किसी ने कहा- सोने जा रहा हूँ, किसी ने कहा- चाय पीनी है, कोई खाने चला गया और कोई किसी दूसरे काम से निकल लिया. पर इनमें से लौट कर आया कोई नहीं. यह सब हादसा तब हुआ जब आज हम लोगों ने आईआईएम, लखनऊ में मंजुनाथ शंमुगम के पांचवीं पुण्य तिथि के अवसर पर अपनी संस्था आईआरडीएस और नेशनल आरटीआई फोरम की तरफ से एक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा हम लोगों ने मंजुनाथ शंमुगम और आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र सत्येन्द्र दुबे को मरणोपरांत पद्म पुरस्कार से नवाज़े जाने और इस प्रकार से स्वयं इन पुरस्कारों की प्रतिष्ठा में वृद्धि होने के सम्बन्ध में चर्चा की थी. इस कार्यक्रम में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता के अलावा आईआईएम लखनऊ के भी कुछ छात्र थे. लेकिन जो बात मुझे बेहद आश्चर्यजनक लगा, वह था इन तमाम छात्र-छात्राओं का बर्ताव और उनके व्यवहार. वैसे तो पिछले एक साल आईआईएम, लखनऊ के कैम्पस में रह कर हम लोगों ने देख लिया था कि यहाँ छात्र कितने संवेदनशील होते हैं, पर आज जो इसकी बानगी मैंने एक बार फिर देखी वह गौर फरमाने लायक थी.
मंजुनाथ आईआईएम, लखनऊ के ही छात्र रह चुके थे और आईआईएम, लखनऊ उन्हें अपने एक महत्वपूर्ण मुखौटे के रूप में प्रयुक्त करता है. यहाँ मंजुनाथ ट्रस्ट नामक एक संस्था भी है जिसमें कई छात्र सदस्य हैं. स्वाभाविक है कि ऐसे में इन तमाम छात्र-छात्राओं की इस प्रकार के कार्यक्रम में, जिसमे उनका स्वयं का हीरो स्मरण किया जा रहा हो, भारी संख्या में सहभागिता की अपेक्षा बन ही जाती है. मेरे पति अमिताभ जी का कहना था कि चूँकि दिन के समय का कार्यक्रम है, लिहाजा बहुत सारे लोग तो वहीं मिल जायेंगे और कार्यक्रम में अच्छी शिरकत हो जायेगी. फिर भी मैंने उन्हें कहा कि इस बात को अपने सहपाठियों (वे वहां के छात्र भी तो हैं) में फैला दें. उन्होंने इसके बावत तुरंत मेल से मेरे सामने ही सब लोगों को सूचित कर दिया.
इसके बाद जब कार्यक्रम की बारी आई तो हम लोगों ने इन छात्र-छात्रों को देखना शुरू किया. मैं तो ज्यादा लोगों को व्यक्तिगत नहीं जान रही थी पर इनकी तो लगभग सभी लोगों से जान-पहचान थी. मैंने अपने सामने इनको देखा ये इन सभी लोगों से एक-एक कर के आग्रह कर रहे थे कि वे लोग इस कार्यक्रम के कुछ देर के लिए आ जाएँ, यह कार्यक्रम उन्ही के यहाँ के सर्वाधित चर्चित छात्र के नाम पर है, पर फिर भी ये लड़के-लडकियां किसी ना किसी बहाने वहां से खिसकते जा रहे थे. मैंने सुना किसी ने शहर जाने की बात बतायी तो किसी ने कहा कि वह अभी बस थोड़ी देर में आ रहा है. एक लड़की को मैंने देखा. उसने धीरे से कह दिया कि वह चाय पी कर आ रही है. मैं जान गयी थी कि वह अब नहीं आने वाली है पर ये नहीं मान रहे थे. बमुश्किल कुछ छात्र इकट्ठे हुए और उनके बीच में कार्यक्रम हुआ, पर उनमें भी ज्यादातर इस तरह भागने को तैयार थे मानो किसी कैद में हों.
यह स्थिति थी देश के चुनिन्दा और बेहतरीन कहलाने वाली संस्था के बच्चों की, जिनके पास अपने ही कॉलेज के पास उस लड़के को श्रद्धांजलि देने के लिए समय नहीं था, जिसको ये लोग दिन-रात बेचते रहते हैं. यह भी नहीं था कि इन लोगों का इतना सारा काम पड़ा हो जिससे वे परेशान हों. ज्यादातर शायद यहाँ-वहां बैठ कर गप्पें लड़ाते या फिर कुछ अफलातूनी बातें करते या कितना पैकेज मिल रहा है, उस पर चर्चा करते.
जी हाँ, पैकेज आईआईएम का भगवान है और वही उन छात्र-छात्रों का एक मात्र रामायण. पैकेज मतलब इस साल उनको खुद की मजदूरी बेचने के बदले साल भर में कितना मिलेगा. पैकेज के लिए परेशानी का वह आलम मैंने आईआईएम में रह कर देख लिया कि कभी-कभी तो घिन्न सी आती है और जान पड़ता है कि इन लड़कों से तो बिना पढ़े-लिखे लड़के-लडकियां अच्छे हैं, कम से कम इंसानियत तो उनमें दिखती है. कम से कम अपने आस-पड़ोस से उन्हें मतलब तो है. यहाँ के लोगों को तो अपने पैकेज के अलावा शायद अपने घर वालों से भी मतलब हो, ऐसा जान नहीं पड़ता.
इनमें से जिस किसी से बात करें, वह बस इतनी ही बात करेगा और इसके अलावा कुछ नहीं. यह कष्टप्रद स्थिति है क्योंकि ये बच्चे मेधावी हैं इसमें कोई शक हो ही नहीं सकता. पर दुनिया सिर्फ चंद रुपये और उनकी फैक्ट्री नहीं है, दुनिया में उसके आगे बहुत कुछ है यह बात भी उन लोगों को जाननी होगी और उस पर चलना होगा, तभी तो देश को इन बच्चे-बचियों से वास्तविक लाभ मिलेगा. नहीं तो ये सब सिर्फ नून-तेल बेचते रहेंगे और देश इनको देख कर वैसे ही कराहता रहेगा, जैसा अब तब चल रहा है. इन लोगों को अपने मंजुनाथ शंगुगम जैसे छात्रों पर गर्व भी करना पड़ेगा और उसे अपने जीवन में उतारने के लिए अपने इर्द-गिर्द की जनजागृति भी लानी पड़ेगी.
डॉ नूतन ठाकुर
सम्पादक,
पीपल’स फोरम, लखनऊ

