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विशेषाधिकार कानून का सच

कितने आजाद है हम, क्या हम आजाद होकर भी आजाद है, या फिर यूं कहूं क्या खुद की आजादी को हम सबकी आजादी मानते हैं। ऐसे तमाम सवाल हैं जो मेरे मन को झकझोरते रहते हैं..जी हां मैं बात कर रहा हूं विशेषाधिकार के कानून की। क्या आपको नहीं लगता इस कानून में बदलाव की जरूरत है, तकरीबन पांच दशक से देश के ऐसे कई भाग हैं जहां रहने वाले लोग इस कानून के जख्म के दर्द को झेल रहे हैं। उनकी जिंदगी आज बद से बदतर हो गई है। क्या आप जानते है इस कानून ने ना जाने कितने नवजवानों को निगल लिया है, कितने मांओं के बेटे इस कानून की भेंट चढ़ गए हैं, उनका पता आज तक नहीं लग पाया। मणिपुर से लेकर नागालैंड और कश्मीर के लोगों की जिंदगी को विशेषाधिकार कानून ने नरक बना दिया है।

कितने आजाद है हम, क्या हम आजाद होकर भी आजाद है, या फिर यूं कहूं क्या खुद की आजादी को हम सबकी आजादी मानते हैं। ऐसे तमाम सवाल हैं जो मेरे मन को झकझोरते रहते हैं..जी हां मैं बात कर रहा हूं विशेषाधिकार के कानून की। क्या आपको नहीं लगता इस कानून में बदलाव की जरूरत है, तकरीबन पांच दशक से देश के ऐसे कई भाग हैं जहां रहने वाले लोग इस कानून के जख्म के दर्द को झेल रहे हैं। उनकी जिंदगी आज बद से बदतर हो गई है। क्या आप जानते है इस कानून ने ना जाने कितने नवजवानों को निगल लिया है, कितने मांओं के बेटे इस कानून की भेंट चढ़ गए हैं, उनका पता आज तक नहीं लग पाया। मणिपुर से लेकर नागालैंड और कश्मीर के लोगों की जिंदगी को विशेषाधिकार कानून ने नरक बना दिया है।

इस कानून के तहत सेना के पास किसी को भी गोली मार देने का पूरा अधिकार है, और दुख की बात ये है ऐसा कई बार हुआ है। जब इस कानून का सेना ने दुरुपयोग किया है। मैं मानता हूं कुछ आसमाजिक तत्वों की वजह से कश्मीर, मणिपुर जैसी जगहों के हालात ठीक नहीं, लेकिन इसका खामियाज़ा आम लोगों को कब तक भुगतना होगा…जिस पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।

सरकार हर बार क्यों खामोश हो जाती है विशेषाधिकार के मुद्दे पर, सालों से सरकार के पास से आश्वाशनों के अलावा कुछ नहीं मिला है। मैं ये नहीं कहता की सेना के पास अधिकार नहीं होने चाहिए लेकिन दोस्तों ज़रा ये तो सोचो सेना होती किसलिए लिए है, हमारी रक्षा के लिए ना तो कहां हो रही है रक्षा? कश्मीर के आम लोग सबसे ज्यादा किसी से डरते हैं तो वह है हमारी सेना। क्यों इन इलाकों में एक आम आदमी चैन की सांस नहीं ले पा रहा है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे है, तो काम पर जाने वाले लोग महीने में दस दिन ही काम पर जा पाते हैं। उसमें डर ये भी बना होता है पता नहीं कब कहां से कोई गोली आएगी और उनकी जीवन लीला को समाप्त कर देगी, फिर कौन लेगा इनके परिवार की जिम्मेदारी। आतंक और हिंसा ने पेट की रोटी तक छीन ली है।

कश्मीर में ऐसे सैकड़ों युवा हैं जिनका सालों से कोई आता पता नहीं, कितने युवाओं को सेना के अधिकारी घर से उठाकर ले गए, लेकिन आज सेना के पास भी उनका कोई पता नहीं है। इसके पीछे का सच क्या है ये सेना के लोग जानते हैं या हमारी सरकार। हम तो दिल्ली और मुंबई से शायद चैन की सांस ले रहे है, अपनी जीविका भी चला रहे हैं, लेकिन ऐसे हमारे कई भाई हैं जिनका जीवन आज नर्क बन गया है। थोड़ा उनके बारे में भी हमें सोचना चाहिए, मीडिया कश्मीर की हिंसा को तो दिखाती है लेकिन उस हिंसा के पीछे के सच को क्यों नहीं दिखाती, क्यों कोई सेना के विशेषाधिकार पर बात नहीं करना चाहता, सरकार का इस मुद्दे पर क्यों एक मत नहीं हो पाती है…ऐसे में सवाल ये उठता है दोस्तों क्या किसी की जान की कीमत राजनीतिक स्वार्थ से ज्यादा है।

मैं सेना के खिलाफ नहीं हूं और ना ही मै सेना का विरोध कर रहा हूं, मेरा विरोध सिर्फ इस कानून को लेकर है। सरकार को विशेषाधिकार कानून पर केवल बहस ना करके इस पर मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिए। और उन तमाम लोगों को न्याय देना चाहिए जो इस जख्म को सालों से अपने माथे पर लिए घूम रहे है, जिस कानून ने इनको जीते जी मार दिया ऐसे कानून के क्या मायने…ज़रा सोचो मेरे दोस्तों।

लेखक विनोद यादव पत्रकार हैं.

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