उसे घर की कद्र घर छोड़ देने के बाद हुई और मैं उसकी कद्र उसके दुनिया छोड़ जाने के बाद ही समझ पाया। आज जब उसके बहाने जो-जो याद आ रहे हैं, उनमें से कौन-कौन दुनिया छोड़ कर जा चुके होंगे नहीं जानता। बात बहुत पुरानी है तब मैं भी इस नौकरी में नया-नया आया था और अब सेवा निवृत होने वाला हूँ। वो मेरा दोस्त उम्र में मुझसे काफी छोटा था। बैंक में नौकरी करता था, पर था बड़ा कलाकार। छोटे कस्बेनुमा शहर उरई का रहने वाला था। घर छूटते ही उसे अपना शहर रूमानी लगने लगा था। उसकी भी नयी नौकरी लगी थी और पोस्टिंग भी दूर हुई थी। अपरिचित लोग, अलग तौर तरीके उसे सामन्जस्य बैठाने में कुछ दिक्कतें आ रही थी। ऐसे में अपने घर और शहर की याद आना अस्वाभाविक नहीं था। अब उसे गृह नगर की ढेरों खासियतें याद आती। उसे हैरानी होती कि बचपन से जवान होने तक बरसों वह उन सब खासियतों को कैसे अनदेखा करता रहा।
फिर एक बार जब वो छुट्टियां काटकर अपने घर से लौट आने पर मुझसे मिला तो हर्षातिरेक से भरा था। उसके पास अपने गृहनगर की अजूबी शख्सियतों का यादगार खजाना था। उसने शहर के एक टपरेनुमा होटल में तवे पर पकती गजल को पहचाना था। उसने बुन्देलखण्ड बैंक के समक्ष फुटपाथ पर पुराने बंगला देशी गर्म कपड़ों में लिपटी शायरी की शिनाख्त कर ली थी। उसे जालौन बस स्टैण्ड पर बस छूटने की संकेतक घन्टियों में सशक्त कविता के स्वर सुनाई दे गये थे। और मेरे उस दोस्त ने गजल, शायरी और कविता के उन स्वरों को कैसेट में रिकार्ड कर लिया था। अगर वह मुझे कैसेट न सुनवाता तो शायद हर्षातिरेक में बयान की जा रही उसकी बातों का मुझ पर उतना असर नहीं होता। कैसेट में रिकार्डिड दमदार गजलें एवं कविताओं को सुनने के बाद मैं उन रचनाकारों की सृजनशीलता सामाजिक कटिबद्वता एवं शिल्प के जादू से अविभूत हुए बिना न रह सका। मैं उनसे साक्षात्कार करने का मोह न रोक सका और थोड़े अरसे बाद जब मेरा वह दोस्त छुट्टियों में पुन: अपने गृहनगर उरई गया तो इस बार मैं भी उसके साथ था।
जिला जालौन का मुख्यालय उरई नगर बेतरतीब सा बसा एक पुराना शहर जिसमें उन दिनों तेजी से पुरानी इमारतों के अग्र भाग को बदलने की होड़ चल रही थी। पुराने गली मुहल्ले बाजार बनते जा रहे थे। शहर की मुस्लिम आबादी वाले इलाके के एक बड़े मुहल्ले के मुहाने पर बहते गन्दे नाले के पुल को पार कर हम दूसरी तरफ के टपरेनुमा छोटे से होटल पर जाकर ठहर गये। यह हमारा पहला पड़ाव था। मजबूत काठी, सिर पर पीछे की तरफ कसकर बांधे लम्बे बाल वाले जनाब मुहम्मद सुलेमान “अता” उस समय अपने होटल के कामों में मशगूल थे। दुआ सलाम के बाद हम लोग जल्दी ही अपने मकसद पर उतर आये ।
हम लोग होटल की बेंचों पर कब्जा कर चुके थे। खाने की मेज की दूसरी तरफ जनाब अता साहब काम छोड़कर आ बैठे थे। हमारे अनुरोध को कबूल करते हुए उन्होंने गजल परोसना शुरू कर दी। अपनी ही तरह की उनकी बुलन्द आवाज कुछ कुछ नाक से निकलती हुई माहौल में गूंजनें लगी। मुझे लगा सचमुच वह कैसेट जो मेरे मित्र ने सुनाई थी जिन्दा हो उठी है। साथ ही मेरी वह लालसा जो मुझे यहां तक खींच लाई थी काव्य रसपान से तृप्त होने लगी। ज्यों-ज्यों आवाज खुल रही थी वैसे-वैसे आस-पास के लोग एवं बच्चे हमारे इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे। पास ही लकड़ी की पेटी ठोकने और बिस्कुट के डिब्बों पर पतरों के ढक्कन लगाने वाले की ठक-ठक सुनाई दे रही थी। समीप ही मछलियों की पैकिंग के लिये बर्फ कूटी जा रही थी। पूरे माहौल में मछली की गंध हावी थी। गूंजती गजल हमें इन सबसे काटकर कहीं दूर अपने साथ लेती चली गई और हम अपने आस-पास का सब कुछ भूलकर कहीं दूसरी दुनिया में खो गये। शब्द एवं स्वरों का अद्भुत जादू था जो जज्बात एवं जीवन संघर्ष के अहसास से लबालब भरा था। यहां उनकी उस गजल को भी दे रहा हूं।
