किस शासन की करूं बड़ाई, किसकी करूं बुराई,
उत्तम शासक उसको कहते, जो समझे पीर पराई.
वह आया सबको समझाया, दिया सामाजिक न्याय का नारा,
अंतिम सीढ़ी पर रहने वालों ने भी देखा एक सपना प्यारा,
सपना बिखरा दिल टूटा, और जात पात ने रंग दिखाई,
सत्ता मद में हुआ मदहोश, क्या जाने ये पीर पराई.
नेता बन गए नए सामंत, शक्ति प्रदर्शन का होड़ चला,
मंत्री बने “सपनो के सौदागर” जंगल राज से भेंट हुआ,
अपहरण, बेरोजगारी और रंगदारी ने अपनी जगह बनायीं,
जार बेज़ार जनता रोई, शासन समझ न सका पीर पराई.
ऊब गयी जनता सत्ता पलटी, आया एक नया सवेरा,
आशा जगी विश्वास हुआ, छंटने लगा अब अंधेरा,
रंगदारी अपहरण पर रोक लगा, बिहार न ली अंगड़ाई,
इज्ज़त बचेगी अब सबकी, सत्ता समझेगा पीर पराई.
सड़क पुल-पुलिया बना, अस्पतालों में रौनक आया,
शान्ति व्यवस्था कायम करके, शासन ने विश्वास जगाया,
लेकिन अधिकारी हुए बेलगाम, यह देख जनता अकुलाई,
अधिकारी समझ न सका कि क्या होता है पीर पराई.
राजनीति को सेवा कहने वालों को देखो, करते हैं व्यापार यहां,
जिस दल में भी देखो वहीं, बाहुबलियों का भरमार यहां,
ऐसे लोगों से क्या आशा रखूं, जो करते बस अपनी भलाई,
परिवारवाद और सत्ता हो जिसकी मंजिल, वह क्या जाने पीर पराई.
गांधी-जयप्रकाश ने जो कहा था, नहीं अब नेताओं की याद में
समाजवाद के ये प्रहरी कहते हैं “मैं पहले समाज बाद में”,
चुनाव में ही चुन सकते हो, हर तरह जो करे सबकी भलाई,
अपना प्रतिनिधि ऐसा चुनो, जो समझे पीर पराई.
लेखक बासुदेव प्रसाद सिंह पूर्व उपजिला आपूर्ति अधिकारी हैं और पटना में निवास करते हैं.

