: पत्रकारिता के नाम पर दलाली करने को मजबूर हो रहे हैं स्ट्रिंगर : 12 वर्ष के अपने पत्रकारिता करियर में ऐसा भी सुनने को मिलेगा, इसकी कल्पना नहीं की थी! क्षेत्रीय चैनलों में यदि कुछ गिने-चुने चैनलों को छोड़ दें, तो बाकी के चैनल किस तरह स्ट्रिंगर नियुक्त करते हैं, उन्हें क्या सुविधाएं देते हैं, हर स्टोरी के पीछे कितना पारिश्रमिक देते हैं और उससे क्या चाहते हैं, यह सब देख-सुनकर तो इसका सार समझ में आ जाता है। वैसे भी चैनल की आईडी देकर कुछ लोग यही समझ लेते हैं कि अब तो इसके जीने-खाने का इंतजाम हो गया। स्ट्रिंगर के पास तो लोग पैसे पहुंचाकर जाते हैं, इन्हें पारिश्रमिक की क्या जरूरत ? चूंकि मैं भी एक क्षेत्रीय चैनल से जुड़ा हूं तो किसी नए चैनल के लांच होने, उसके स्ट्रिंगर नियुक्त करने की कुछ बातें सामान्य बातचीत में संबंधितों से पता चल जाती हैं।
छह-आठ महीने पहले ही देहरादून से चलने वाले वीओएन यानी वाईस आफ नेशन चैनल का विज्ञापन रायपुर के एक अखबार में प्रकाशित हुआ तो कुछ लोगों को इससे जुड़ने का शौक जागा, उसमें बस्तर के बीजापुर में रहनेवाला मेरा एक दूर का रिश्तेदार बालकिशन बजाज भी स्ट्रिंगर बनने का इच्छुक हो गया। उसने मुझे फोन किया और पूछा कि इससे जुड़ना कैसा रहेगा? मैंने कहा कि चैनल के लोगों से कांटेक्ट करके देख लो, क्या कहते हैं? उसने चैनल के तत्कालीन ब्यूरो चीफ से मोबाइल पर संपर्क किया, तो उसे जवाब मिला कि तीस हजार रूपए जमा कर दो, तुम्हें स्ट्रिंगर बना देंगे, आईडी दे देंगे। बालकिशन ने मुझे फिर से फोन करके बताया कि वे लोग पैसे मांग रहे हैं, तो मैंने साफ शब्दों में कहा कि जो चैनल तुम्हें पैसे लेकर स्ट्रिंगर नियुक्त कर रहा है, सोच लो कि उसका हश्र क्या होगा? मैं तो पैसे देकर स्ट्रिंगर बनने के पक्ष में नहीं हूं। उसने जिद पकड़ ली कि मुझे किसी भी चैनल के साथ जुड़ना है, चाहे कुछ रकम क्यों न देनी पड़े।
उसके दो दिन बाद चैनल के रायपुर स्थित आफिस में बालकिशन ने पहुंचकर संबंधित लोगों से संपर्क किया और उन्हें 20 हजार रूपए भी दिए। चैनल से जुड़े लोगों में एक जेपी नाम का शख्स भी था, जिसने बालकिशन से डील की तथा बीस हजार रूपए लेकर रख लिए तथा दस हजार और देने की बात कही तो बालकिशन ने दस हजार बाद में देने की वादा कर दिया। रूपए देने के बाद बालकिशन बीजापुर लौट गया। उसे चैनल में अपनी स्टोरी भेजने को कह दिया गया। बालकिशन ने कुछ मामलों पर स्टोरी की और चैनल को भेजी। लेकिन स्टोरी चलाई ही नहीं गई। परेशान होकर उसने चैनल के रायपुर ब्यूरो से संपर्क किया तो उसे पता चला कि ब्यूरो चीफ चैनल छोड़ चुके हैं। जेपी नाम के शख्स को मोबाइल लगाया तो उसने रिसीव नहीं किया, हैरान-परेशान बालकिशन ने मुझे कॉल करके पूछा कि क्या किया जाए। मैंने कहा कि रायपुर पहुंचकर अपने पैसे वापस मांगों। दूसरे ही दिन बालकिशन रायपुर पहुंचा तो आफिस में कोई जवाबदार व्यक्ति नहीं मिला, पूछने पर वहां मौजूद लोगों ने उसे गोलमोल जवाब दिया। उसने मुझे फिर से फोन किया और बताया कि ये लोग तो कुछ बता नहीं रहे हैं।
