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डाबरमैन की अंतिम इच्छा

सुरेश नीरवगिरिराजजी बड़े ही विचित्र नस्ल के जीव हैं। मैं जितना सम्मान गिरिराजजी का करता हूं तय मानिए उतना सम्मान उनके घरवाले भी नहीं करते। घरवाले तो वैसे भी किसी प्रतिभावान व्यक्ति का सम्मान नहीं करते। उनके लिए तो घर की मुर्गी दाल बराबर ही होती है। घरवालों ने तो तुलसीदासजी तक का सम्मान नहीं किया था। पांच साल के ही हुए थे कि घर से निकाल दिया। मगर हमारे गिरिराजजी बड़ी कड़ी जान हैं। उन्हें घर से निकालने के सारे टोटके जब फेल हो गए तो घरवाले खुद ही घर से बाहर निकलने की सोचने लगे। मगर खानदानी मकान छोड़कर बेचारे कहां जाते। इसलिए अंत में सर्वसम्मति से घरवालों ने यह फैसला किया कि जिस खाते में घर में कुत्ता पाला जाता है, उसी खाते में गिरिराजजी को डाबरमैन समझकर पाल लिया जाए। यूं भी गिरिराजजी के होते हुए कुत्ता पालने की जरूरत ही कहां रह जाती है। वे कुत्ते का ही मानव संस्करण हैं। और अगर घरवाले कुत्ता पाल ही लेते तो उन्हें इस बात का हमेशा भय रहता कि कहीं कुत्ता गिरिराजजी से प्रभावित होकर अपनी जिंदगी ही बरबाद न कर ले। इसलिए काफी सोच-विचारकर कुत्तेवाले खाते में गिरिराजजी ही पल रहे हैं।

सुरेश नीरव

सुरेश नीरवगिरिराजजी बड़े ही विचित्र नस्ल के जीव हैं। मैं जितना सम्मान गिरिराजजी का करता हूं तय मानिए उतना सम्मान उनके घरवाले भी नहीं करते। घरवाले तो वैसे भी किसी प्रतिभावान व्यक्ति का सम्मान नहीं करते। उनके लिए तो घर की मुर्गी दाल बराबर ही होती है। घरवालों ने तो तुलसीदासजी तक का सम्मान नहीं किया था। पांच साल के ही हुए थे कि घर से निकाल दिया। मगर हमारे गिरिराजजी बड़ी कड़ी जान हैं। उन्हें घर से निकालने के सारे टोटके जब फेल हो गए तो घरवाले खुद ही घर से बाहर निकलने की सोचने लगे। मगर खानदानी मकान छोड़कर बेचारे कहां जाते। इसलिए अंत में सर्वसम्मति से घरवालों ने यह फैसला किया कि जिस खाते में घर में कुत्ता पाला जाता है, उसी खाते में गिरिराजजी को डाबरमैन समझकर पाल लिया जाए। यूं भी गिरिराजजी के होते हुए कुत्ता पालने की जरूरत ही कहां रह जाती है। वे कुत्ते का ही मानव संस्करण हैं। और अगर घरवाले कुत्ता पाल ही लेते तो उन्हें इस बात का हमेशा भय रहता कि कहीं कुत्ता गिरिराजजी से प्रभावित होकर अपनी जिंदगी ही बरबाद न कर ले। इसलिए काफी सोच-विचारकर कुत्तेवाले खाते में गिरिराजजी ही पल रहे हैं।

और गिरिराजजी ने भी घरवालों को कभी कुत्ते की कमी कभी नहीं महसूस होने दी। समय पर खाना नहीं मिलने पर वे बाकायदा डाबरमैन हो जाते हैं। उसी तर्ज पर गुर्राते हैं। पेडीगिरी मिले या रबड़ी वे भौंककर अपना मीनू घरवालों को बता देते हैं। वे जितनी निष्ठा से कुत्ते का जीवन जी रहे हैं उतना तो कोई कुत्ता भी नहीं जी सकता है। इन्हें देखकर यह कहा जा सकता है कि आदमी जब चाहे कुत्ता हो सकता है, मगर कुत्ते को आदमी होने की सुविधा प्राप्त नहीं है। गिरिराजजी के जिस्म में किसी ब्रांडेड कंपनी का कुत्ता साफ्टवेयर फिट है। कभी-कभी लगता है कि ब्रह्माजी का दफ्तर भी हमारे मृत्युलोक के जंबूद्वीपे-आर्यावर्ते-भरत खंडेवाले भारत के सरकारी दफ्तर की स्टाइल में ही काम करता है। जहां किसी बाबू ने दो पैग लगाने के बाद कुत्तेवाला साफ्टवेयर इनकी बाडी में डाल दिया है। जैसे ही कोई अजनबी गिरिराजजी के दरवाजे पर दस्तक देता है ये भीतर से ही भौंक देते है कि- देखना जरा कौन है और इतनी प्रबल मेहनत से थककर चूर हुए, फिर बेचारे अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। और ये बंद आँखें वे खाना खाते समय ही खोलते हैं। बाकी समय आँखें बंद ही रखते हैं।

