आप मेरी बात का विश्वास कर सकते हैं। एक हफ्ते पहले की बात है, तारीख याद आ गई वह थी 31 अक्टूबर। 31 अक्टूबर का महत्व 1984 के पूर्व सरदार बल्लभ भाई पटेल (लौहपुरूष) एवं आचार्य नरेन्द्र देव के जन्मदिन के रूप में रहा। 1984 में इन्दिरा जी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही 31 अक्टूबर को उनकी हत्या कर दी गई थी, तब से 31 अक्टूबर कांग्रेसजनों द्वारा ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। बहरहाल 31 अक्टूबर का महत्व बताने में मेरी कोई रूचि नहीं है। एक कलमकार हूँ अपनी पीड़ा का ही जिक्र करके अन्दर की भड़ास निकाल पाऊँगा। 31 अक्टूबर को काँग्रेस पार्टी के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष ने मुझे बड़ा ही दुःख पहुँचाया, फलतः अभी तक मैं ‘डिप्रेस’ हूँ और अण्डर मेडिकल सुपरविजन में चल रहा हूँ।
हुआ यूँ कि पार्टी के जिला इकाई के मीडिया प्रभारी दो पृष्ठीय विज्ञप्ति दे गए थे- ऐसा नहीं कि यह कार्य उन्होंने पहली बार किया था, वह ऐसा प्रायः किया करते हैं। मीडिया प्रभारी हैं, सो अपना उत्तरदायित्व बखूबी निभाते हैं। मीडिया प्रभारी द्वारा दी गई विज्ञप्ति और उनके व्यवहार से प्रसन्न मेरी सहकर्मी ने एक अच्छी खबर बनाकर पोर्टल और अखबार में छाप दिया। चूँकि 31 अक्टूबर को पार्टी कार्यालय पर कथित दिग्गज कांग्रेस जनों ने ‘एकता-अखण्डता दिवस’ के रूप में मनाया था, इसीलिए किसी मीडिया परसन को आमंत्रित नहीं किया था। मुझे लगा कि अभी पार्टी जिला इकाई के पास धनाभाव है, इसलिए कार्यक्रम का छायाँकन नहीं करवाया गया था या फिर बिना बुलाए तथा कथित मीडिया-प्रेस वाले स्वयं एक कमरे में हो रहे किसी कार्यक्रम को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हुए अपने ‘डिजिटल’ कैमरों में कैद कर लेते हों, इसलिए कोई भी चित्र अब राजनीतिक दलों का विज्ञप्तियों के साथ संलग्न नहीं रहता।
ऐसा ही दो पृष्ठीय विज्ञप्ति के साथ भी किया गया था। उस विज्ञप्ति में जिलाध्यक्ष, प्रदेश, राष्ट्रीय सदस्यों, सचिवों, पदाधिकारियों के ओजस्वी भाषणों का उल्लेख तो किया गया था, परन्तु बगैर फोटो के ‘खबर’ मजेदार नहीं बन पा रही थी। मेरी सहकर्मी ने इन्दिरा जी, लौहपुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल और आचार्य नरेन्द्र देव की फोटो को गूगल से सर्च कराकर एक अच्छा सा समाचार बनाकर प्रकाशित कर दिया था। चूँकि 31 अक्टूबर की खबर का सेम डेट में प्रकाशन करके मेरी सहकर्मी काफी उत्साहित थी, इसलिए फोन द्वारा मीडिया प्रभारी को अवगत कराया और पार्टी के जिलाध्यक्ष का मोबाइल नम्बर प्राप्त कर उन्हें एसएमएस कर दिया। एक सौ पच्चीस वर्षीय पुरानी राजनीतिक पार्टी के लगभग 55 वर्षीय नवनियुक्त जिलाध्यक्ष को एसएमएस पढ़ने का तो सऊर नहीं होगा या फिर ‘बिजी विदाउट बिजनेस’ का ढोंग रचकर एसएमएस पढ़ने की जहमत नहीं उठाई अथवा कृपणता की वजह से काल बैक करने की आदत नहीं है। हो सकता है कि उन्हें यह घमण्ड भी हो कि वह आने वाले दिनों में प्रदेश में सत्तारूढ़ होने वाली राजनीतिक पार्टी के जिलाध्यक्ष हैं। खैर! सहकर्मी ने अध्यक्ष से बात करने का इरादा छोड़ दिया।