“आतिशे इश्क में जल गया तन-मन अपना
तब कहीं दागे मुहब्बत हुआ रोशन अपना
हमने तो आपकी राहों में बिछाई आंखें
आप ही बचाते रहे दामन अपना
तीरगी हमने गुलिस्तां की मिटाने के लिये
अपने हाथों ही जला डाला नशेमन अपना
अब इस दौर में मुश्किल है समझना यह भी
कौन है दोस्त यहां कौन है दुश्मन अपना
है तसल्लुत दरो-दीवार पे वीरानी का
मरकजे गर्दिशे दौरां हुआ आंगन अपना
देखकर आपको हैरान अजब आलम है
मुंह कभी आपका देखे कभी दर्पण अपना
दूसरा फिर न कभी कोई मुकाबिल आये
आईना तोड़ दिया आपसे कसदन अपना
नक्शे इखलाक मुहब्बत के वो छोड़े है अता
शेख अपना मुझे कहता है बिरहमिन अपना अता (मुहम्मद सुलेमान)
अपने होटल का काम धाम शुरू करने से पहले अता साहब मिशन स्कूल में नौकरी और कई छोटे मोटे काम भी कर चुके थे। अपने होटल का पूरा कामधाम वह स्वयं ही करते थे। जब उस दिन दोपहर में हम पहुंचे थे तब तक उनकी एक पैसे की भी बिक्री नही हुई थी। उन्होंने बताया कि होटल से गुजर औकात आमदनी हो ही जाती है। वैसे मुहल्ले के सालन वाले ग्राहक ही अधिक आते हैं। गजल के बारे में अता साहब कहते हैं, “बस एक ख्याल बनाया, किसी का शेर सुना या फिर किसी बुजुर्ग शायर का कोई मिसरा याद आया, उसे मजबूत बनाया और जुट गये। कभी उस्ताद के साथ बैठ गये दिमाग लड़ा और गजल पकती चली गई।
शायरों की सोहबत और दायरे में नामवरी की इच्छा से गजल लिखने की शुरूआत करने वाले अता साहब कहते हैं कि जब कभी अच्छी गजल लिखने में उन्हें कामयाबी मिल जाती है तो सुकून मिलता है, लगता है कि मकसद पूरा हो गया हो। उन्होंने गजल से दोस्तों की वाहवाही के अलावा कभी पैसा नही पाया है और न ही वह इस दिशा में सोचते थे। उन्हें प्रसन्नता थी कि वह लोग जिन्हें इस सबसे रकबत होती है उनके पास जरूर जाकर बैठते। धन्धे और गजल के रिश्ते निर्वाह में उन्हें कभी-कभी कठिनाई भी महसूस होती खासकर तब जब जहन में मिसरा हो और होटल पर ग्राहक। यहां उनकी एक अन्य गजल का टुकड़ा भी मैं पाठकों की नजर कर रहा हूं।
” कह के दीवाना बढ़ा ताबिले दीदार हूं मैं
दार ये कहती रही मंजिले दुश्वार हूं मैं।
लोग कतराते हुए मुझसे गुजर जाते हैं
क्या समझते हैं कि गिरती हुई दीवार हूं मैं।” -अता
बंगला देशी पुराने गर्म कोटों के ढेर के समीप कुरते पर काले रंग की बंडी पहिने बुजुर्ग जनाब बाबू खाँ तखल्लुस “पागल” से हमारी भेंट हो गयी। उन्हें शायरी ने सहारा दिया और वह दुश्वारियों में भी कभी पीछे नहीं हटे। उनका मत था कि शायरी -दुश्वारियों से ही जिन्दा रहती है तथा जहन को परेशानियों से हटाने के लिये भी शायरी बहुत मौजू चीज है। उनकी एक बानगी पेश है :-
“अहले- दौलत जानते हैं सब गरीबों का भरम,
आबरू ले लीजिये दो रोटियां दे दीजिये ।” -पागल
65 वर्षीय शायर ” पागल” साहब बताते हैं कि जनाब अल्लामा उखत्यार मशारिकी नागपुरी की वाल्दा जो खानदानी शायरा थीं। उनकी उस्ताद थी। शुरूआती दौर में उन्होने ही रास्ता दिखाया और फिर बाद मैं उनके पाकिस्तान चले जाने पर उनके लडके मशारिकी साहब से सलाह मश्विरा कर शायरी का सिलसिला चलता रहा । अता सहित एक दर्जन से अधिक शायरों के वह उस्ताद थे । शार्गिदों से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखकर वह उनकी सृजनशीलता को दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य करते थे। देश के बदलते हालात, उनकी अपनी परेशानियां और अनुभवों ने उनकी गजलों को एक नया अंदाज दिया। उनकी गजल के मौजूदा शेर इस बात के गवाह हैं।
