: जवाबदेही तय होनी चाहिए : पत्रकारों, कवियों, सचरित्र जनप्रतिनिधियों, प्रबुद्ध नागरिकों को राष्ट्र व बेहतर समाज के निर्माण के लिए ‘‘भ्रष्टाचार के खिलाफ’’ आगे आना ही होगा, यही समय की मांग भी है। देश की प्रगति, गरीबी और बेरोजगारी उन्मूलन और साफ सुथरी राजनीति तथा पारदर्शी प्रशासन के लिए ऊपर से नीचे तक पैर जमा चुके भ्रष्टाचार को मिटाना ही होगा, तभी देश की खुशहाली सम्भव है और सही अर्थो में लोकतंत्र भी। जब तक सरकारी और जन कल्याणकारी योजनाओं का फायदा आम आदमी तक नहीं पहुंचेगा तथा आंवटित धनराशि ईमानदारी के साथ योजनओं के अमल पर खर्च नहीं की जायेगी और बीच में ही बंदरबांट की जाती रहेगी तब तक देश में खुशहाली आना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। यह तभी मुमकिन है जब शासक और प्रशासक जवाबदेही के साथ पारदर्शिता बनायें।
भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने, जनजागरण करने, नागरिक समाज को खड़ा करने से पहले जरूरी है कि हम यह तो जाने कि आखिर भ्रष्टाचार है क्या? हमारे देश मे अभी भ्रष्टाचार की परिभाषा को लेकर भी तरह-तरह की उलझने है। यह भी सच्चाई है कि जब तक भ्रष्टाचार को ठीक तरह समझा नहीं जायेगा तब तक इस पर काबू पाया जाना भी नामुनकिन है। कैग के पूर्व निदेशक वीएन कौल के मुताबिक भ्रष्टाचार पर काबू रखने की जिम्मेदारी देखने वाले विजिलेंस अधिकारियों को ही अपनी ड्यूटी के बारे में पूरी तरह से यह पता नही है कि उसे किस-किस व्यवहार को भ्रष्टाचार मानना है और किस-किस को नहीं। यही नहीं भ्रष्टाचार को लेकर शोर-शराबा भी खूब होता है किन्तु व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की प्रणाली दूर-दूर तक नजर नहीं आती। कल तक साधारण मकान में रहने वाला, विधायक व सांसद बनने के कुछ महीनों बाद अकूत सम्पदा व महल रूपी बंगले, आयातित वाहनों का, स्वामी कैसे हो गया इसकी जवाब देही जरूरी ही नही समझी जाती।
एक साधारण अधिकारी, अनुभाग अधिकारी जो 25 से 30 हजार मात्र वेतन प्राप्त करते है राजसी संसाधनों से युक्त हैं। बंगला, चार पहिया वाहन एक नही चार-चार हैं किंतु जवाबदेही कोई नहीं। तात्पर्य यह है कि जवाबदेही प्रणाली को प्रमुखता से प्रभावी किया जाना चाहिए। आज हालात यह है कि किसी विभाग में भ्रष्टाचार का अगर खुलासा हो भी गया तो पूरे विभाग को ही जिम्मेदार मान लिया जाता है और शीर्ष पर बैठे उस भ्रष्टाचार का नायक बच निकलता है। लिहाजा व्यक्तिगत जवाबदेही जांचने की प्रणाली को तैयार करना जरूरी है। इसके अलावा अगर अथारटी को विकेन्द्रीकृत कर दिया जाये, तब भी भ्रष्टाचार पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। वर्तमान मे जगह-जगह व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए पारदर्शिता बरतना बेहद जरूरी है। सूचना का अधिकार कानून इस दिशा में बेहद अच्छा कदम है। अगर सरकार इसे ढंग से प्रभावी करे तो इसमें कोई दो राय नहीं काफी हद तक लोगों की परेशानियां कम हो जायेंगी। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि आरटीआई के तहत सूचनायें देने में कहीं अधिकारी चालाकी तो नहीं कर रहे हैं।
