: मीडिया को नहीं दिखते अहिंसक आंदोलन :हिन्दुस्तान में आए दिन किसी न किसी बात को लेकर विरोध-प्रदर्शन और धरने आदि का कार्यक्रम सम्पन्न होता रहता है। इन प्रदर्शनों के पीछे व्यापक असंतोष और व्यवस्था के प्रति आक्रोश छिपा रहता है। अलीगढ़ के किसान आंदोलन और नियामगिरि के आदिवासियों का विरोध भी इसी में से एक है। लेकिन हालिया वस्तुस्थिति को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो रही है कि मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आक्रोश की अभिव्यक्ति कुछ हद तक हिंसक होनी चाहिए। नेता वहीं जाते हैं जहां हिंसा हो चुकी होती है। जैसे जम्मू-कश्मीर में हो रहे निरंतर पथराव ने मीडिया और सरकार की नींद तोड़ी। आक्रोश इससे पहले भी था, लेकिन पथराव ने ही तंद्रा को भंग किया।
अब प्रधानमंत्री ने बयान दिया कि हम जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता पर विचार करेंगे और वहां राजनीतिक पैकेज भेजेंगे। नक्सलवादियों ने हिंसक वारदातों की जब सीमा पार कर दी तब ही कहा गया कि हम बातचीत के लिए तैयार हैं । प्रश्न उठता है कि क्या मीडिया के माध्यम से सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का हिंसा ही एक सहारा बचा है? पिछले कई वर्षों से किसी अहिंसक आंदोलन की ओर भी क्या सरकार ने ध्यान दिया है? किसी आंदोलन को सफल बनाने के लिए कुछ मौतों का होना क्या आवश्यक शर्त बन गई है? बात सरकार के कानों तक जूं रेंगने की होती तो भी ठीक था, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका इसमें सरकार से भी बदतर दिखाई देती है।
अभी हाल में लोक सेवा आयोग द्वारा घोषित 2010 की प्री-परीक्षा के परिणाम में व्यापक अनियमितता के आरोप छात्रों ने लगाए। छात्र जब लोक सेवा आयोग में अहिंसक प्रदर्शन कर रहे थे, उस समय मीडिया सुनंदा पुष्कर की साड़ी की कीमत और कम्पनी की छानबीन में व्यस्त था। दूसरे दिन जब छात्रों ने जंतर-मंतर पर अहिंसक धरना-प्रदर्शन किया तो मीडिया तंत्र दिल्ली के जाम में फंसा रहा। ये छात्र पुनः 29 तारीख को गांधी की सौगंध खाकर हजारों की संख्या में कैंडल मार्च लेकर जंतर-मंतर पहुंचे। जब ये सरकार को मोमबत्ती की रौशनी दिखा रहे थे तब मीडिया सलमान खान के दिल्ली आगमन पर जश्न मना रहा था। मीडिया और सरकार से दूर छात्रों के आंसू और मोमबत्ती की पिघलन एक साथ गिर रहे थे ।
सबके चेहरे पर एक ही प्रश्न था कि क्या गांधी के देश में बिना हिंसा के न्याय नहीं मिल सकता? क्या बिना लाखों की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाए अपनी बात नहीं पहुंचाई जा सकती। भला हो उस प्रिंट मीडिया का जिसने थोड़ा सा स्थान इस अहिंसक आंदोलन को भी दिया। आजादी के पहले गांधी जी ने जब अहिंसक आंदोलन की शुरूआत की थी तो ब्रिटिश सरकार ने उसे दबाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी। फिर भी आंदोलन सफल रहा, कारण कि मीडिया ने पूरे देश में जो लहर पैदा की थी उसे अंग्रेज क्या दुनिया की कोई भी ताकत नहीं दबा सकती थी। मीडिया गांधी की ताकत थी जो आज राखी सावंत के पल्लू से बाहर निकलने में असमर्थ है। मणिपुर में पिछले एक दशक से अहिंसक आंदोलन पर बैठी शर्मिला इरोम का इंतजार खत्म होता नजर नहीं आता, क्योकि गांधी का यह देश अब गांधी का नहीं रहा!
मीडिया और राजनीतिज्ञों का गठजोड़ भी इस समय अद्वितीय हो गया है। राजनेता वहीं की सुध लेते हैं जिसे मीडिया हाइलाइट करता है और मीडिया तभी उसमें रूचि लेती है जब राजनेता अपना हित साधने के लिए पहुंच चुके होते हैं। मीडिया की टीआरपी के पैमाने देश के कुल 7000 घरों में तैनात हैं और राजनीतिज्ञों अपने वोट बैंक हैं। अगर कोई इन पैमानों से बाहर है तो वह कितना ही जोर आजमाइश करे, इन्हें प्रभावित नहीं कर सकता। फिर एक ही रास्ता बचता है वह है हिंसा। हिंसा कीजिए, दो-चार नौजवानों की बलि मीडिया और सरकार पर चढ़ा दीजिए, फिर देखिए मीडिया और राजनेता दोनों आपके दरवाजे पर पड़े कुछ चावल के दानों के लिए आपस में लडते नजर आएंगे। पीपली लाइव का नत्था जो सीएम और विपक्ष दोनों को पसंद आया, इसी का उदाहरण है।
मीडिया का कार्य लोगों की संवेदना से जुड़ा हुआ है। इसके साथ मजाक नहीं होना चाहिए। यदि मीडिया अपनी सही भूमिका निभाए, ऐसे अहिंसक आंदोलनों को स्थान दे, सरकार का ध्यान आकर्षित करे तो बिना हिंसा के भी कुछ अच्छे समाधान संभव हो सकते हैं। जागो मीडिया पहले तुम जागो, फिर जनता को जगाना!
लेखक रामानंद मिश्रा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में गांधी के सत्याग्रह और आज के आंदोलन विषय में शोधरत हैं.

