:मेरी विदेश डायरी-5 : बड़े संपादक आलोक मेहता के लिए मैं कभी नौकरी पाने लायक नहीं बन सका : जिसे मैनेज करना नहीं आएगा उसे नमस्ते बोल दिया जायेगा : कल मैं भड़ास मीडिया पर अपनी डायरी पर कुछ मित्रों की टिप्पणियां देख रहा था। मेरी पिछली डायरी पर एक मित्र ने उगांडा की भ्रप्ट व्यवस्था के बारे में बताते हुए मुझसे सहानुभूति जताते हुए अपनी आखिरी पंक्ति लिखी है- कहां फंस गए यार! चलो अच्छा हुआ, किसी ने ऐसा लिखा तो। आजकल लोगों को पढ़ने की फुर्सत कहां मिलती है, वह भी दिल्ली जैसे शहर में रहकर पत्रकारिता करनी हो तो। अब रघुवीर सहाय और राजेंद्र माथुर का जमाना तो रहा नहीं। अखबारों में जो नए लोग संपादक और ऐसे ही प्रमुख पदों पर बैठे हैं, उन्हें गंभीरता से कोई मतलब नहीं। वे त्वरित पत्रकारिता के उत्पादक तत्व बन गए हैं और अखबारों के मालिकों को खूब पसंद भी आते हैं।
मुझे याद है, जब मैं चौथी दुनिया में काम कर रहा था तो कुंभ मेले की एक स्टोरी पर एक महान लेखक और वहां के एक कालमिस्ट की केवल इसी शिकायत पर कि इस स्टोरी के साथ उनकी भेजी गई कुछ तस्वीरों में से अमुक तस्वीर क्यों लगी, मुझे वहां के इंचार्ज ने कहा कि संपादकजी को लगता है कि आप यहां ठीक से मैनेज नहीं कर पा रहे है। मैंने कहा- ठीक है, कब से नहीं आना है। मैंने उन्हें अपना गेट कार्ड आदि दे दिया और कहा- ठीक है, आपकी इच्छा है तो कल से नहीं आउंगा। मैं बाहर चला आया, किसी को बताना भी मैंने उचित नहीं समझा, क्योंकि इससे मेरा तो कुछ होता नहीं, जिससे मिलता, उस पर खतरा बढ़ जाता। पत्रकारिता का अब यही मतलब हो गया है। मैं अपने को कभी देश का सबसे र्निभीक और ईमानदार पत्रकार घोषित भी नहीं कर सका, न ही अपने पोस्टर और बैनर लगवा सका। क्योंकि मेरे पास न तो किसी बड़े सेठ को पटाने का गुर था न ही उसे बेवकूफ बनाकर उसकी पूंजी पर मौज करने का स्वभाव।
मित्र महोदय, मुझे अच्छा लगा कि आपको मेरा उगांडा आकर फंसना पसंद नहीं आया। पर भाई मेरे, भारत में मुझे कोई नौकरी नहीं देगा तो मैं करुंगा क्या? आपको पता है, मैंने बैंक की नौकरी केवल इस लालच में छोड़ी थी कि मेरे मन में पत्रकारिता के लिए एक सपना था। हमलोग रघुवीर सहाय के दिनमान के समय के सिखाए गए लोग थे। वे कवि तो थे, मगर एक अच्छे पत्रकार भी थे। जैसे प्रभाष जोशी ने जब मुझे जनसत्ता के प्रकाशन के समय पटना से दिल्ली आने को कहा था, तो अनेक कारणों से मुझे मना करना पड़ा था। पटना में वे सुरेंद्र किशोर को तय कर चुके थे। बाद के दिनों में मुझे अहसास हुआ कि आप विभिन्न अखबारों में लिखें, वही बहुत है, पर अखबार में नौकरी मांगने न जाएं। मेरे अनेक मित्र इस समय अनेक अखबारों में ऐसे पदों पर हैं कि वे चाहें तो मुझे नौकरी दिला सकते थे, पर वे सहानुभूति के सौ शब्दों के अलावा कुछ देने के मूड में नहीं दिखे।
आलोक मेहता बड़े संपादक और पत्रकार हैं। आपको पता है, जब मैं पटना नवभारत टाइम्स में था, तो वहां किसी दूसरे के कहने पर उन्होंने मेरे बारे में अजीब सा वहम पाल लिया। आज इतने साल बाद भी उनकी नजर में मैं नौकरी देने लायक नहीं बना। एक दिन मैंने उनसे नौकरी मांगी तो कहने लगे- आखिर आप क्यों बैंक की अच्छी भली नौकरी छोड़कर किसी दूसरे पत्रकार की नौकरी छीनने पर आमादा हैं। क्या इसके बाद कोई उनके पास जा सकता था ? लोगों ने कैसे कैसे खेल किए हैं, मैं कभी बाद में चर्चा करुंगा। उगांडा में रहकर मैं कम से कम एक पुस्तक तो लिख ही सकता हूं और उसमें उन सारे संपादकों और बड़े नामों के बारे में चर्चा कर सकता हूं, जिन्होंने चोला तो गंभीर पत्रकारिता का ओढ़ा, पर अंततः वे क्या-क्या थे, क्या राजनीति करते थे। मैं डा.धर्मवीर भारती, शरद जोशी, सुदीप, एस.पी.सिंह, प्रभाष जोशी, रघुवीर सहाय जैसे लोगों के लिए फ्रीलांसिंग करता था पर वे काम कराना और अपने लेखकों को बचाना भी जानते थे। रघुवीर सहाय ज्यादातर दिनमान की रपटों में लेखक का नाम नहीं छापते थे, इसके बावजूद दिनमान में लिखना उस समय अच्छा लगता था। अब वैसा क्यों नहीं लगता? शायद इसीलिए लगता है कि मेरे जैसे लोग आउटडेटेड हो गए हैं।
