवों की ही बात आयी। उनकी इस सोच के चलते ही यह बात कही गयी कि असली भारत तो गांवों में बसता है। यह बात सौ फीसदी सच भी है। हिंदु्स्तान का किसान अगर अनाज न जुटाये तो कंक्रीट के जंगल बने शहर शमशान बन जायेंगे। देश के दो सुदृढ़ ध्रुव हैं –किसान और जवान। किसान देश का पेट भरता है, जवान अपनी जान तक देकर उसकी रक्षा करते हैं। ये दोनों प्रणाम्य हैं और इनके ऋण से देश कभी उऋण नहीं हो सकता। इन दोनों वर्गों को सम्मान देते हुए हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया था। आज वही किसान पीड़ित और सुविधाओं से वंचित है। जब तक विकास का लाभ उस सीमांत किसान या गरीब तक नहीं पहुंचता ऐसा हर विकास, हर योजना बेमानी और बेकार है।

भारत में किसानों की बदहाली की क्या स्थिति है इसका अंदाजा पिछले कुछ सालों में होनेवाली किसानों की आत्महत्या से चलता है,  जिसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आंध्रप्रदेश की 8 करोड़ की आबादी में 70 प्रतिशत लोगों की जीविका का साधन कृषि है। वहां इस साल अगस्त माह से पहले तक के छह सप्ताह में 25 किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयी थीं, हालांकि विपक्षी राजनीतिक दल इस आंकड़े को और अधिक बताते हैं। भारत के कुछ किसानों की हालत यह है कि वे गले तक कर्ज में डूबे हैं। अगर आंकड़ों में यकीन करें तो 2002 से लेकर 2006 तक देश में 17500 किसानों के आत्महत्याएं की। सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण करने वालों का कहना है कि 1997 से अब तक 160,000 किसानों ने आत्महत्याएं की। इनमें से अधिकांश ने वही कीटनाशक खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली, जो उनकी उन फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए था, जो उनकी जिंदगी थी। वह नष्ट हुई तो उनकी अपनी जिंदगी भी बरबाद हो गयी।

आंध्रप्रदेश में इस साल 50 प्रतिशत वर्षा ही हुई है, ऐसे में धान, गन्ना व कपास जैसी पानी पर आधारित फसलें चौपट हो रही हैं। किसान खाद, सिंचाई के उपकरण और महंगे बीज खरीदने के लिए महाजन के ऋण के भरोसे रहते हैं, ऐसे में अगर फसल नहीं हुई तो उनके घर का तो पैसा गया ही कर्ज लिया पैसा भी उनके लिए वापस करना मुश्किल हो जाता है। जहां तक महाजन का सवाल है वह कभी-कभी दिये गये ऋण पर 30 प्रतिशत ब्याज तक वसूलते हैं। जो किसान आत्महत्या कर लेते हैं, वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं ऋण के बोझ में दबा परिवार, जो बड़े काश्तकारों के खेतों में खेत मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर हो जाता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसानों की आसानी से बैंक तक पहुंच न होने के कारण ही वे महाजन के चंगुल में फंस जाते हैं, जो उनका जी भर शोषण करता है। महाजन मूल नहीं लेना चाहता बस ब्याज भर लेता रहता है और कर्जदार ब्याज के एवज में ही लिये गये मूल धन से ज्यादा अदा कर देता है और मूल धन वैसा का वैसा बना रहता है । ऐसे में कर्ज कभी अदा होता ही नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों को साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दिलाने वाली योजना अगर सही ढंग से लागू की जा सके तो इससे बहुत से गरीबों का कल्याण हो सकता है और बहुत सी बहुमूल्य जिंदगियां वक्त से पहले खत्म होने से बच सकती हैं लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यह योजना भी कहीं-कहीं ही कारगर हो पायी है।

महाराष्ट्र, कर्णाटक, केरल और पंजाब के किसानों तक को तंगहाली और कर्ज से ऊब कर आत्महत्या को मजबूर होना पड़ा। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2006 में अकेले महाराष्ट्र में 4453 किसानों ने आत्महत्या की। इस अवधि में देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 17060 थी। 2008 में देश भर में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2005-2009 में महाराष्ट्र में 5000 किसानों ने आत्महत्याएं कीं। आंध्रप्रदेश में 2005-2007 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या थी 1313, कर्णाटक में 2005 से अगस्त 2009 तक यह संख्या थी 1003। केरल में पिछले साल यह संख्या 905, गुजरात में 387, पंजाब में 75 और तमिलनाडु में 26 थी। छत्तीसगढ़ में अप्रैल 2009 में कहते हैं कि ऋण के भार और फसल के बेकार होने के कारण 1500 किसानों ने आत्महताएं कीं। किसानों की आत्महत्या की घटनाएं सबसे पहले 1990 में प्रकाश में आयीं जब महाराष्ट्र में किसानों के आत्महत्या करने की खबरें आयीं। इसके बाद आंध्रप्रदेश और विदर्भ और फिर देश के कोने-कोने से किसानों की आत्महत्याओं की खबरें आने लगीं।

हालांकि सरकारें अक्सर दावा करती रही हैं कि किसानों के हित के लिए कई कदम उठाये गये हैं, लेकिन लगता है कि ये योजनाएं छोटे व सीमांत किसानों तक नहीं पहुंच पातीं तभी तो वे बेहाल और तंगहाल हैं। हम जब तक गांवों को आत्मनिर्भर इकाई नहीं बनायेंगे, उसे विकास की एक इकाई मान कर नहीं चलेंगे, गांव और गरीब बदहाल ही रहेंगे। गांवों में कृषि आधारित औद्योगिक इकाइयां स्थापित कर, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं सुचारू रूप से पहुंचा कर हम न सिर्फ गांवों बल्कि देश का भी भला कर रहे होंगे क्योंकि गांव बचेंगे तभी देश बचेगा। और गांधी का सपना भी उसी दिन सच होगा।

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं और तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। इन दिनों हिंदी दैनिक सन्मार्ग में कार्यरत हैं। राजेश से संपर्क [email protected] के जरिए कर सकते हैं।

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