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सड़ता अनाज बजबजाता तंत्र

शिरीष चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ? एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उल्‍टा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अब तक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

शिरीष चंद पूंजीपतियों के लिए रियायतों का अंबार लगा रही है और करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए उसके पास न अनाज है और न पैसे का कोई बंदोबस्त. इंडिया शाइनिंग के इस दौर में सरकार को 50,000 करोड़ से अधिक का अनाज सड़ा देना मंजूर है. नहीं मंजूर है तो 8 करोड़ से ज्यादा लोगों की भूख को मिटाने के वास्ते उस सड़ते हुए अनाज में से गरीबों के लिए थोड़ा-सा हिस्सा बांटना. अकाल और कुपोषण के बीच पिसते किसी देश की जनता के लिए क्या उसकी सरकार इस तरह से भी अमानवीय हो सकती है ? एक तरफ सरकार पूंजीपतियों के लिए 5 लाख करोड़ रूपए की रियायत देती है और दूसरी तरफ भूखे लोगों के लिए कोई इंतजाम नहीं करती है. उल्‍टा भूखे देश की भूख पर परदे डालने के लिए उदाहरण के लिए मुंबई में 19 रूपए से ज्यादा रूपए कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है. हकीकत यह है कि आजादी के 63 सालों में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता बढ़नी चाहिए थी जो लगातार घटती ही जाती है. आजादी के समय से अब तक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता 440 ग्राम से 436 ग्राम पर आ गई है और इसी तरह दाल की उपलब्धता भी आधी यानी 70 ग्राम से 35 ग्राम ही रह गई है.

दूसरी तरफ असुरक्षित परिस्थितियों में रखे अनाज के त्वरित वितरण से लाखों लोगों को राहत पहुंचाई जा सकती है. जबकि मौजूदा स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के 35 किलो अनाज वितरित करने के आदेश को भी एक तरफ रखते हुए फिलहाल देश के कई इलाकों में अधिकतम 20 से 25 किलो अनाज ही वितरित किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय के एक और आदेश की अनदेखी करते हुए कई इलाकों में जनवितरण प्रणाली की दुकानें महीने-महीने भर नहीं खुलतीं हैं. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हर राज्य में एक बड़े गोदाम और जिले में पृथक गोदाम बनाने के लिए भी कहा जा चुका है. मगर खाद्य भंडारणों की क्षमता को बढ़ाने और गोदामों की मरम्मत को लेकर सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई है. लिहाजा देश के कई इलाकों में अनाज के भंडारण की समस्या उपजती जा रही है.

जिस देश में सालाना 6 करोड़ टन गेंहूं और चावल की खरीददारी होती है और जिसकी सयुंक्त भंडारण क्षमता 4 करोड़ 80 लाख टन है, उस देश में 6 साल के भीतर गोदामों में 10 लाख 37 हजार 738 टन अनाज सड़ चुका है. 190 लाख टन अनाज प्लास्टिक सीटों के नीचे रामभरोसे पड़ा हुआ है. हर साल गोदामों की सफाई पर करोड़ों रूपए खर्च करने पर भी 2 लाख टन अनाज सड़ जाता है और जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अनाज के एक दाने के बर्बाद होने को अपराध मानते हुए अनाज के सड़ने से पहले उसे निशुल्क बांटने का आदेश देता है तो हमारे केंद्र के कृषि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक 6,000 टन से भी ज्यादा अनाज के खराब होने के अपराध को नजरअंदाज बनाते हुए उल्टा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की गलत व्याख्या करते हैं और उसकी मर्यादाओं पर ही सवाल खड़े करते हैं.

1947 के बाद से अब तक अगर हम किसानों की अथक मेहनत से उपजे अनाज का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं और हर साल भारतीय खाद्य निगम की गोदामों में रखीं लाखों अनाज की बोरियां खुले में रखे जाने या बाढ़ आ जाने के चलते खराब हो रही हैं तो क्या सरकार को नहीं लगता कि भोजन से जुड़ी नीति, प्रबंधन और वितरण की व्यवस्थाओं पर नए सिरे से सोचे जाने की जरुरत है?