” इन्कलाबी रास्ते पुख्ता बनाते जाइये
ताब चलने की नहीं तो लड़खडाते जाइये।
भूख से आवाज मर जाये अगर तो हाथ से
आप जिन्दाबाद के नारे लगाते जाइये। ” -पागल
पेट पालने के लिए नगर पालिका की मुलाजमत, फुटपाथ पर लाइटर सुधारने का काम, बंगला देशी गर्म वस्त्र बेचना सब किया। पत्नी के इंतकाल के बाद तीन बच्चों को संभालना खाना पकाना आदि के बावजूद भी उन्होंने मुशायरे सुनने जाना और शायरी करना लोगों की हमदर्दी और सहारे से बदस्तूर जारी रखा। जहां-जहां उनकी नजर पड़ी वही उनकी गजल की विषय वस्तु बनती चली गई। इस सम्बन्ध में वाक्या सुनाते हुए उन्होंने बताया कि बरसों पूर्व फुटपाथ पर जहां उनकी दुकान जमती थी वहीं सामने एक होटल था। होटल का मालिक किसी जुर्म में जेल चला गया और उसकी पत्नी मजबूर हाल में होटल चलाने लगी। होटल का नौकर दिन भर सोता रहता था। तब उस पर लिखा सही मिसरा तो पागल साहब को याद नहीं आ रहा था फिर भी किसी तरह से उसे पूरा करके उन्होंने सुनाया जो कुछ इस प्रकार था-
“बहुत बेबस यह बैठी है, बहुत लाचार बैठी है,
किसी तरह से बच्चे पालने हैं -यार बैठी है,
जिसे कहते हैं सोशलिज्म-इसी होटल में मिलता है,
कि नौकर सो रहा है -मालकिन बेजार बैठी है ।” -पागल
घन्टियों की आवाजें सुनाई दे रही थी, बसों का आना जाना लगा था। हम बसों से भरे जालौन बस स्टैन्ड की उस गुमटी के पास जा पहुंचे जहां से घंटी बजने के स्वर सुनाई दे रहे थे। एक व्यक्ति लम्बा सा टाइम-टेबल सामने बिछाये प्राइवेट बसों के कन्डेक्टरों से उलझा था। उसने हमें बताया कि विद्रोही जी का आज रेस्ट (अवकाश) है और उनसे उनके घर पर ही मिला जा सकता है। हम उसके बताये अनुसार विद्रोही जी के घर के लिए रवाना हो गये। गोधूली बेला में हम लोगों नें विद्रोही जी के द्वार पर दस्तक दी। एक पुराने से मकान का तंग जीना पार करते हुए हम ऊपर उनके कमरे में जा पहुंचे। नभ में अगणित पक्षी कलरव कर रहे थे। उनके चहचहाने की तीव्र आवाजें हमें कमरे के भीतर भी सुनाई दे रही थीं। विद्रोही जी का पूरा नाम कृष्ण दीक्षित “विद्रोही”था। उत्तर प्रदेश सरकार के क्लर्क पद की सेवायें पूरी करने के बाद वे प्राइवेट बस यूनियन वालों के यहां काम करते थे। बसों को बारी-बारी से समय पर रवाना करना उनके काम का हिस्सा था, जिसे वे घंटियां बजा-बजा कर पूरा करते थे। उनके अनुसार उनकी कविता विषम परिस्थितयों में कैसे आगे बढ़ी है यह उनके स्वयं के लिये भी कम आश्चर्यजनक नहीं है।
अपने शहर के अन्य शायरों से भिन्न नजरिया एवं अंदाजे बंया लिये उनकी कविता की विषय वस्तु पूर्व घटित एवं जनमानस में स्थापित घटनाएं, इतिहास एवं नैतिक मूल्य थे। उन्हें अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टकराने वाले भारतीय दौर में जन्मी कविता के प्रतिनिधि कवि के रूप में भी स्वीकारा जा सकता है। यद्यपि मंच में उन्हे कुछ सफलता भी प्राप्त हुई लेकिन फिर भी उनका बहुत कुछ तब तक अप्रकाशित ही था। शुरूआती दौर का जिक्र करते हुए विद्रोही जी सुनाते है तब देश में आजादी की जंग छिड़ी हुई थी। हम लोग जोशीली कविताएं लिखकर लहर पैदा करते थे। नमूने की दो पक्तियां है :-
” कब्रा से यह कह रही है जोर से कुर्बानियां,
दो मिनट भी रह न पाये सल्तनत बरतानियां।
विद्रोही जी ने दस सर्ग में झांसी की रानी पर महाकाव्य रचा। यहां उनकी कुछ पक्तियां उद्यत की जा रही हैं।
….”यह झांसी का दुर्ग अटल है, यह सुदृढ़ है यह अविचल है।
स्वतंत्रता के अमर समर का, यही यही तो रण स्थल है।
क्रुद्ध पवन सनसना उठा था, यहां अनल धन धैर उठा था।
आजादी का वीर सिपाही, यहां सूर्ख हो लहर उठा था। ….
