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कुत्ता और आदमी में फर्क

रीताकुत्ता जब भी जमीन पर बैठता है तो पूँछ से स्थान को साफ करता है। जी हाँ, यह बात बुजुर्गों के मुँह से सुनी थी, बाद में कुत्तों को देखकर उनकी बातों की पुष्टि भी हुई। मतलब यह कि ‘कुत्ता’ भी साफ-सुथरे स्थान पर ही रहना और बैठना चाहता है। एक हम हैं कि मानव होकर भी साफ-सफाई के प्रति सचेष्ट नहीं है। शहर हो या गाँव-देहात गन्दे और गन्दगी पसन्द लोगों की बहुलता है। कुत्ता यानी अंग्रेजी भाषा का डॉग। सामर्थ्य के अनुसार लोगों द्वारा इस वफादार जानवर को पाला भी जाता है। इस समय ही नही पूर्व के जमाने में ‘कुत्ता’ ‘स्टेटस-सिम्बल’ था आज भी है। जानवर पालने का शौक अमीरों को था, तब हाथी, घोड़े और कुत्ते, बाघ, शेर आदि पालते थे लोग। राजा-महाराजा नवाबों में इस ‘शौक’ का प्रचार कुछ ज्यादा ही था। कुत्ता एक वफादार जानवर होता है। अपने मालिक के लिए जान भी दे देता है। लघुकथाओं में पढ़ा है। आदमी वफादार हो यह गले नहीं उतरता।

रीता

रीताकुत्ता जब भी जमीन पर बैठता है तो पूँछ से स्थान को साफ करता है। जी हाँ, यह बात बुजुर्गों के मुँह से सुनी थी, बाद में कुत्तों को देखकर उनकी बातों की पुष्टि भी हुई। मतलब यह कि ‘कुत्ता’ भी साफ-सुथरे स्थान पर ही रहना और बैठना चाहता है। एक हम हैं कि मानव होकर भी साफ-सफाई के प्रति सचेष्ट नहीं है। शहर हो या गाँव-देहात गन्दे और गन्दगी पसन्द लोगों की बहुलता है। कुत्ता यानी अंग्रेजी भाषा का डॉग। सामर्थ्य के अनुसार लोगों द्वारा इस वफादार जानवर को पाला भी जाता है। इस समय ही नही पूर्व के जमाने में ‘कुत्ता’ ‘स्टेटस-सिम्बल’ था आज भी है। जानवर पालने का शौक अमीरों को था, तब हाथी, घोड़े और कुत्ते, बाघ, शेर आदि पालते थे लोग। राजा-महाराजा नवाबों में इस ‘शौक’ का प्रचार कुछ ज्यादा ही था। कुत्ता एक वफादार जानवर होता है। अपने मालिक के लिए जान भी दे देता है। लघुकथाओं में पढ़ा है। आदमी वफादार हो यह गले नहीं उतरता।

वैसे देखा गया है कि प्रायः अंग्रेजी के प्रार्थना-पत्रों में लोग फेथफुल शब्द यानी वफादार लिखते हैं। बताइए क्या आदमी कुत्ता हो सकता है। मैं तो कहती हूँ कि यदि वफादार कहलाना है तो कुत्ता बनना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो यह लिखना बन्द कर दे कि योर्स ‘फेथफुल’। फेथ यानी विश्वास की पात्रता मात्र कुत्ता ही रखता है, वह भी शुद्ध नस्ल का, संकर प्रजाति के कुत्तों में फेथफुलनेस यानी वफादारी नहीं रह जाती। यह इसलिए कि ये सुख-सुविधा भोगी होते हैं। यदि इनकी सुख-सुविधा में कोई कमी रह गई तो समझिए कि ये गद्दार होने में तनिक भी नहीं हिचकेंगे। जैसे कि हमारे समाज में बहुत से लोग होते हैं। देशी जाति के कुत्तों के बारे में देखा-सुना गया है कि ये अपने मालिक (स्वामी) पालक के लिए अपनी जान तक दे दिए हैं। संकर वर्ण यानी दोगले कुत्तों में भौंकने के अलावा संघर्ष क्षमता नहीं होती। हिन्‍दी की कहावत है कि भौंकने वाले कुत्ते काटते नहीं या फिर गरजने वाले बादल बरसते नही।

