: संयुक्त राष्ट्र अन्तर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर विशेष : दुनिया जहां एक और चांद पर जाने की बात कर रही है, वहीं यह देख कर अचंभा होता है कि तेजगति से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में अभी भी मंदिर-मस्जिद व जातिगत गणनाएं राजनीति की धुरी तय करते हैं। किंतु हमारी न्याय व्यवस्था बहुत पुख्ता है, जिसमें इस बात का प्रावधान है कि बेशक 10 अपराधियों को छोड़ दिया जाए, लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। यहां सवाल यह नहीं है कि क्या ऐसा सच में हो पाता है? यहां सवाल है 24 सितंबर का, जिस दिन बाबरी मस्जिद विध्वंस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। हाईकोर्ट ने 16 सितम्बर को अपने इरादे बिल्कुल स्पष्ट कर दिए हैं कि पहले ही बहुत देर हो चुकी है और अब फैसले की घड़ी आ चुकी है।
डर इस बात का है कि फैसले से किसी एक समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं, अगर ऐसा हुआ तो ऐसे में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ सकती है। किंतु साथ ही यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि न्यायालय कोई ऐसा निर्णय भी सुना सकता है, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत होने की बजाए बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे पर हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की नई पहल हो सके और यह यह तभी संभव है जब यहां मंदिर-मस्जिद के बजाए अस्पताल बने या स्कूल। यहां पर बने अस्पताल में शिशुओं की किलकारियों से नई जिंदगियों की शुरूआत हो सकेगी या स्कूल बनने से धार्मिक व जातिगत अंधेरे को दूर कर शिक्षा की मशाल से भारतीयों के दिलों में एकता की रोशनी को रोशन किया जा सकेगा। जिससे नफरत के स्थान पर आपसी भाईचारा बढ़ेगा।
कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि बाबरी विध्वंस की राख में देश के राजनीतिक दल वोट बैंक की चिंगारी को हवा देकर राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं का बलिदान दिखाकर सत्ता हासिल करने में फायदा लिया जा सके। किंतु इन नेताओं और न्यायधीशों को इस बात का भी अंदेशा होना चाहिए कि देश की जनता मस्जिद के खंडहरों में शांति और भाईचारे के चिन्ह ढूंढ रही है। जहां अब मस्जिद के ढहाए गए गुंबद हैं वहां कभी मंदिर भी हुआ करता था। क्योंकि इतिहास वेक्ताओं के अनुसार यह स्थान मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली है। बेशक देश के कुछ दल और संगठन अयोध्या में राम मंदिर और मस्जिद निर्माण की बात कर रहे हों किंतु हमारे न्यायालय को यह सोचना चाहिए कि क्या यह दल और संगठन वाकई देश की 112 करोड़ से अधिक जनसंख्या का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
न्यायालय को यह विचार करते हुए कि देश की जनता क्या चाहती है अपना निर्णय देना होगा, तभी इस लंबित न्यायिक निर्णय की सराहना हो सकेगी। निर्णय जो भी हो हमारे देश की जनता शांति और खुशहाली चाहती है। क्योंकि भारत के अंदर केवल हिंदू और मुसलमान ही नहीं रहते यहां अन्य समुदाय और धर्म को मानने वाले लोग भी रहते हैं, जिनकी भावनाओं का ध्यान और देश में एकता व खुशहाली को ध्यान में रखकर ही निर्णय होना चाहिए। यहां एक बात और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से तीन दिन पहले 21 सितंबर 2010 विश्वभर में संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जा रहा है। जिसके तीन दिन बाद महीने की 24 तारीख को न्यायालय बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अपना फैसला सुनाएगा। अदालत अपने फैसले में कुछ नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को सजा भी दे सकती है, जिन पार्टी के कार्यकर्ताओं को सजा मिलेगी, वह पार्टी भगवान राम के नाम को फिर से जोरशोर से उछालेगी और भीड़तंत्र में वोट बैंक को कैश करने की पूरी कोशिश करेगी। ऐसे में कानून व्यवस्था के रखवालों को देश भर में पुख्ता व्यवस्था करनी होगी, साथ ही जनभावना को भड़काने वालों के खिलाफ सख्ती से काम लेना होगा तभी सारे परिणाम सकारात्मक आ पाएंगे।