….घायल होकर गिरा धरा पर, मांग रहा था पानी,
इतने में आ गई वहां पर झांसी वाली रानी।
बोली कहां चले सेनानी, समर पंथ के राही
बोली झांसी की सेना के ओ जांबाज सिपाही।
मां अपने हाथों से मेरे घाव तनिक सहला दे,
और अन्तिम बार मुझे भारत का मानचित्र दिखला दे। …. -कृष्ण दीक्षित विद्रोही
वीर रस में विद्रोही इतने रम गये कि उनकी हर कृति में वही लय, और गति बनी है। उनकी काव्य रचना तुलसी जो प्रकाशित नही हो सकी में तुलसी पूर्ण समग्रता के साथ जीवित हो उठते हैं। शब्दों में लय एवं गति ठीक पूर्ववत: बनी है। तुलसी जब रत्ना से मिलने अपनी ससुराल जा पहुंचे थे उसी दृश्य को सजीव करते हुए विद्रोही जी ने सुनाया:-
….”तुलसी ने ठण्डी सांस भरी, रो पड़ा मेघ झर-झर-झर,
तुलसी ने आह कराह भरी, पल्लव सा कांप उठा पत्थर
तुलसी की आंखों के आंसू, हेमन्त बने मधुमास बने
जो भरे रहे साहित्य बने जो बरस पड़े इतिहास बने।”….
….उर में रत्ना की मूर्ति लिये तुलसी पानी में कूद पड़े,
छप-छप छप लहरों के ऊपर पल्लव में तुलसी उस पार गये
और सरिता बोली हम मानव के उन्माद प्यार से हार गये।
मानव से बलवती बहुत है मानव की दुर्बलता
जय, जय, जय, तुलसी के कवि की जय तुलसी की कविता।”…. -कृष्ण दीक्षित विद्रोही
विद्रोही जी ने श्रृंगार रस पर भी सुनाया परन्तु उनका अंदाजे बयां यकसा (एक सा) ही था ।
आंजुन में सच टांक लिया है
छवि को छवि से आंक लिया है
बड़ा दर्प है उस दर्पण को
जिसमें तुमने झांक लिया है । -विद्रोही
इन शख्सियतों से मिलने के बाद लगने लगा कि समर्पित भाव से साहित्य सृजना कर रहे इन रचनाधर्मियों की साधना में किसी प्रकार के तर्क की विशेष गुंजाईश नहीं रह जाती। उनके समर्पण के समक्ष ख्याति भी बौनी लगती है। विषम परिस्थितियों में भी अटल विश्वास बनाये रखने वाले यह रचनाधर्मी उस कस्बे की युवा पीढ़ी की विरासत हैं, हम सब की भी विरासत हैं जिन पर हमें गर्व होना स्वाभाविक ही है। उरई के यह रचनाकार युवा पीढ़ी के रचनाकारों से भी जुड़े थे व उनमें संकल्प जागृत करने की दिशा में क्रियाशील थे। इन रचनाकारों से मुलाकात के क्षणों की स्मृति मेरे जीवन की स्थायी धरोहर बन चुकी है। अपने उस दोस्त का स्मरण करते हुए मैं उसके नगर के रचनाधर्मियों सहित सभी इंकलाबियों को जिन्हें में देश की दौलत मानता हूं, सलाम करता हूं।
लेखक सुभाष अरोड़ा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