हे साधो! मैं ‘कुत्ता’ पर लम्बा चौड़ा लेख नहीं लिखना चाहती। बस यूँ ही ‘कुत्ता’ शब्द आ गया, सोचा थोड़ा कलम चला कर कुत्तों की विशेषता लिख डालूँ। कुत्ता और आदमी में जमीन आसमान का अन्तर है। जी हाँ कुत्ता जानवर होकर भी वफादार है, लेकिन आदमी मानव होकर भी गद्दार। मेरा कहना है कि आदमी वफादार क्यों नहीं होता? और कुत्ता गद्दार क्यों नहीं बन जाता? अंग्रेजों के बंगलों के मुख्य द्वार और बाउण्ड्री वाल पर लिखा होता था कि ‘‘इण्डियन एण्ड डॉग्स आर नॉट एलाउड’’ मतलब यह कि हिन्दुस्तानी और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। तो क्या समझा जाए कि अंग्रेजों की राय में भारतीय आदमी और कुत्ते एक समान होते थे, आखिर वे क्यों नहीं भेद करते थे। हम भारतीय ही कुत्ता और आदमी में फर्क मानते हैं। हमसे तो भले अंग्रेज थे जिन्हें भारतीयों और कुत्तों में अन्तर नहीं दिखता था? कुत्ता साफ-सफाई पसन्द जानवर होता है यानी स्वच्छता के प्रति वह हमेशा सचेष्ट रहता है। टीवी एवं अन्य प्रचार माध्यमों के जरिए ‘स्वच्छता अभियान’ हमारे जैसे मनुष्यों को जागरूक करने के लिए दिखाया जाता है। हमने भी महसूस किया है कि अब भी मानव जैसा प्राणी कुत्ता से बेहतर नहीं बन पाया है। हमारे गाँवों में अब भी ऐसे लोग हैं जिन्हें साफ-सफाई नहीं पसन्द है।

काश! ये लोग कुत्ता से सीख लेते। कुत्ता यदि सफाई पसन्द न होता तो बड़े लोगों, पैसों वालों के घरों में आरामदायक बिस्तरों पर न सोता। इनके कुत्ते हमसे बेहतर जीवन जीते हैं। वहाँ इन्हें पूँछ से कुछ भी साफ नहीं करना रहता है। पूँछ की बात चली तो बता दें कि नवधनिकों के यहाँ कई बिना पूँछ वाले कुत्तों की भौं-भौं सुनाई पड़ती है। उन्हें शायद डाबर मैन नस्ल का कुत्ता कहा जाता है। हमारे सर हैं कि शहर के डाक बंगले में ‘इवनिंग वाक’ पर जाते हैं तो वहाँ एक पूँछ कट्टा कुत्ता उन्हें देखकर भौंकता है। ये बेचारे डर के मारे वहाँ जाने से घबराने लगे हैं। हाँ तो कुत्ता और आदमी में फर्क यानी डिस्क्रिमिनेशन आप को भी नजर आने लगा की नहीं। हमारे घर में भी कुत्ता पालने का शौक रहा है परन्तु उसे किसी ने माँग लिया तो पापा ने दे डाला। अब मेरे घर में कुत्ता नहीं है, सभी आदमी लोग रहते हैं। मैं दुःखी हो गई हूँ कि ‘पापा’ ने जॉकी को किसी दूसरे के हवाले क्यों कर दिया। वह रहता तो हम भी कुत्ता की तरह ‘फेथफुल’ बनने का प्रयास करते। वैसे एक बात बता दूँ कि आजकल कुत्ता और आदमी दोनों ही एक तरह से हो गए हैं। क्षमा से साथ कहूँगी कि दोगली प्रजाति के प्राणी ‘फेथफुल’ यानी वफादार नहीं होते। अब न तो कुत्ता और न ही आदमी वफादार है। यह लेख काल्पनिक है, समानता को सर्वथा संयोग माना जाए। फेथफुल लोगों से इस द्यृष्टता के लिए क्षमा चाहती हूँ।

लेखिका रीता विश्‍वकर्मा अम्‍बेडकर नगर (अकबरपुर) में पत्रकार हैं.

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