उल्लेखनीय है कि 06 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के गुंबदों पर चढकर हिंदुत्व के नाम पर बाबरी मस्जिद को ढहाने का कार्य किया गया था। जिसमें भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुई और उन्हें बाबरी मस्जिद विध्वंस का आरोपी बनाया गया है। इस विध्वंस की जांच के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश एमएस लिब्राहन आयोग गठित किया गया। जिसका गठन भारतीय गृहमंत्रालय की संस्तुति पर 16 दिसंबर 1992 को किया गया, इस आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन महीने में सरकार को सौंपनी थी। जिसे 17 साल की देरी के बाद एक सदस्यीय आयोग के कर्ताधर्ता सेवानिवृत्त न्यायधीश एमएस लिब्राहन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 30 जून 2009 को सौंपी। हैरत की बात तो यह है कि लिब्राहन आयोग को जांच और आरोपियों के बयान दर्ज करने में सरकार से 48 बार आयोग के कार्यविस्तार की मंजूरी मिली। इतना ही नहीं जब नवंबर 2009 में यह रिपोर्ट चर्चा के लिए संसद पटल पर रखी जानी थी तो मीडिया में इसके लीक होने से बवाल खड़ा हो गया।
एक सदस्यीय इस जांच आयोग का सरकारी तौर पर खर्च 8 करोड़ (अस्सी मीलियन) रूपए आया है। हालांकि आयोग ने विध्वंस आरोपियों के बयान अगस्त 2005 तक कलमबद्व कर लिए गए थे। जिनमें अंतिम बयान उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह का दर्ज किया गया है। इन 17 सालों में लिब्राहन आयोग द्वारा कई राजनेताओं, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव, पूर्व उप प्रधानमंत्री एलके आडवाणी, भाजपा नेता कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव मुख्य तौर पर शामिल हैं। इनके अलावा टॉप ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस अधिकारियों सहित जिला मजिस्ट्रेट आरएन श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी रॉय के बयान भी बाबरी विध्वंस पर दर्ज किए गए हैं। कमीशन ने बाबरी मस्जिद विध्वंस पर एक सौ गवाहों की बयानी दर्ज की है, जिसमें कुछ प्रमुखों के नाम इस प्रकार हैं:-
1. मार्क टुली, जर्नलिस्ट
2. पीआर कुमार मंगलम्, केंद्रीय मंत्री
3. एसबी चौहान, केंद्रीय गृहमंत्री
4. उमा भारती, भाजपा नेता
5. केएस सुदर्शन, आरएसएस नेता
6. ज्योति बासु सीपीआई (एम) नेता
7. मुरली मनोहर जोशी, भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद
8. लाल कृष्ण आडवाणी, भाजपा नेता
9. विनय कटियार, भाजपा सांसद
10. विष्णुहरि डालमिया, विश्वहिंदू परिषद के अध्यक्ष
11. वीपी सिंह पूर्व प्रधानमंत्री और जनतादल के नेता
12. कल्याण सिंह, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश
13. पीवी नरसिम्हा राव, पूर्व प्रधानमंत्री
14. तेज शंकर, अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट के पर्यावेक्षक
15. अर्जुन सिंह, मानव संसाधन मंत्री
16. स्वामी सच्चिदानंद साक्षी, भाजपा सांसद और निर्मल पंचायत अखाडा हरिद्वारा के आचार्य
17. अशोक सिंघल, विश्वहिंदू परिषद के नेता
18. कालराज मिश्र, भाजपा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष
19. महंत परमहंस रामचंद्रदास, रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष
20. मुलायम सिंह यादव, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश
21. माधव गोडबोले, केंद्रीय गृह सचिव
भाजपा और कांग्रेस के बीच अयोध्या मसला लंबे समय से विवादस्पद रहा है। बाबरी मस्जिद का निर्माण सन् 1527 में और विध्वंस 1992 में किया गया। जिसकी राख में राजनीतिक दल वोट बैंक की चिंगारी और उसके खंडहरों में देशवासी शांति और भाईचारे के चिन्ह ढूंढ रहे हैं। अपने निर्णायिक फैसले में कोर्ट को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वह राजनीतिक दलों के मंसूबों पर पानी फेरते हुए मानवता के हक में न्याय करे। जिससे हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बना रहे। ऐसा तभी होगा जब इस विवादपूर्ण स्थल पर मंदिर-मस्जिद की जगह अस्पताल बने या स्कूल। जिससे जातिगत भावना से ऊपर उठकर कुंठित मानसिकताओं का उपचार संभव हो सकेगा।
लेखक एस के गुप्ता दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, ऑल इंडिया रेडियो और जनसत्ता में कार्य कर चुके हैं.