पर आज की पत्रकारिता यही हो गई है और मुझे अब समझना ही चाहिए कि नए समाज के निर्माण के सपने में जीने का कोई अर्थ नहीं है। अब नौकरी करो, मालिकों को खुश रखो और अपने कालम में तरह-तरह के भाषण लिखो, अपने आदर्श बघारो और सबकी आंखों में उंगली डालकर बताओ कि मुझसे अच्छा और बड़ा लेखक और पत्रकार पूरे पत्रकारिता जगत में दूसरा कोई नहीं है, मुझे सलाम करो। बैंक की नौकरी छोड़ने के बाद राजेश रपरिया पत्रकार बन सकते हैं, हरिवंश पत्रकार बन सकते हैं, और भी कई लोग बन सकते हैं, पर अंचल सिन्हा को नहीं बनने देना है। क्योंकि उसे किसी मालिक के व्यापार को बढ़ाने नहीं आता। तो भाई मेरे, थककर मेरे जैसा आदमी फाइनैंस से संबंधित काम ही तो कर सकता है। सरकारी नौकरी वापस तो मिलती नहीं। ऐसे में जिस कंपनी को यह लगा कि इसके बैंकिंग के अनुभवों का लाभ उठाओ, उसने एक मौका दे दिया और मैं रोजी रोटी के लिए अपने देश से इतनी दूर आ गया।
क्या करता, क्या सबके दरवाजे पर दयनीय बनकर नौकरी के लिए भीख मांगता? और उसके बाद भी क्या नौकरी मिल ही जाती? मिलती और दो दिनों बाद इस या उस बहाने कहा जाता कि आपको मैनेज करना नहीं आता, तो उसका क्या मतलब था। इससे अच्छा तो यह है कि किसी फाइनैंस कंपनी के लिए ही काम करो और उसके व्यापार को बढ़ाने में अपनी पूरी उर्जा लगाओ। जीवन के कुछ ही साल तो बाकी हैं, कट ही जाएंगे। यहां भी मैं निजी कंपनी में हूं और मानसिक रुप से इस बात के लिए तैयार रहता हूं कि किसी भी दिन मुझे यहां भी कहा जा सकता है कि आप मैनेज नहीं कर सकते, वापस इंडिया जाओ। एक सूटकेस और एक बैग लेकर आया था, वहीं लेकर वापस हो जाउंगा, बाकी सबकुछ यहीं छोड़कर। यादें और अनुभव लेकर लौट चलूंगा।
अब यह और बात है कि मैं यहां भी लिखने का लालच नहीं छोड़ पा रहा हूं। कौन जानता है मुझे। कुछ महीनों तक मुझे उगांडा में ही रहना है। फिर कीनिया और आसपास के दूसरे देशों में भी जाना है, उन्हें समझने का मूड है, सोमालिया के कुछ विद्रोहियों पर लिखना है। कभी पुस्तक लिखने का मौका मिला तो सब लिखूंगा। अपने देश में जिस तरह से भ्रप्टाचार किसी छोटे से आफिस के छोटे से क्लर्क और पुलिस के सिपाही से लेकर दिल्ली के बड़े से बड़े अधिकारियों तक है, उगांडा में भी है। यहां भी चुनावों में धांधली और बूथ लूटने जैसे काम हो रहे हैं, वहां भी होते हैं। असल में यहां अब ईदी अमीन वाला समय नहीं है। वह अध्याय समाप्त हुए जमाना बीत चुका। उगांडा के आम लोग, खासतौर से पढ़े-लिखे लोग यह जानते हैं कि भारत में जो शिक्षा है, यहां नहीं है। वे अपने बच्चों को इंडिया भेजने को बेचैन रहते हैं। वे आश्चर्य करते हैं यह जानकर कि वहां भी ऐसी ही चोरी और बेईमानी है। कई उगांडन गर्व से कहते हैं कि वे इंडिया चार महीने रहकर आए हैं। वे बंगलूरु और दिल्ली को ही इंडिया समझते हैं।
लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे. अंचल सिन्हा से सम्पर्क उनके फोन नंबर +256759476858 या ई-मेल – [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