मैंने फिर उसे सलाह दी कि चैनल के हेड आफिस में बात करो। उसने यह भी किया तो चैनल के सीईओ ने कह दिया कि वे लेनदेन के बारे में कुछ नहीं जानते, उन्हें इस मामले का पता नहीं, वे संबंधित लोगों से ही संपर्क करें।तब मैंने बालकिशन को मामले की एफआईआर दर्ज कराने के लिए कहा। बालकिशन ने फिर चैनल के सीईओ से संपर्क करके एफआईआर दर्ज कराने की बात कही, तो सीईओ ने कहा ऐसे में तो चैनल का नाम खराब होगा, एफआईआर दर्ज मत कराओ, देखते हैं। लेकिन आज तक न तो उस जेपी नाम के व्यक्ति का पता चल रहा है और न ही ब्यूरो चीफ का। इस तरह लुटने के बाद बालकिशन ने क्या किया, उससे संपर्क नहीं हो पा रहा है। यह बातें मैं इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि बालकिशन मेरा रिश्तेदार है और उसे इस तरह ठगे जाने का मुझे दुख है।
मुझे कतई भी बालकिशन से और ऐसे ही अन्य लोगों से सहानुभूति नहीं है, क्योंकि ऐसे लोग नासमझी में या लालच में फंसकर खुद को लुटा लेते हैं। यह तो एक उदाहरण है, इसके अलावा पिछले सप्ताह ही एक और नौसिखिए पत्रकार जीतेश ने स्ट्रिंगर बनने के लिए रायपुर में एक चैनल से संपर्क किया तो उसे भी तीस हजार रूपए जमा करने की बात कही गई। यह पूछने पर की प्रति स्टोरी कितना मिलेगा, जवाब मिला कि स्टोरी का पैसा नहीं देंगे, विज्ञापन लाओगे तो उसमें कमीशन मिलेगा। उसने मुझे यह बातें बताई तो मैंने उसे भी मना किया और कहा कि यदि हवा खाकर जीना चाहते हो या फिर लोगों को ब्लैकमेल करके कमाना-खाना चाहते हो, तब तो ऐसे चैनल के स्ट्रिंगर बन जाओ।
माफ कीजिएगा की ब्लेकमेल शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया है, जो हजारों रूपए देकर, बिना पारिश्रमिक पाए स्ट्रिंगर बन जाते हैं, बाद में चैनल के लोगों को दिए गए हजारों रूपए वापस पाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करके अपने पैसे वसूलने में लग जाते हैं। तो जाहिर है कि वे अपना पेट इसी विधि से पालते हैं, मोटा मुर्गा फंस जाए तो जमीन-जायदाद भी खरीद लेते हैं। किसी जिम्मेदार और मूल्य आधारित पत्रकारिता करने वाले पर लांछन लगाना हमारा उद्देश्य नहीं है। रोजाना नए चैनलों से जुड़ने की जद्दोजहद और जुगाड़ में लगे लोगों से यह बातें सुनकर तो मन काफी खराब हो जाता है।
ऐसे में दिमाग में सिर्फ यही सवाल उठता है कि महीनों तक अपने स्ट्रिंगर को सैलरी के लिए भटकाने वाले या बिना पारिश्रमिक दिए ही स्ट्रिंगरों से काम कराने वाले, चैनलों के प्रमुख लोग अपने स्टिंगर को ब्लैकमेलर नहीं बना रहे हैं? जिसे महीने दर महीने पारिश्रमिक ही नहीं मिलेगा, वह क्या पत्रकारिता को ताक में रखकर काम नहीं करेगा, लोगों को फंसाकर-चमकाकर वसूली नहीं करेगा? क्या वह हवा खाकर जियेगा, बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए खर्च आसमान से टपकेगा? परिवार का पेट वह अपनी लफ्फाजी से भरेगा? इतनी सामान्य सी बात कुछ चैनल प्रमुखों को या तो समझ में नहीं आती या फिर जानबूझकर ऐसे हालात पैदा किए जाते हैं कि हम कुछ नहीं देंगे, विज्ञापन या अवैध वसूली करो, खुद भी खाओ, हमें भी खिलाओ। ऐसी सोच वाले चैनल प्रमुख, टीवी पत्रकारों की कैसी नस्ल पैदा कर रहे हैं, यह बहस का मुद्दा भी है और सोच का विषय भी।
लेखक रतन जैसवानी छत्तीसगढ़ में टीवी पत्रकार हैं. उन्होंने इस लेख के माध्यम से टीवी न्यूज इंडस्ट्री में अपने कटु अनुभवों एवं दुनिया को बदलने का दावा करने वाले तथाकथित बड़े पत्रकारों की सोच को रेखांकित किया है. न्यूज चैनल की रीढ़ समझे जाने वाले स्ट्रिंगरों की कथा-व्यथा को भी उकेरा है.

