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बढ़ते क्षेत्रीय चैनल और दम तोड़ती पत्रकारिता

भारत में आर्थिक उदारीकरण आने और सेटेलाइट चैनलों के प्रादुर्भाव होने के बाद भारतीय पत्रकारिता में मानो क्रांति आ गयी. एक ओर जहां कई विदेशी और ख्याति प्राप्त चैनल लोगों को देखने को मिले वहीं दूसरी ओर स्थानीय चैनलों ने भी बाजार में अपने पांव पसारना शुरू कर दिया. एक के बाद एक राष्ट्रीय चैनल और फिर स्थानीय या रीजनल चैनलों की बाढ़ आ गयी. जहां कल तक लोग अपने देश की खबर देख सुन पा रहे थे, वहीं अब लोगों को अपने राज्यों या यूं कह ले अपने-अपने जिलों या क्षेत्रों की खबरों ने टेलीविजन में जगह ले ली. जाहिर है बाजार का दायरा बढ़ा और फिर पत्रकारिता ने व्यापार का रूप लेना शुरू कर दिया.

भारत में आर्थिक उदारीकरण आने और सेटेलाइट चैनलों के प्रादुर्भाव होने के बाद भारतीय पत्रकारिता में मानो क्रांति आ गयी. एक ओर जहां कई विदेशी और ख्याति प्राप्त चैनल लोगों को देखने को मिले वहीं दूसरी ओर स्थानीय चैनलों ने भी बाजार में अपने पांव पसारना शुरू कर दिया. एक के बाद एक राष्ट्रीय चैनल और फिर स्थानीय या रीजनल चैनलों की बाढ़ आ गयी. जहां कल तक लोग अपने देश की खबर देख सुन पा रहे थे, वहीं अब लोगों को अपने राज्यों या यूं कह ले अपने-अपने जिलों या क्षेत्रों की खबरों ने टेलीविजन में जगह ले ली. जाहिर है बाजार का दायरा बढ़ा और फिर पत्रकारिता ने व्यापार का रूप लेना शुरू कर दिया.

कल तक समाचार को खबर के रूप में लेने वाले समूह ने अब ख़बरों का बाजारीकरण करना शुरू कर दिया. पत्रकार सेल्समेन बन गए और खबर एक प्रोडक्ट. खबरों के प्रसंशक या निंदक अब बाजार को चलाने या प्रभावित करनेवाले घटकों ने ले ली थी. नतीजतन पत्रकारिता लड़खड़ाने लगी. जब पत्रकार ख़बरों को बेचने लगे तो पत्रकारिता के जिन्दा रहने की बात बेमानी होने लगी. किसी पत्रकार की क्षमता उसके लेखनी या ख़बरों के चयन से नहीं सम्बन्धित कार्यक्रम के स्पांसर के द्वारा बनाये नियमों के तहत होने लगी. इस बीच बाजार में कार्पोरेट खिलाडियों ने दखल देना शुरू कर दिया. पत्रकारिता अब अपनी अंतिम सांस लेने लगी. ऐसा भी नहीं था कि पूरी मीडिया बाजार के दायरे में नाच रही थी. इस बीच मीडिया ने कई स्टिंग आपरेशन कर अपनी छमता का एहसास भी कराया, लोगों ने पहली बार कारगिल की लड़ाई और अमेरिका द्वारा इराक और अफगानिस्तान में की गयी दादागिरी को भी लोगों ने देखा.

पत्रकारिता ने फिर करवट ली. लोगों ने मीडिया की ताकत को माना. भ्रष्‍टाचारियों ने मीडिया की ताकत का लोहा माना. परन्तु अब उन्होंने इसके लिए भी नयी तरकीब निकल ली. जमाना अब पेड न्यूज़ का था. पीत पत्रकारिता अब सिर्फ पत्रकारिता की किताबों में पढाई जाने वाली चीज का नाम था. पेड न्यूज़ ने पीत पत्रकारिता को पीछे छोड़ दिया. बाजार ने नए-नए तर्क गढ़े, बाजार का नया मुहावरा सिर्फ फायदे का सौदा था किसी भी कीमत पर. बाजार में अब टीआरपी का कब्ज़ा था यानी खबर की जगह शुक्रवार को आने वाले टीआरपी मीटर अब यह तय करने लगे की लोगों को क्या पसंद आ रहा है? यानी खबरों का महत्व समाप्ति की और अब खबरिया चैनल मनोरंजन के साधन बनने लगे. अब पत्रकारिता की सांस फूलने लगी. लेकिन इन न्यूज़ चैनलों के लिए भी खतरे की घंटी बज चुकी है. अब नहीं चेते तो जिस आम दर्शक ने चैनल को इतना खास बनाया है उसे फिर से आम बनाने में कितना वक्त लगेगा?

लेखक अनंत झा पत्रकार हैं.

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