देखा जाए तो खाद्य सुरक्षा दूसरा सवाल है. पहला सवाल पूंजीपतियों के लिए देश की आम जनता से उनके संसाधनों को छीने जाने से जुड़ा है. अगर संसाधनों को लगातार यूं ही छीना जाता रहा तो खाद्य के असुरक्षा की स्थितियां सुधरने की बजाय तेजी से बिगड़ती ही जाएंगी. जहां आदिवासियों को उनके जल, जंगल, जमीन से अलग करके उन्हें भूख और बेकारी की ओर ले जाया जा रहा है, वही सेज के नाम पर खुली लूट की जैसे छूट ही दे दी जा रही है. कहने का मतलब है नीतिगत और कानूनी तौर पर सभी लोगों को आजीविका की सुरक्षा को दिये बगैर भोजन के अधिकार की बात बेमतलब ही रहेगी. भोजन के अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि 5 सदस्यों के एक परिवार के लिए 50 किलो अनाज, 5.25 किलो दाल और 2.8 खाद्य तेल दिया जाए. बीपीएल और एपीएल को पात्रता का आधार नहीं बनाया जाए.

सार्वजनिक वितरण की व्यवस्था के साथ-साथ सरकारी खरीदी और वितरण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था हो. व्यक्ति/एकल परिवार को इकाई माना जाए और राशन कार्ड महिलाओं के नाम पर हो. जल स्त्रोत पर पहला अधिकार खेती का हो. इसके साथ ही यह भी नहीं भुलाया जा सकता कि आजादी की बाद से अब तक विकास की विभिन्न परियोजनाओं और कारणों के चलते 6 करोड़ बच्चों का भी पलायन हुआ है. मगर बच्चों के मुद्दे अनदेखे ही रहे हैं और उनके लिए खाद्य सुरक्षा की गारंटी दिये बगैर विकास के तमाम दावे बेबुनियाद ही रहेंगे. इसे भी असंवेदनशीलता का चरम ही कहेंगे कि एक सेकेण्ड के भीतर 5 साल के नीचे का एक बच्चा कुपोषण की चपेट में आ जाने के बावजूद कोई नीतिगत फैसला लेने की बात तो दूर ठोस कार्यवाही की रूपरेखा तक नहीं बन पा रही है. अगर कुपोषण और भूख के चलते देश का आने वाला कल कहे जाने वाले 47 प्रतिशत बच्चों का अपनी उम्र के अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ पाता है तो इसे किस विकास का सूचक समझा जाए?

अंतत: अनाज का सड़ जाना एक अमानवीय और आपराधिक प्रवृति है और देश में अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था और बेहतर विकल्प तलाशने लिए एक ऐसे संवेदनशील और पारदर्शी तंत्र विकसित करने की भी जरुरत है, जो भूख से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर कारगार ढंग से शिनाख्त और कार्यवाही करने में सक्षम हो. अन्यथा हर साल लाखों टन अनाज खराब होने, अनाज की कीमत आसमान छूने, खेती के संकट, सूखे की मार और गरीबों के पेट खाली होने से जुड़े समाचारों पर परदे डालने के लिए हमारे पास आर्थिक शक्तियों का दिखावा करने वाली राष्ट्रमंडल खेलों की सुर्ख़ियों के अलावा कुछ नहीं होगा?

लेखक शिरीष खरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए पत्रकार हैं। पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद चार साल तक डाक्यूमेंट्री फिल्म संगठन में शोध और लेखन का कार्य किया। उसके बाद दो साल तक ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ से जुड़े रहे। इन दिनों ‘चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई’ के ‘संचार विभाग’ से जुड़े हुए हैं।

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