सच्चाई यह है कि कमजोर शासन भ्रष्टाचार की फसल को खाद देने में अहम किरदार निभा रहा है। गठबंधन सरकारों की राजसत्ता को बचाये रखने के लिए मजबूरियां भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही हैं। स्थिति यह है कि राजनैतिक-अनैतिक दबाव पुलिस विभाग एवं अन्य विभागों को भी कमजोर कर रही है। गैर-जरूरी तबादलों ने भी सिस्टम को काफी खराब किया है। अक्सर देखने में आया है कि लगन व निष्ठा से कार्य में लगे ईमानदार अधिकारी राजनेताओं की नाजायज सिफारिस न मानने के कारण चन्द महीनों में ही इधर-उधर पटक दिये गये। यानी नाजायज काम में भी नेताओं का कालर ऊंचा रहे, नही तो खैर नहीं। ऐसी स्थित में ईमानदारी बरतने की जब यह सजा मिलती है तो मजबूरन उसे भी यह सोचना पड़ जाता है कि क्यों न बह रही बयार में ही शामिल होकर चला जाये ।
थैली-अटैची भेंट कर लाभप्रद कुर्सी पाने वाले अधिकारियों का उदाहरण दें- आधुनिकता से घिरे पाश्चात्य संस्कृति को अंगीकार किये इनके बच्चे भी इन्हें घर पर जब यह कहते नजर आते है कि एक वो है, जो बंगला गाड़ी फार्म हाउस सब कुछ कर लिया और एक आप हैं उसी पद पर, लेकिन आज तक कुछ नही जुटा पाये? कहने का तात्पर्य है कि जरूरत है इमानदार अधिकारियों को सशक्त करने की, प्रोत्साहित किये जाने की, सम्मानित किये जाने की और पदोन्नति किये जाने की।
लोकायुक्त न्यायमूर्ति एस हेगड़े द्वारा दिया गया इस्तीफा, डा किरन बेदी द्वारा वीआरएस लेना, आयकर आयुक्त द्वारा नौकरी छोड़ना शासन प्रणाली की नीतियों का स्वमेव खुलासा कर रहे है। जरा सोचे- हॉ हजूरी, जायज-नाजायज में बिना भेदभाव किये जो अधिकारी नेता व देश-प्रदेश के नायकों के इशारों पर कठपुतली की भांति नाचेगा वह शीर्ष कुर्सी तक पहुंचेगा और जो नाजायज को तरजीह नही देगा तो इनका कोपभाजन बनेगा, तो कैसे होगा लोकतंत्र मजबूत, कैसे आयेगी भारत में खुशहाली, और तो और सीबीआई को भी अभी तक स्वतंत्र नही किया गया है, लोकायुक्त जैसी संस्थाओं के पास भी सीमित शक्तियां ही हैं और उस पर भी शासक का उल्टा दबाव तो भला कैसे हो भ्रष्टाचार पर काबू होगा? जब भी कहीं भ्रष्टाचार का मामला उजागर होता है तो समिति बना दी जाती है। वित्तीय और आर्थिक अपराध शाखाएं बैठा दी जाती है जब कि यह समस्या का हल नहीं है, जरूरत तो इस बात की है कि ऐसी संस्थाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए। इनकी शक्तियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
मेरा मानना यह भी है कि देश में अफसरों की संख्या भी बहुत ज्यादा है, जिसे कम किया जाना चाहिए। इससे न केवल पैसा बचेगा बल्कि कार्य क्षमता में भी इजाफा होगा। ओवर स्टाफिंग और संसाधनो का गलत तरीके से किया गया आवंटन भी भ्रष्टाचार को मजबूती देता है। चूंकि जहां जरूरत से ज्यादा संसाधन होगें वहां भ्रष्टाचार पैदा होगा ही, हर समस्या के लिये नये कानून बनाये जाते रहें यह भी जरूरी नही है और न ही समस्या का हल है। जरूरत तो मौजूदा कानून को ठीक ढंग से लागू करने व उसे प्रभावी बनाये जाने की है। जैसे पुलिस, विकास प्राधिकरण, कृषि, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य। जो प्रमुख संस्थायें हैं उनमें बेइमानी के आरोपों वाले किसी भी अधिकारी को प्रमुख न बनाया जाये। ईमानदार अधिकारियों को ही महत्वपूर्ण संस्थाओं का प्रमुख बनाया जाये तो भी काफी हद तक सुधार संभव है।
लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

