राष्ट्र एक बार फिर अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहा है। डर इस बात का है कि अयोध्या फैसले की आड़ लेकर जो भड़काऊ व उकसावे की कूटनीति अपनाई जा रही है, यह कहीं राम-रहीम के बीच गहरे फासले का कारण न बन जाए। इतिहास गवाह है कि मुल्क के हितों को नजरदांज कर जब-जब फैसले किए गए देश और वृहद समाज को विभाजन, टकराव और उथल-पुथल जैसी पीड़ा ही झेलनी पड़ी है। क्रांतिकारियों में आजादी का जो जज्बा था उसमें धर्म-जाति का कहीं स्थान नहीं था। उन्होंने राम-रहीम के ही बूते आजादी की जंग लड़ी और फतह हासिल की। उन्होंने राम-रहीम को ही हाजिर-नाजिर मान कर विश्व के सबसे बड़े समृद्ध, खुशहाल और सम्पन्न भारत की परिकल्पना की थी, लेकिन आजादी के बाद समय-समय पर राजनीतिक स्वार्थ को सामने रख किए गए फैसलों का ही परिणाम कश्मीर, सांप्रदायिक दंगे, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातीय विभेद के रूप में हमारे सामने है।
एक बार फिर अयोध्या प्रकरण में अदालत के फैसले को रद्दी की टोकरी में डाल जिस तरह से इसे तूल देने की कोशिशें की जा रही है, वह एक बड़े फसाद की बुनियाद रखने जैसा ही है। जबकि यह वक्त बीती को भुला कर आगे की सोचने की है। बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी का यह बयान कि वह इस विवाद को अगली पीढ़ी के लिए नहीं छोड़ना चाहते, वाकई न केवल काबिले तारीफ है बल्कि सबक लेने योग्य है। महंत भाष्कर दास ने यदि यह इच्छा जताई कि मस्जिद का निर्माण अधिग्रहीत परिसर के बाहर किया जाए तो इसमें कहीं न कहीं उनकी राष्ट्रीय चिंतन शामिल है। अदालत के बाहर ही इस विवाद को ढांक-तोप कर किनारे करने के बजाए हम इसे सर्वोच्च न्यायालय में ले जाकर अगली पीढ़ी को यही संदेश देना चाहते हैं कि राम-रहीम नहीं बाबर हमारे धार्मिक आदर्श हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि हमारा यह कदम परोक्षरूप से धार्मिक आस्था की आड़ में राष्ट्रीय आस्था को चुनौती देने वाला है।
दरअसल इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हमारा राजनीतिक परिवेश ‘आस्था’ को व्यक्तिगत संकीर्णता में समेट कर देखने और उसी के सांचे में देश को भी ढालना चाहता है। वहीं देश का अधिसंख्यक समाज इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। शायद यही वजह थी अदालत का फैसला आने से पहले आंधी-तूफान के लगाए जा रहे सारे कयासों को अवाम ने संतुलित व संयमित बयान देकर एक सिरे से खारिज कर दिया। फक्र की बात तो यह थी कि मुस्लिम समाज की ओर से भी अब तक कोई विरोधी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। पेट दुखा तो सिर्फ और सिर्फ राजनीतिज्ञयों का। क्योंकि उन्हें उम्मीद था कि फैसला कुछ ऐसा आएगा जिसके बिना पर उन्हें मुस्लिमों के पक्ष में बोलने का मौका मिलेगा। अदालत ने ‘न ये जीते, न वो हारे’ का ऐसा फैसला दिया कि उनकी सारी दुकानदारी ही चौपट हो गई। अब टकराव के ये ठेकदार मामले को तूल देकर अपना राजनीतिक वजूद बनाए रखना चाहते हैं। ऐसे में राष्ट्रवादी ताकतों को आगे आकर इस विभाजक कूटनीति को विफल करना होगा।
गांधी, पटेल, शास्त्री, अबुल कलाम, पंत, अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, फिरोज गांधी, सीमांत गांधी सरीखे तमाम नेता हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आदर्श के रुप में वे अब भी हमारे सामने हैं तो कहीं न कहीं उनकी राष्ट्रीय आस्था का ही प्रतिफल है। कहने में गुरेज नहीं कि मौजूदा राजनीति परिवेश को भी राष्ट्रीय आस्था की विशालता से जोड़ कर उसके अनुरूप फैसला लेने की क्षमता विकसित की गई होती, तो शायद यह विवाद अदालत में जाता ही नहीं और गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसे झंझावातों के बाद भी देश का स्वाभिमानी स्वरूप ही विश्व के सामने होता। हमारी राष्ट्रीय आस्था ही आपसी सौहार्द की बुनियाद है और यही भारत की मिल्कियत है।
याद रहे, इसी मिल्कियत को बचाने के लिए आजादी के दीवानों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले लगा लिया था। उनकी कुर्बानी, त्याग और समर्पण राष्ट्रीय आस्था का प्रतीक था। अन्यथा बर्बर गुलामी को यदि जाति-धर्म से जोड़ कर देखा गया होता तो शायद आजाद हिंदुस्तान की परिकल्पना कभी आकार नहीं लेती। जेहन में रहे कि संकीर्ण व स्वार्थ के दायरे में सिमटी आस्था स्वंय को तो परास्त करती ही है, यह देश को भी कमजोर और खोखला बना देती है। वहीं जब यह परमार्थ से जुड़ जाती है तो समय, समाज व देश को सबल कर दुश्मनों को परास्त करती है। हम अयोध्या ही नहीं कश्मीर समेत तमाम ज्वलंत समस्याओं का भी समाधान ढूंढ सकते हैं, लेकिन इसके लिए हमें मुल्क को आगे और अपनी राजनीतिक मिल्कियत को पीछे रखना होगा। दुःखद तो यह भी है कि हमने अपना वजूद एक वोट बैंक के रूप में बना रखा है और एटीएम की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। अब वह वक्त आ गया है कि राष्ट्रीय एकता-अखंडता और अमन व सुकून भरी जिंदगी के लिए हमें भी ‘वोटबैंक’ के मिथक को तोड़ने के लिए उठ खड़ा होना होगा।
लेखिका रीता जायसवाल वाराणसी की निवासी हैं तथा स्वतंत्र लेखन करती हैं.

