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यही है पत्रकारिता का असली चेहरा!

राजीव हिंदी पत्रकारिता में शोषण अपने चरम पर है. पत्रकारों में कम पैसे पाने का तो अवसाद है ही, साथ में नौकरी जाने की असुरक्षा और प्रोमोशन पाने की इतनी प्रतिद्वंदता है कि कोई किसी की हत्या तक करवा सकता है. ऐसे माहौल में कई पत्रकार घनघोर मानसिक अवसाद के शिकार हैं. यह राष्ट्रव्यापी हिंदी पत्रकारिता की समस्या है. इस समस्या का समाधान कई पत्रकारों को माओवाद में नज़र आ रहा है. बातों-बातों में ऐसे शोषित पत्रकार माओवाद का सहारा लेकर इस पूंजीवादी शोषक मीडिया को खत्म करने की वकालत करते हैं. पत्रकारों का माओवाद समर्थक होना स्वाभाविक है क्योंकि मीडिया में हो रहे शोषण की तरफ से सरकार आँख मूंदे हुए है. लगभग सभी अखबार सरकारी विज्ञापन पाने के लिए सरकार की चमचागिरी में लगे हैं. सरकार की वाहवाही में जुटी हिंदी मीडिया पत्रकारों की उस पीढ़ी को पुरस्कार दे रही है, जो पेड न्यूज जुटाने में माहिर है. जन सरोकार से जुड़ी खबर लेने वाले पत्रकारों को बदले में फटकार और गाली मिलती है और अगर वो नहीं सुधरे तो नौकरी से छुट्टी. ऐसे में कोई ईमानदार पत्रकार माओवादी बन जाय तो इसमें इस सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का दोष है, जो व्यक्ति को अपराधी बनने पर मजबूर कर रहा है.

राजीव

राजीव हिंदी पत्रकारिता में शोषण अपने चरम पर है. पत्रकारों में कम पैसे पाने का तो अवसाद है ही, साथ में नौकरी जाने की असुरक्षा और प्रोमोशन पाने की इतनी प्रतिद्वंदता है कि कोई किसी की हत्या तक करवा सकता है. ऐसे माहौल में कई पत्रकार घनघोर मानसिक अवसाद के शिकार हैं. यह राष्ट्रव्यापी हिंदी पत्रकारिता की समस्या है. इस समस्या का समाधान कई पत्रकारों को माओवाद में नज़र आ रहा है. बातों-बातों में ऐसे शोषित पत्रकार माओवाद का सहारा लेकर इस पूंजीवादी शोषक मीडिया को खत्म करने की वकालत करते हैं. पत्रकारों का माओवाद समर्थक होना स्वाभाविक है क्योंकि मीडिया में हो रहे शोषण की तरफ से सरकार आँख मूंदे हुए है. लगभग सभी अखबार सरकारी विज्ञापन पाने के लिए सरकार की चमचागिरी में लगे हैं. सरकार की वाहवाही में जुटी हिंदी मीडिया पत्रकारों की उस पीढ़ी को पुरस्कार दे रही है, जो पेड न्यूज जुटाने में माहिर है. जन सरोकार से जुड़ी खबर लेने वाले पत्रकारों को बदले में फटकार और गाली मिलती है और अगर वो नहीं सुधरे तो नौकरी से छुट्टी. ऐसे में कोई ईमानदार पत्रकार माओवादी बन जाय तो इसमें इस सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का दोष है, जो व्यक्ति को अपराधी बनने पर मजबूर कर रहा है.

सबसे बड़ा अपराधी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमे ऐसे नेता और प्रशासक राजकाज चला रहे हैं, जिनका पेशा ही है योजनाओं का धन लूटना. पूरे देश में कही भी कोई भी योजना लागू होती है तो हर किसी को पता रहता है कि घोटाला तो होना ही है. धन की ऐसी लालची राजनीतिक व्यवस्था स्वाभाविक तौर से एक शोषक और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के हाथों बिकी हुई है, जिसमें सत्ता का असली बागडोर उन अति मुनाफाखोर व्यवसाइयों के हाथ में है, जो सरकारी तंत्र के हर पुर्जे को अपने तरीके से चलाने की ताकत रखती है. ऐसे में अगर जनसरोकारों की बात कोई पत्रकार करता है तो उसे सूली पर चढ़ाने की तैयारी शुरू हो जाती है.

पत्रकारों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार उनके अंदर रोष भर रहा है. इस रोष को निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा. माओवादी शक्तियां इस रोष को अपने पक्ष में उपयोग करने की साजिश में जुटी हुई है. प्रत्यक्ष तौर पर कई मानववादी और समाजसेवी माओवाद विचारधारा के प्रति आये दिन मीडिया में अपना समर्थन जाहिर करते हैं. अगर सरकार ही शोषण को बढ़ावा देने लगे तो माओवादी शक्तियों का इस देश में एक समाधान के रूप में उभरना भी उतना ही स्वाभाविक है.

माओवाद के समर्थन में बोलने वाले अधिकांश पत्रकार वैसे ही मानववादी पत्रकार हैं, जो दूसरे क्षेत्र की जमी जमाई नौकरी या पेशा छोड़कर इस क्षेत्र में इसलिये आये थे ताकि वो देश और समाज सुधारने में अपना योगदान दे सकें. लेकिन यथार्थ परिस्थिति उनकी हत्या करने पर तुली है. पत्रकारों में जमा हो रहे इस अवसाद उसे किधर ले जायेगा ये कहना कठिन है, लेकिन ऐसे शोषित पत्रकारों का मानसपटल माओवादी विचार बीज के लिए उपजाऊ भूमि की तरह है, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए.

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. फिलहाल पत्रकारिता के अंदर-बाहर की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

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