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इस ‘ब्राह्मण’ ने नहीं जीने दिया मुझे!

: मुझे खुली हवा में सांस लेने दो : मेरा जन्म एक ऐसी जगह पर हुआ जो एकदम किनारे जिले के सीमान्त पर स्थित है, जिला है अम्बेडकर नगर। जगह का नाम है- राजेसुल्तानपुर। मेरे बाबा और पिता जाति से ब्राह्मण थे और कर्म से बनिया। बनिया इसलिए कि बाबा रामशब्द पाण्डेय कानपुर मे कपड़े के एक व्यवसायी के यहां मुनीम थे। इस वातावरण का प्रभाव मेरे पिता जी पर भी पड़ा और उन्होंने भी राजेसुल्तानपुर में कपड़े का व्यवसाय शुरू किया, जो आज तक चल रहा है। 27 साल की इस उम्र तक मुझे कायदे से याद है, जब से मैंने होश सम्भाला, मेरे घर हिंदुओं में सर्वाधिक प्रचलित सत्यनारायण की कथा एकाध बार ही हुई है। पिता जी को मैंने घंटी टुनटुनाते कभी नहीं देखा। हां! सुबह-सुबह दुकान खोलने पर अगरबत्ती अवश्य सुलगाते थे।

: मुझे खुली हवा में सांस लेने दो : मेरा जन्म एक ऐसी जगह पर हुआ जो एकदम किनारे जिले के सीमान्त पर स्थित है, जिला है अम्बेडकर नगर। जगह का नाम है- राजेसुल्तानपुर। मेरे बाबा और पिता जाति से ब्राह्मण थे और कर्म से बनिया। बनिया इसलिए कि बाबा रामशब्द पाण्डेय कानपुर मे कपड़े के एक व्यवसायी के यहां मुनीम थे। इस वातावरण का प्रभाव मेरे पिता जी पर भी पड़ा और उन्होंने भी राजेसुल्तानपुर में कपड़े का व्यवसाय शुरू किया, जो आज तक चल रहा है। 27 साल की इस उम्र तक मुझे कायदे से याद है, जब से मैंने होश सम्भाला, मेरे घर हिंदुओं में सर्वाधिक प्रचलित सत्यनारायण की कथा एकाध बार ही हुई है। पिता जी को मैंने घंटी टुनटुनाते कभी नहीं देखा। हां! सुबह-सुबह दुकान खोलने पर अगरबत्ती अवश्य सुलगाते थे।

लब्बो-लुआब यह की घर में परम्परागत ब्राह्मणी तौर-तरीके वाला पूजा-पाठ कम ही होता था। फिर भी हम ब्राह्मण थे और पूजित होने का परम्परागत जातिगत विशेषाधिकार हमें प्राप्त था। हालांकि ‘पूजहिं विप्र सकल गुणहीना’ का तर्क मेरी समझ में आज तक नहीं आया है।उच्चजाति में पैदा होने से जहां कुछ (बहुत कुछ) विशेषाधिकार मिले थे, वहीं कुछ ऐसी बातें थीं जो हमेशा ‘मेरे आदमी’ के सामने तीक्ष्णदंत मुख बाये खड़ी रहती थी। वे मेरे उन विशेषाधिकारों का हनन करती थी, जो एक मनुष्य होने के नाते मुझे मिलने चाहिए थे। मसलन, खुलकर जीने की इच्छा, अपनी उन आदिम व शाश्वत भावनाओं को प्रकट करने की इच्छा, जो मनुष्य होने का प्रमाण थी। किन्तु मेरे समाज (जातिवादी समाज) को इस सबकी फिक्र कहां थी। उसे तो अपनी उस सड़ी-गली, बदबूदार व्यवस्था को अक्षुण्‍य रखने की चिंता थी जो सारे सांस्कृतिक विकास पर एक बदनुमा दाग़ है। उसके लिए वह मेरे जैसे कितनों को कुचल डालने के लिए तत्पर रहता है।