शाम का वक्त था, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पार्टी के जिलाध्यक्ष को ‘काल’ किया- वह बोले भाई जी आप बताएँ कि कौन हैं, और क्या काम है। कहना पड़ा व्यक्तिगत काम तो नहीं है, मेरा नाम भूपेन्द्र है और आप के भाषण से ओत-प्रोत एक बढ़िया समाचार फलां पोर्टल-अखबार में छपा है। इसके अलावा मैंने उन्हें कांग्रेस पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाए जाने की बधाई भी दिया था, तो उन्होंने कहा कि इतने विलम्ब से। इस पर मैंने कहा कि जब मुझे पार्टी की विज्ञप्ति मिली तो पता चला कि आप पार्टी के जिलाध्यक्ष नियुक्त हुए हैं। फिर वह बोले कि मैं आप द्वारा प्रकाशित किया गया अपना समाचार कैसे देखूँ? मैंने कहा कि आप हैं कहाँ? वह बोले कि एक राष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र के जिला कार्यालय पर मिठाई लेकर आया हूँ। मैंने कहा कि वहीं इन्टरनेट खोलकर अमुक वेबसाइट खोलकर देख लें। इस पर उन्होंने लम्बा-चौड़ा भाषण दे डाला, अब चूँकि काल मैने किया था, सो पैसा मेरा खर्च हो रहा था। साथ ही मैं पछता रहा था कि बेवजह ही इस कथित लीडर को काल कर दिया। खैर…
बात समाप्त करने के पूर्व जिलाध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि भाई साहब आप कहाँ मिलोगे बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन या किसी सराय में ढाबे या चाय/पान की दुकान पर। मैं काँग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष का यहा प्रश्न सुनकर आश्चर्य में पड़ गया था। मैंने कहा था कि डियर मैं अपने कार्यालय में हूँ। वह बेचारे बोले कहीं जाइएगा मत, मैं अभी 15-20 मिनट में पहुँच रहा हूँ। लगभग 5 रूपए की चपत लगने के बाद मैंने मोबाइल की लाल बटन को दबा दिया था। इसके उपरान्त मैं नित्य की तरह अपने काम में लग गया था। चूँकि दिवाली का त्योहार आ गया इसलिए काँग्रेस पार्टी के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष की मिठाई का पैकेट याद आने लगा।
एक राज की बात बताना चाहूँगा (जैसा कि इनके बारे में सुना है) कि जिलाध्यक्ष मेरे स्वजातीय हैं और जमीनी नेता हैं। तरह-तरह के कथित उत्पीड़न का शिकार होते रहे हैं, लगभग दो दशक से पुलिसिया-प्रशासनिक उत्पीड़न के चलते कारागार की हवा भी खा चुके हैं। संघर्ष इनके रोम-रोम में बसा है। एक गरीब मिठाई विक्रेता इनका पिछलग्गू बनकर बरबाद हो चुका है, इसी तरह कइयों को नेता जी ने नर्क का रास्ता दिखाया है। अपनी जेब से एक पाई तक खर्च करना इन्होंने नहीं सीखा है। कोई मुर्गा फंसा रहा होगा, जिसे अपने साथ ले जाकर बड़े समाचार-पत्र के जिला कार्यालय पर मिठाई का डिब्बा और कुछ ‘कैश’ दिए होंगे।
ढाई दशक से नेता जी को जानता हूँ। छपास रोगी हैं, घर-परिवार के लिए ही जी रहे हैं। समाज सेवा इनके बस का नहीं है। फिर भी कहने से बाज नहीं आते हैं कि वह राजनीति और पार्टी में रहकर एक सच्चे सिपाही की तरह कार्य करने के साथ-साथ समाज सेवा कर रहा हूँ। भइया नेता जी आप और मुझमें कोई अन्तर है तो वह है पेशे का। आप ने राजनीति को पेशा बनाया है और हमने पत्रकारिता को मिशन। मैं समाज सेवा कर रहा हूँ कि इसे तो लोग बता सकते हैं।
आप को याद करके 40 वर्ष पुरानी फिल्म 10 नम्बरी (मनोज कुमार अभिनीत) का गाना याद आ रहा है। न तुम हो यार आलू, और न हम है यार गोभी, तुम भी हो यार धोबी, और हम भी यार धोबी। तात्पर्य यह है कि नेता जी पुरानी राजनीतिक पार्टी के जिला अध्यक्ष तुम तुम्हारी राजनीति के जरिए और मैं कलम के माध्यम से जनसेवा कर रहा हूँ। वैसे एक सीनियर कलमकार के रूप में कहना चाहूँगा कि जिस पार्टी में तुम हो उसको मैं पिछले 41 वर्षों से बखूबी जानता हूँ। हर नेता की रग-रग से वाकिफ हूँ। फिलहाल मैं कुछ भी ऐसा नहीं लिखूंगा या कहूंगा जिससे तुम्हारा लिबास बदरंग हो। वैसे तुम जैसे सफेद पोशों को मुझ जैसों ने बहुत ही करीब से महसूस किया है। खैर छोड़ो अब भी समय है ‘त्योहार’ के समय तो मुझ जैसे कलमकार को उस दिन वाला ‘ड्यू’ (बकाया) मिठाई का डिब्बा दे जाओ या किसी से भिजवा दो। तुम्हारा-कलमघसीट।
भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी अम्बेडकरनगर के निवासी तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं.

