आधार न होते हुए भी पुरुष जाति के विरुद्ध खुल कर लिखने-बोलने की या कोसने की धारणा बनती जा रही है। ऐसा करने वाले खुद को सच्चा या श्रेष्ठ लेखिका/लेखक सिद्ध करने की बीमारी से ग्रसित नजर आते हैं, क्योंकि उनके लेखों में दिये तर्क को पढ़ कर कोसने का सटीक आधार नजर ही नहीं आता। इस बीमारी के कारण ही ऐसे प्रख्यात लेखक/लेखिका लिखते समय यह तक भूल जाते हैं कि देश और समाज को वह जो संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, उन विचारधाराओं से वह स्वयं ही ग्रसित हैं, ऐसे में उनके लिखे शब्दों पर कोई और विश्वास क्यों करे? प्रसिद्ध महिला का एक लेख पढऩे का सौभाग्य मिला, जिसमें उन्होंने पुरुषों के साथ कानून व संविधान तक पर सवाल उठाये हैं। उनके लिखे शब्दों पर चर्चा करने से पहले यह बताना जरुरी है कि वह स्वयं भी एक महिला की तरह ही रहती हैं।
प्राचीन काल से जैसे महिलायें बड़े बाल रखती आ रही हैं, वैसे ही बड़े बाल उनके भी हैं। महिलायें आस्था व श्रद्धा के चलते जिस प्रकार माथे पर बिंदी सजाती आ रही हैं, वैसे ही, वह भी लगाती हैं। परंपरागत या नारी सूचक परिधान के रूप में वह भी साड़ी पहनती हैं और भाषा के रूप में वह भी महिलाओं द्वारा बोली जाने वाली जाति सूचक भाषा का ही प्रयोग करती हैं, साथ ही वह सब करती हैं, जो परंपरागत आधार पर महिलायें प्राचीन काल से करती आ रही हैं, इसके ठीक विपरीत वह समाज, कानून व संविधान को पुरुष प्रधान सिद्ध करने की भी कोशिश करती दिख रही हैं। ऐसे में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि वह स्वयं प्राचीन परंपराओं और मान्यताओं को क्यूं मान रही हैं एवं इस सबके पीछे पुरुष समाज दोषी कैसे है?
लेखिका ने लिव-इन-रिलेशन की बात कही है और सही या ठोस तर्क देने की बजाय एक काल्पनिक फिल्म का उल्लेख करते हुए फिल्म में प्रेमिका अभिनेत्री द्वारा शादी से पूर्व प्रेमी अभिनेता के लिए करवा चौथ का व्रत रखने की बात कही है, जिसके बारे में कुछ भी लिखना औचित्यहीन ही है, क्योंकि वह एक फिल्म है, साथ ही अगर यहां यह लिख दिया जाये कि ऐसी फिल्में ही युवक-युवतियों को गलत राह पर ले जा रही हैं, तो वह और भी नाराज हो सकती हैं। इसके अलावा पत्नियों द्वारा पतियों की लंबी आयु की कामना या परिवार की सुख-समृद्धि के लिए किये जाने वाले व्रत व पूजा-अर्चना का भी जिक्र किया गया है, इस मुद्दे पर यही कहा जा सकता है कि यह सब करने के लिए पत्नियों को किसी पुरुष ने प्रेरित किया हो या प्रताडि़त किया हो, ऐसा शायद ही किसी ने सुना होगा, मतलब यह सब महिलायें स्वयं ही करती हैं या करती आ रही हैं।
पुरुषों का इसमें कोई दोष नहीं है। लिव-इन-रिलेशन की बात करें तो ऐसे सम्बंध सिर्फ महिला और पुरुष के ही बीच में हो सकते हैं या होते हैं, तो जाहिर है कि वह रिलेशन शारीरिक भूख की पूर्ति के लिए ही बनाये जाते होंगे, इन सम्बंधों को अंग्रेजी में चाहे जो कहा जाये, लेकिन भारतीय समाज ऐसे रिश्ते को रखैल या भड़ुआ के रूप में ही संबोधित करता है। इन दोनों शब्दों का प्रचलन काफी पुराना है। रखैल शब्द पर हाय-तौबा करने वाली महिलाओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रखैल कहने पर एक महिला को जैसा महसूस होता है, ठीक वैसा ही भड़ुआ कहने पर पुरुष को महसूस होता है, इन दोनों शब्दों में अलग-अलग जातियों का आभास कराने का ही अंतर है, बाकी दोनों शब्दों का अर्थ लगभग एक जैसा ही है।