मुझे याद आता है कि सन् 90‘ के आस-पास जब मैं सात-आठ साल का था और उसके दो साल बाद जब इतिहास एक खतरनाक मोड़ लेने वाला था, तब हमारे पास के गांधी स्मारक इंटर कॉलेज, राजेसुल्तानपुर में आरएसएस की शाखाएं जोर-शोर से चलती थी। इन शाखाओं में लगभग सभी जातियों के बच्चे जाते थे। बच्चों के अलावा उम्र में सयाने लड़के भी जाते थे, लगभग 20 वर्ष तक के। वहां तमाम तरह के खेल-खों-खों, भाग-छू, कबड्डी आदि खिलाये जाते थे। मैं भी इन शाखाओं में सुबह-सुबह जाने के लिए मचला करता था, हालांकि उस उम्र में आज की तरह मालूम नहीं था कि यह सब किस खूंरेंजी की तैयारी थी, पर मुझे खेलने जाने नहीं दिया जाता था। जबकि वहां पर उस सामंती नैतिक शिक्षा का बोल-बाला था,  जिसका धीमा ज़हर हमारी धमनियों में परिवार से लेकर स्कूलों तक भरा जाता था। जिनके प्रति सवालों का अकाल था।

मेरे मन में हमेशा यह बात खटकती कि जब इन शाखाओं में इतनी ‘अच्छी-अच्छी बातें’ सिखायी जाती हैं, तब पिताजी वहां जाने की इजाज़त क्यों नहीं देते? पर अब इसका कारण जान गया हूं। एक बात गौर करने लायक है कि शाखा में वर्ण व्यवस्था के नीचे से दूसरे पायदान पर स्थित जातियों के लड़कों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी। शायद मेरे घरवालों व उन जैसे तमाम तथाकथित जातियों के लोगों को आगामी खूंरेंजी की आशंका थी। फिर सवाल यह है कि वे हिंदू व ब्राह्मण होते हुए भी तथाकथित ‘धर्मयुद्ध’ की तैयारी में प्रत्यक्ष हिस्सा क्यों नहीं लेना चाहते? क्या वे धर्मोन्माद के विरोधी थे? नहीं, दरअसल वे चाहते यह थे युद्ध हो, लेकिन अपनों का खून न बहे। वे दूसरों के कंधों पर रखकर बंदूक दागना चाहते थे। इसी दोगले चरित्र ने मुझे खेलने जाने से रोका। खेल दूसरी भी जगह न खेल सका। मुहल्ले में चहारदीवारी से घिरी एक विवादित जमीन का टुकड़ा था। जिसमें मुहल्ले के सारे बच्चे खेलने जाते थे, जिसमें अधिकांशतः पिछड़ी जातियों के बच्चे थे। इनके साथ खेलने पर मार पड़ती थी क्योंकि हमारी जाति उंची थी। यही कारण है कि मैं आज भी खेलों में फिसड्डी हूं।

हमारे बाज़ार में रामलीला भी होती थी। कभी-कभी आस-पास होने वाले शादी-ब्याह में नौटंकी भी होती थी। पास-पड़ोस के कई लड़के उसे देखने जाते थे। मेरे भी मन इनके प्रति सदा से उत्साह रहता, परन्तु यह उत्साह प्रकट न हो सकता था। क्योंकि इन्हें देखने जाने की मनाही थी। कभी-कभी जाने की जिद करने पर अभिभावकों का तर्क मिलता- वहां अच्छे घरों के बच्चे नहीं जाते। यहां पर ‘अच्छे घरों’ से तात्पर्य उंची जाति से होता था। जहां वेदों की वाणी सुनने की सजा कान में पिघला शीशा रही हो, वहां किसी ऐसी चीज कल्पना कैसी की जा सकती है जो सभी वर्णों के लिए हो। कहते हैं कि नाटक को पंचम वेद की संज्ञा प्रदान की गई है। क्योंकि यह उस वर्ण के लिए भी था जो चतुर्वर्ण से बाहर पंचम वर्ण है। जाहिर है कि रामलीला, नौटंकी नाटक की ही विविध शैलियां हैं। हालांकि पिताजी भरत मुनि का नाट्यशास्त्र नहीं पढ़े थे, किन्तु सदियों से घृणा सिंचित ब्राह्मण मानस की कुष्ठ-गलित वैचारिकी जातिवादी मस्तिष्क के चेतन-अवचेतन में इस कदर घुल चुकी थी कि रामलीला-नौटंकी सवर्ण वर्जयेत्।

