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मीडिया मंथन

छापने से पहले ही खबर को मार दिया गया

: खबरों के व्‍यवासायीकरण ने पत्रकारिता का लगाया पलीता : लोकतंत्र का चौथा स्‍तम्‍भ है मी‍‍डिया। कलम की ताकत तलवार की धार से भी पैनी होती है। ये बातें अब मजाक सी लगती हैं। पहले अखबार में आने वाली हर बात पर लोग विश्‍वास करते थे कि अखबार में खबर प्रकाशित हुई है, सच तो होगी ही। लेकिन बदलते परिवेश में यह झूठ का पुलिंदा बन चुका है। खबरों का व्‍यावसायीकरण हो चुका है। खबरें अब पैसे के बल पर लिखी जाने लगी हैं। ऐसा नहीं है कि अल्‍प वेतन भोगी पत्रकार इसमें रिश्‍वत ले रहा है। सबसे बड़े धोखेबाज तो मीडिया समूहों के मालिक हैं। जो लोगों को अखबारों के बढ़ते ग्राफ और इतने शहर और इतने संस्‍करणों की चकाचौंध से धोखा देकर अपना उल्‍लू सीधा कर रहे हैं। अब कोई खबर विश्‍वास करने योग्‍य नहीं है। क्‍योंकि खबरों ने भी व्‍यवसायिक रूप ले लिया है। मालिक व्‍यवसायीकरण की आंधी में बिक चुके हैं और नो‍टों की गडि्डयां लगाने में लगे हैं। अखबार विज्ञापनों के बोझ से लदे हुए हैं ऐसी स्थिति में पैसा किसे बुरा लगता है।

: खबरों के व्‍यवासायीकरण ने पत्रकारिता का लगाया पलीता : लोकतंत्र का चौथा स्‍तम्‍भ है मी‍‍डिया। कलम की ताकत तलवार की धार से भी पैनी होती है। ये बातें अब मजाक सी लगती हैं। पहले अखबार में आने वाली हर बात पर लोग विश्‍वास करते थे कि अखबार में खबर प्रकाशित हुई है, सच तो होगी ही। लेकिन बदलते परिवेश में यह झूठ का पुलिंदा बन चुका है। खबरों का व्‍यावसायीकरण हो चुका है। खबरें अब पैसे के बल पर लिखी जाने लगी हैं। ऐसा नहीं है कि अल्‍प वेतन भोगी पत्रकार इसमें रिश्‍वत ले रहा है। सबसे बड़े धोखेबाज तो मीडिया समूहों के मालिक हैं। जो लोगों को अखबारों के बढ़ते ग्राफ और इतने शहर और इतने संस्‍करणों की चकाचौंध से धोखा देकर अपना उल्‍लू सीधा कर रहे हैं। अब कोई खबर विश्‍वास करने योग्‍य नहीं है। क्‍योंकि खबरों ने भी व्‍यवसायिक रूप ले लिया है। मालिक व्‍यवसायीकरण की आंधी में बिक चुके हैं और नो‍टों की गडि्डयां लगाने में लगे हैं। अखबार विज्ञापनों के बोझ से लदे हुए हैं ऐसी स्थिति में पैसा किसे बुरा लगता है।

अगर बड़े विज्ञापनदाता के खिलाफ कोई खबर है या विज्ञापन दाता सबसे बड़ा जालिम है, तो भी उसके खिलाफ खबर छापने की हिम्‍मत प्रबंधन में नहीं है। क्‍योंकि खबर प्रकाशित होने पर वह विज्ञापन देना बंद कर देगा। अब तो अखबार बनिया की दुकान हो गई है। ऐसी स्थिति में जिस खोजी पत्रकारिता के लिए अखबार जाने जाते थे वो तो अब गौंण हो गई है। अब तो सबको ये लगता है कि पुल आउट के चार पन्‍ने भरने हैं और कल के चार पन्‍ने भरने की तैयारी करनी है। व्‍यावसायीकरण इतना बढ़ा कि मीडिया समूह अपने उददेश्‍य से भटक गए और पैसे कमाने के नए-नए तरीके अपना लिए। अब तो किताब प्रकाशन, मेले लगाना, संगीत के आयोजन, खेल प्रतियोगिता, सामान्‍य ज्ञान परीक्षा के तरीके से मीडिया समूह पैसा बटोरने में लगे हुए हैं। हकीकत है कि अब मीडिया चौथा स्‍तम्‍भ नहीं रहा। स्‍तम्‍भ तो अपने उददेश्‍य पर अडि़ग रहता है। अब ये सिर्फ नोट छापने की मशीन बन चुके हैं।

आप बीती

ऐसी ही एक घटना मेरे साथ घटी। मैं राजस्‍थान पत्रिका के भरतपुर ब्‍यूरो कार्यालय में रिपोर्टर के रूप में कार्यरत था। अर्से से काम कर रहा था, अच्‍छी खबरें लिखी और कहने को तलवार की धार से भी पैनी खबरें राजस्‍थान पत्रिका ने प्रकाशित की, क्‍योंकि ऐसी खबरों के लिए राजस्‍थान पत्रिका की साख थी। हमें भी ऐसी स्थिति में काम करने पर अपने आप पर गर्व था। मैंने वर्ष 2008 में सरदार तारा महेन्‍द्र, जो हीरो होंडा, मारुति की एजेंसी सहित नर्सिंग होम के रूप में भरतपुर में अपनी पहचान बना चुके हैं। सरदार तारा सिंह ने फर्जी तरीके से अपना ओबीसी का प्रमाण पत्र हासिल किया। पटवारी व तहसीलदार से लेकर संभागीय आयुक्‍त की जांच में वह फर्जी निकला। मैंने सीना तानकर खबर लिखी, लेकिन विज्ञापन की बड़ी पार्टी होने के कारण खबर की छपने से पहले ही दम घोंट दी गई। क्‍या ऐसी स्थिति में पत्रकार की जनता में क्‍या अहमियत रह गई। लोग तो ऐसा समझते हैं कि पत्रकार ने खबर न छापने के लिए पैसा खा लिया, लेकिन प्रबंधन ही बड़े खेल कर रहा है। ये हालत सभी समाचार पत्रों की है, इससे कोई बचा नही है। राजस्‍थान पत्रिका के प्रतिद्वंदी समाचार-पत्र की हालत तो सबसे नाजुक है। वहां तो किसी खबर को पैसे के बल पर रुकवाया जा सकता है। इसी कारण साख भी पतली है कोई उसकी खबरों पर विश्‍वास नहीं करता।

अखबार के जोर पर आयोजन

मीडिया समूह शहरों में बड़े-बड़े आयोजन कराते हैं। नाम होता है कि चैनल या अखबार की ओर से कितना बड़ा आयोजन हुआ है, जबकि उस समूह का उसमें एक भी पैसा खर्च नहीं होता। अब इसके लिए प्रायोजक ढूंढ लिए जाते हैं। नाम होता है कि मीडिया समूह ने आयोजन कराया है, लेकिन पैसा खर्च करने वाली पार्टी और होती है। लोग अपनी खबरें प्रकाशित कराने के लिए इन झांसों में आ जाते हैं। यह तो एक ब्‍लैक मेल का तरीका ही हुआ। लेकिन अखबारों के इस सच को आमजन नहीं जानता। इन समूहों की चारदीवारी में काम करने वाले चंद लोग ही इनकी करतूतों को जानते हैं।

लेखक राजकुमार जैन पत्रकारिता से जुड़े हैं.

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