बाबरी मस्जिद बनाम राम मंदिर के मुकदमे का फैसला आने में एक दिन बचा है। कल आने वाले फैसले को लेकर मेरठ में कोई बवाल न हो, इसके लिए यहां की अवाम और प्रशासन एकजुट हो गया है। कई खूरेंज दंगों का दंश झेल चुका मेरठ अतीत को भूलकर तरक्की की राह पर है। एक वक्त था, जब इस शहर के हिन्दू और मुसलमान लोग एक-दूसरे को शक की नजरों से देखा करते थे। कहते हैं कि वक्त बहुत बड़ा मरहम होता है। वक्त ने और सियासतदानों के ‘असली’ चेहरे सामने आने के बाद इस शहर के लोग फिर से एक-दूसरे के साथ पहले से अधिक जोश के साथ, साथ-साथ रहने, व्यापार करने, और एक दूसरे की खुशी में शरीक होने लगे। यहां का अवाम समझ गया है कि दंगों से सिवाय नुकसान के कुछ हासिल नहीं होता। दंगों ने इस शहर की तरक्की पर ब्रेक लगा दिए थे। यहां उद्योगपति कारखाने लगाने से कतराने लगे थे।
एक जमाना था, जब मुसलमान हिन्दू बाहुल्य इलाके के मैरिज हॉल में शादियां करते हुए घबराते थे। पिछले दस सालों से यह हुआ है कि हिन्दू बहुल इलाके के मैरिज हॉलों में मुसलमान शादियां कर रहे हैं। किसी हिन्दू की शादी मे बड़ी संख्या में मुसलमान शिरकत करते हैं तो मुसलमान की शादी में हिन्दू भागीदारी करते हैं। मुस्लिम की शादी में हिन्दू मेहमानों के लिए अलग से शाकाहार खाने का इन्तजाम किया जाता है। दूरियां मिट चुकी हैं। पिछले कई सालों से शहर को कई बार दंगों की आग में झोंकने की कोशिशें कुछ स्वार्थी तत्व कर चुके हैं, लेकिन मेरठ के हिन्दू और मुसलमानों ने उनकी हर कोशिश को नाकामयाब किया। ‘दंगों का शहर’ से कुख्यात रहे मेरठ ने इस दाग को किसी हद तक धो दिया है।
24 सितम्बर यानी कल आने वाले फैसले की इस घड़ी में भी मेरठ के हिन्दू और मुसलमान हर कीमत पर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए कटिबद्ध नजर आ रहे हैं। मेरठ के जो नेता किसी जमाने में आग उगलते थे, आज अदालत के फैसले का सम्मान करने की अपील कर रहे हैं। हर वह शख्स और संस्था, जो किसी भी कीमत पर हालात बिगड़ने न देने के लिए संकल्पबद्ध हैं, अपने-अपने तरीके से लोगों को समझा रहे हैं। लोगों में इसका असर भी पड़ रहा है। प्रशासन भी शहर के अमन को बनाए रखने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। शरपसंद लोगों से निपटने के लिए आज शहर को सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया गया है। प्रशासन स्तर से एसएमएस के जरिए लोगों को हर कीमत पर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की अपील की जा रही हैं। मिली-जुली आबादी में एक सप्ताह पहले से ही सुरक्षा बल तैनात हैं। अच्छी बात यह है कि ‘आस्था का फैसला अदालत नहीं कर सकती’ कहने वाले लोग भी पिछले एक सप्ताह से अदालत के फैसले का सम्मान करने की बातें कर रहे हैं। इस बात का भी बड़ा असर हुआ है कि यह फैसला अन्तिम नहीं है, हारने वाला पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा।
इतना सब कुछ होने के बाद भी बहुत लोग बहुत ज्यादा आशंकित भी हैं। मिली-जुली आबादी में रहने वाले लोग कुछ ज्यादा ही आशंकित हैं। जैसे-जैसे फैसले की घड़ी नजदीक आती जा रही है, मेरठ के लोग आशंकित हो चले हैं। आशंकित होने की वजह भी हैं। आजादी की पहली लड़ाई शुरु करने वाला मेरठ संवेदनशील रहा है। अतीत में इस शहर पर कई खूरेंज दंगों का कलंक लग चुका है। दंगों की वजह से अपने शहर में ही विस्थापित होने का दंश भी इस शहर के लोगों ने भोगा है। मेरठ में सितम्बर 1982 से साम्प्रदायिक दंगों की शुरुआत हुई थी। मार्च 1986, मई 1987, नवम्बर 1990 और मई 1991 में खूरेंज दंगे हुए थे। हैरतअंगेज तौर पर 1992 में जब बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया था और पूरे भारत में दंगे हुए थे, तब मेरठ शांत रहा था।
मेरठ के इसी अतीत की वजह से हर शख्स एक-दूसरे से पूछ रहा है कि कल क्या होगा? हद यह हो गयी है कि कुछ लोगों ने किसी अनहोनी की आशंका के चलते राशन भरना शुरु कर दिया है। मिश्रित आबादी के कुछ परिवार पलायन कर रहे हैं। ऐसे लोग जानते हैं कि आशंका निर्मूल है, लेकिन वे उस भयग्रंथि का क्या करें, जो अतीत से उनके दिलों में घर कर गयी है। ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि अस्सी के दशक और 2010 में बहुत अन्तर आ गया है। समय एक सा कभी नहीं रहता। अब मेरठ अस्सी के दशक का मेरठ नहीं है, यह मेट्रो सिटी बन चुका है। मेरठ एक बार फिर यह साबित करेगा कि मेरठ ‘दंगों का शहर’ नहीं है। 6 दिसम्बर 1992 को भी मेरठ ने साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम की थी। यह पूरा विश्वास है कि 24 सितम्बर की परीक्षा में भी मेरठ के लोग 6 दिसम्बर की तरह परीक्षा में खरे उतरकर साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करेंगे।
लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उदयन शर्मा से बेहद प्रभावित सलीम मेरठ में निवास करते हैं. विभिन्न विषयों पर वे लगातार लेखन करते रहते हैं.