इस तरह के एक नहीं सैकड़ों कटु अनुभव हैं, जिसमें ब्राह्मण होने का खामियाजा एक बच्चे को भुगतना पड़ा। कितनी अमानवीय है यह व्यवस्था, जहां एक बच्चे की कोमल भावनाओं को निर्ममता से कुचल दिया जाता है। हमेशा से अपने बाजार के खटिक लड़कों को देखकर मन दुःखता था। कितने मस्त हैं, चाहे जहां जाते हैं, नाचते हैं, खाते हैं, पीते हैं। मानो इनके पूर्वजों ने आदमियत के दमन के दर्द को महसूस किया हो और ‘अपने लोगों’ को ऐसा दर्द न देने की कसम खा रखी हो तथा समस्त ब्राह्मणवादी नैतिकता को नकार दिया हो।

बड़े होने पर बीए की पढ़ाई करने इलाहाबाद आया, तब भी जाति ने पीछा नहीं छोड़ा। सोचता था कि यह तो बुद्धिजीवियों, पढ़ने-लिखने वालों की नगरी है, वहां खुली हवा में सांस लेने का सुकून तो जरूर होगा। एडमिशन लेते वक्त, किराये का कमरा ढूंढते वक्त, लोगों से बात करते वक्त हमेशा जाति का संदर्भ जारी रहा। बीए द्वितीय वर्ष की पढ़ाई के दौरान अन्तरदेशीय वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए दिल्ली जाते समय ट्रेन में एक महाशय मिले। उम्र रही होगी लगभग 70 साल, रेलवे से सेवामुक्त। बातचीत होने लगी। उन्होंने मेरा नाम पूछा।

राजन पाण्डेय कहते ही उन्होंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। मैंने लक्ष्य किया ‘राजन’ के बाद ‘पाण्डेय’ शब्द जैसे ही उन्होंने सुना वैसी ही उनका हाथ हरकत में आया। यह अनुमान लगाना सहज था कि महाशय ब्राह्मण जाति के है। अनुमान पुष्ट भी हुआ। मैंने सोचा यदि ‘राजन’ के आगे कोई दूसरा, या जिसे तथाकथित बड़े और उंचे लोग अछूत जाति या नीच जाति कहते हैं, का सरनेम लगा होता तो यह व्यक्ति मुझसे हाथ नहीं मिलाता। मुझे लगा मेरे जाति-इतर व्यक्तित्व का कोई महत्व नहीं है। मेरे अपने ज्ञान व बुद्धि का कोई मूल्य नहीं है। महत्व और मूल्य है उस कट्टर व्यवस्था का जो सदियों से चली आ रही है।

लगभग एक वर्ष बाद जब  मैंने एक दलित मित्र को अपना रूम पार्टनर बनाया, तब मेरे ब्राह्मण मित्रों ने मुझे खूब कोसा। फब्तियां कसी, चुटकियां ली, पर मैं डटा रहा। वे कुढ़ते रहे, मैं मुस्कुराता रहा क्यों कि मैं जानता था, और मैं जानता हूं- वे एक दिन मिट जांएगे। क्योंकि अस्वीकार्य को अधिक दिनों तक लादा नहीं जा सकता। जाति का विषदंत मेरे शरीर में हमेशा चुभता रहा। प्रगतिशील दलित मित्रों की मंडली भी ‘ब्राह्मण’ कह कर मेरा उपहास करते। मानो मैं ब्राह्मणशाही का प्रतिनिधि हूं और ब्राह्मण परिवार में पैदा हो जाने के कारण ब्राह्मणशाही का सारा गुनाह मेरे सिर पर है। हालांकि ये दोस्त थे और यह मज़ाक था। लेकिन मज़ाक का भी कोई भौतिक आधार होता है।

ब्राह्मण परिवार में पैदा होने के कारण ही यह खामियाजा भरना पड़ा। उच्चता का झूठा दम्भ आकांक्षाओं पर हथौड़े सा पड़ता रहा। खेलने, बोलने, देखने-सुनने, पढ़ने-लिखने से लेकर प्रत्येक आचार-विचार में एक तर्कहीन नैतिकता मुझे आक्रांत और दमित करती रही। आज जब कि जीवन के 27 साल पूरे हो चुके हैं, घर जाता हूं तो देखता हूं कि राजेसुल्तानपुर में शहर आ रहा है। विभिन्न मोबाइल कम्पनियों के प्रचार वाले बैनर इफ़रात हो रहे हैं लेकिन अब भी चौराहे पर बरसात का पानी उसी तरह इकट्ठा होकर बदबू करता है, जैसे बीस बरस पहले करता था।

लेखक राजन पांडेय स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं. राजन से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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