दूसरी ओर सामाजिक नियम बनाते समय पुरुषों को शायद, अधिक अहमियत दी गयी होगी, जो गलत है या सही, यह बहस का अलग मुद्दा है, पर इससे पहले सवाल यह है कि स्त्री की सरंचना में पुरुष का क्या दोष है? उसकी शारीरिक बनावट, रहन-सहन, खान-पान, चाल-ढाल या अंदर छिपे गुण-अवगुण में पुरुष की कौन सी चाल है? शारीरिक बनावट या शरीर में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों अथवा क्रियाओं में पुरुष की कौन सी या कैसी हठधर्मिता है? यह सब स्त्री जाति के रूप में जन्म लेते ही प्रकृति द्वारा दिये जाते हैं, फिर पुरुष किस प्रकार दोषी है? साथ ही पुरुषों पर स्त्री जाति के शोषण का आरोप लगाने वाली लेखिका बदलाव की बात तो ऊंची आवाज में उठाती नजर आती हैं, लेकिन बदलाव स्वयं से शुरु नहीं करती दिखतीं। सबसे पहले नाम की ही बात की जाये तो ऐसी महिलाओं को स्वयं का या फिर अपने बच्चों का कॉमन नाम रखना चाहिए, जिससे आभास ही न हो कि वह स्त्री है पुरुष, जबकि ऐसी क्रांतिकारी महिलाओं के स्वयं के या उनके बच्चों के भी नाम जाति सूचक ही नजर आते हैं। कपड़ों की बात की जाये तो यही महिलायें, बेटे-बेटियों को जाति सूचक कपड़े की पहनना पसंद करती हैं व खुद भी पहनती हैं। विवाह आदि समारोह भी परंपरागत आधार ही आयोजित करती हैं या कराती हैं। इसका मतलब है कि यह सब करने के बावजूद भी पुरुष प्रधानता के नाम पर पूरे समाज को कोसने वालों का यथार्थ या वास्तविक बदलाव से इनका कोई लेना-देना ही नहीं है।
खैर, लेखिका ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहे गये कीप (रखैल) शब्द पर सवाल उठाया है, उन्हें यह भी भली-भांति ज्ञात होगा कि कानून महिला के साथ ही बलात्कार की घटना को मानता है, जबकि बलात्कार पुरुष का भी हो सकता है या किया जाता है, पर कानून उसे नहीं मानता। बलात्कार वास्तव में घृणित अपराध है, पर सिर्फ महिला की ही लाज नहीं जाती है, पुरुष का भी शोषण होता है। मेट्रो शहरों में गरीबी के चलते अमीर घर-परिवारों में काम करने वाले पुरुषों से बात करने पर पता चलता है कि उनके साथ महिलाओं द्वारा आये दिन बलात्कार किया जाता है। ऐसे पुरुष अपने साथ हो रहे अत्याचार की चर्चा तक नहीं करते, क्योंकि उनकी बात का कोई विश्वास ही नहीं करेगा, साथ ही नौकरी से भी हाथ धोने का डर रहता है। पुरुषों के साथ हो रही इस नाइंसाफी और दोहरी नीति पर भी सवाल उठाना चाहिए, लेकिन नहीं, क्योंकि यह सब लिखते समय आलोचना का शिकार होना पड़ेगा, पुरुष प्रधान समाज का हितैषी होने या दकियानूसी विचारधारा का बट्टा लगने का भी डर रहता है और सबसे बड़ी बात यह कि यह सब बाजार में बिकेगा भी नहीं।
अंत में पुरुषों को कोसने वालों के लिए यह भी जानकारी देनी सही रहेगी कि जिस प्रकार रखैल शब्द महिलाओं के लिए अश्लील है या गाली है, ठीक उसी प्रकार पुरुषों के लिए भी भडु़आ शब्द अश्लील है व गाली है, यह बात अलग है कि ऐसा कोई मामला सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंचा है, लेकिन कभी पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट इस शब्द को भी रखैल की तरह की पेश करेगा। इस लिए कानून या संविधान पर सवाल उठाने से पहले हर बिंदू पर सोचना चाहिए, क्योंकि जिस कानून और संविधान के सहारे पुरुषों को कोसने वालों को यह सब करने, कहने व लिखने की आजादी मिली हुई है, वह पुरुषों की ही देन है। याद रखना चाहिए कि संसद में महिला आरक्षण के मुद्दे पर भी अधिकतर पुरुष, महिलाओं के पक्ष में ही खड़े नजर आ रहे थे। इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि पुरुष अगर उनकी तरह सोचने लगेंगे, तो अब तक जो मिला है, वह न मिला होता और न ही आगे कुछ मिलेगा, इसलिए पुरुष विरोधी बीमारी से बाहर निकलने का प्रयास करें।
लेखक बी पी गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं.