अब डाबरमैन कोई टीवी-फीबी तो देखता नहीं है कि आंखें खोले। वैसे आजकल टीवी का जो स्तर हो गया है तो उसे आदमी तो क्या अब कुत्ते भी देखना पसंद नहीं करते हैं। हां जब कभी टीवी पर डॉग शो आता है तो गिरिराजजी जीभ बाहर निकालकर और पूंछ ऊंची करके उसे जरूर बड़े चाव से देखते हैं। एक-दो कमसिन डॉगिनियों को देखकर नशीली आवाज में गुर्राते भी हैं। और फिर सोने चले जाते हैं। कई बार घरवालों ने इनके लिए नौकरी ढूंढने का भी प्रयास किया मगर गिरिराजजी ठहरे मलूकदास के भैरंट चेले। जिनके जीवन का महावाक्य है कि अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम दास मलूका कह गए सबके दाता राम..।

दार्शनिक गिरिराजजी के सामने जब भी  कोई किसी नौकरी का ओछा प्रस्ताव लेकर गया गिरिराजजी ने उसे तत्काल झिड़क दिया। अधम चाकरी तो संसारी लोगों के काम हैं। गिरिराजजी जैसे वीतरागियों के लिए नहीं। काम, क्रोध और लोभ आदमी की वासनाएं हैं। कुत्तों की नहीं। आदमी कुत्ते को भी आदमी बनाना चाहता है। मगर गिरिराजजी का कुतत्व तो सत्ताइस कैरेट का है। बिल्कुल खरा। कहीं-कोई मिलावट नहीं। मिलावटी संस्कृति में जी रहे आदमी को गिरिराजजी का खरा कुतत्व देखकर हीनता का बोध होता है। मैं गिरिराजजी जैसे खरे कुत्तों के प्रति बड़ा श्रद्धाभाव रखता हूं। मेरे मन में उनके लिए बड़ी हाई क्वालिटी का सम्मान है। इनकी ठसक अगर किसी की कसक बन जाए तो इसमें इन बेचारे का क्या दोष। अब आपका दिया तो खा नहीं रहे हैं। और जब घरवालों को परेशानी नहीं है (अगर हो भी तो आपसे कहने नहीं आंएगे) तो फिर आपको क्यों मिर्ची लग रही है। ये तो भैया वही कहावत हो गई कि तेली का तेल जले और मशालची के अंग विशेष में दहन होने लगे।

आदमी किसी दूसरे का सुख देखकर पता नहीं क्यों जलता है। ईर्ष्या आदमी का विकार है। कुत्तों का नहीं। इसीलिए कुत्ता सीधा स्वर्ग जाता है। कुत्तों के सहारे युधिष्ठिर को भी स्वर्ग में एंट्री मिल जाती है। कुत्ता तो जितने दिन जीता है वो इस संसार को भी स्वर्ग ही मानता है। इस हिसाब से हमारे गिरिराजजी बाकायदा स्वर्गवासी हैं। और डीलक्स ब्रांड स्वर्ग का भरपेट आनंद उठा रहे हैं। भले ही घरवालों को उन्होंने नर्कवासी बना दिया हो। गिरिराजजी को न नौकरी का झंझट है न मंहगाई का दर्द। ऐसे दोयम दर्जे के मुद्दों पर सोचने का काम उन्होंने घरवालों पर ही छोड़ दिया है। इनकी तो बस अब एक ही इकलौती महत्वाकांक्षा है कि भारत का नासा केन्द्र जब कभी मंगल ग्रह को कोई अंतरिक्षयान भेजे, जिसमें कुत्ते को भेजा जाना हो तो भगवान इन्हें जरूर सिलेक्ट करवा दे। एक अच्छे कुत्ते की सारी पात्रता इनमें है। ऐसा मौका देश का और गिरिराजजी दोनों का नाम ऊंचा कर देगा। तब घरवालों को समझ में आएगा कि गिरिराजजी की क्या हैसियत है। मुझे पूरा यकीन है कि भगवान इनकी अंतिम इच्छा जरूर पूरी करेंगे। वैसी भी भगवान आजकल आदमी से ज्यादा कुत्तों पर ही मेहरबान हैं।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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