दस साल के एक मासूम बच्चे को भूख क्या लगी कि पुलिस ने उसे इतनी कड़ी सजा सुना दी कि इंसानियत के रोंगटे तक खडे हो जाएं। राजधानी लखनऊ की चौक कोतवाली के शौचालय में पिछले छह दिनों से बंद प्रकाश नाम के मासूम बच्चे की पुलिसवालों ने जमकर पिटाई भी की है। पुलिस का कहना है कि यह बच्चा पैदाइशी क्रिमिनल है। लखनऊ पुलिस का यह क्रूरतम चेहरा आज तब बेनकाब हो गया जब महुआ न्यूज की निगाह चौक कोतवाली में बंद इस बच्चे पर पड़ी। प्रकाश की खता सिर्फ इतनी है कि उसने सड़क पर पड़ा एक पर्स उठा लिया जिसमें कुल बीस रुपये रखे थे। इन रुपयों से उसने पास के एक खोमचे से समोसे खरीद कर खा लिये, बस पुलिस को यह सहन नहीं हुआ और पिछले छह दिनों से यह बच्चा पुलिस के चंगुल में है। इस दौरान पुलिस ने उसके दूसरे साथियों के बारे में पूछताछ करने के नाम पर इसे मारा-पीटा भी।
इतना ही नहीं, प्रताड़ना के लिए उसे बदबूदार संडास में भी बंद रखा गया। पुलिस के बड़े अफसर तो इस मसले पर बात ही नहीं करना चाहते हैं, हां इस बच्चे की निगरानी कर रहे इस सिपाही की जुबानी कुछ सुन लीजिए। प्रकाश की मां चारबाग रेलवे स्टेशन पर भीख मांगती है, जबकि उसका पिता होटल पर बर्तन धोने का काम करता है।
हैरत की बात है कि पुलिस कभी तो यह दावा करती है कि यह 22 लोगों के गिरोह का सदस्य है और टप्पेबाजी करता है। अपनी बात के समर्थन में पुलिस का यह भी बयान है कि इसने एक व्यापारी का बैग छीना था और लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। लेकिन यही पुलिस दूसरी ओर यह भी तर्क दे रही है कि इस शातिर बदमाश ने एक पत्रकार का कैमरा चुराया है।
यूपी की बहादुर पुलिस के कारनामों को छिपाने के लिए पुलिस अक्सर गुड वर्क का दावा करती है। लेकिन पिछले छह दिनों से थाने पर बंद इस बच्चे के मामले में पुलिस का खुद जज बन कर निरंकुश व्यवहार से यह तो साफ हो ही गया है कि प्रदेश में मानवाधिकारों और बच्चों के लिए कितनी क्रूर हो चुकी है पुलिस।
लेखक कुमार सौवीर महुआ न्यूज उत्तर प्रदेश के ब्यूरो चीफ हैं.

