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सबके लिए अलग-अलग कानून!

: मीडियाकर्मी भी काजू के बर्फी के साथ पचा जाते हैं कई खबर : आये दिन हमारी सरकारें, सत्ता के लोग, नौकरशाह व अफसर कानून पालन की बात करते हैं। आये दिन बेगुनाहों को कानून का हवाला देकर फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है। मीडिया से जुड़े लोगों की एक जमात भी संबंधित अफसर के पक्ष में नोटों की गड्डी खाकर जुगाली करने लगती है। कई बार सत्‍य जानकर भी धनलक्ष्मी के प्रभाव में मीडिया से जुड़े कथित लोग खबरों को बदलने में अपनी प्रतिष्ठा ताख पर रख देते हैं। कई बार मीडिया कर्मियों के भी तरफ घूमने वाली पुलिस की निगाहें उसे रौंदती है और मीडिया के लोग भी ताली बजाते है, लेकिन हम इसी संस्कृति में पले बढ़े है तो इसी संस्कृति से हमें वह रास्ता भी दिखाई देगा, जिससे हम या पीड़ित लोग इस भ्रष्ट पुलिस की भ्रष्टता उजागर कर सकेंगे। हमारे देश और प्रदेश का कानून पुलिस के अधिकारियों पर लागू तो होता है लेकिन तमाम अपराधों के बाद भी पुलिस के लोगों को कोर्ट से ही जमानत दे दी जाती है। उन्हें जेल नहीं भेजा जाता, क्योंकि हवाला यह है कि जेल का माहौल ठीक नही है।

: मीडियाकर्मी भी काजू के बर्फी के साथ पचा जाते हैं कई खबर : आये दिन हमारी सरकारें, सत्ता के लोग, नौकरशाह व अफसर कानून पालन की बात करते हैं। आये दिन बेगुनाहों को कानून का हवाला देकर फर्जी मुकदमों में फंसाया जाता है। मीडिया से जुड़े लोगों की एक जमात भी संबंधित अफसर के पक्ष में नोटों की गड्डी खाकर जुगाली करने लगती है। कई बार सत्‍य जानकर भी धनलक्ष्मी के प्रभाव में मीडिया से जुड़े कथित लोग खबरों को बदलने में अपनी प्रतिष्ठा ताख पर रख देते हैं। कई बार मीडिया कर्मियों के भी तरफ घूमने वाली पुलिस की निगाहें उसे रौंदती है और मीडिया के लोग भी ताली बजाते है, लेकिन हम इसी संस्कृति में पले बढ़े है तो इसी संस्कृति से हमें वह रास्ता भी दिखाई देगा, जिससे हम या पीड़ित लोग इस भ्रष्ट पुलिस की भ्रष्टता उजागर कर सकेंगे। हमारे देश और प्रदेश का कानून पुलिस के अधिकारियों पर लागू तो होता है लेकिन तमाम अपराधों के बाद भी पुलिस के लोगों को कोर्ट से ही जमानत दे दी जाती है। उन्हें जेल नहीं भेजा जाता, क्योंकि हवाला यह है कि जेल का माहौल ठीक नही है।

हालात काफी बदतर है, मैं आपकी लड़ाई में हर मुद्दे पर आपके साथ हूं। शर्म की बात यह है कि गाजीपुर मेरा जिला है और इसी जिले में नंदगंज थाना है और मैं 10 वर्षो से इस जिले में मीडिया से जुड़ा हूं, आये दिन बेगुनाहों की चालान करने वाली यहां की पुलिस से जुड़े लोगों को तमाम संगीन आरोपों के बाद भी जेल जाते नही देखा। पूरा महकमा उनके पक्ष में खड़ा होता है और हर संगीन मामला ‘‘ढाक के तीन पात’’ हो जाता है। हम लोगों को इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ाई लड़नी होगी ताकि कानून का पालन पूरी तत्परता से हो। अगर चुनाव में कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए सख्ती करनी जरूरी है तो बिना वजह की सख्ती की चपेट में आये लोगों की शिकायत पर भी उसी कानून के हिसाब से कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, हो सकता है जिला पुलिस इस बात का हवाला दे रही हो कि अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने की गरज से आरोपी के परिजनों, घर की महिलाओं को नंदगंज थाने में घंटों बैठाया गया तब गिरफ्तारी हुई, तो बिना मतलब जिस अधिकारी ने महिलाओं को थाने में बेवजह बैठाया उनकी भी शिकायत पर संबंधित स्टेशन अफसर के साथ-साथ मामले में संलिप्त सभी दोषियों पर उसी कानून के हिसाब से कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।

गाजीपुर पुलिस की कुछ उपलब्धियां-

1- गहमर, थाना कोतवाली समेत कई जगहों से गश्त के दौरान सिपाहियों की राइफलें चोरी चली गयी कई साल हो गये पुलिस बरामदगी नहीं कर पायी।

2- पुलिस लाइन में किशोर के साथ हुए दुष्‍कर्म के आरोपी सिपाही समेत कई दागी सिपाहियों पर आज तक कोई मामला ही नही दर्ज हुआ, दर्ज हुआ भी तो विवेचना की कारीगरी ने उन्हें बेदाग कर दिया।

3- आये दिन पुलिस व थानों की ओर से दबाव बनाकर पीड़ितों को ही फर्जी मुकदमें में फंसाने की तमाम सूचनाएं डाक व फैक्स से रोज आईजी, डीआईजी सहित सूबे की मुखिया को भी लोग भेजते हैं, लेकिन कभी कोई दोषी जेल नही गया।

4- पिछले दिनों नगर पालिका कार्यालय से हुई तीन लाख की चोरी के संगीन मामले में भी जांच अधिकारी ने मूल एफआईआर ही बदलवा दिया, जिसका आरोप शहर के व्यापारी लगातार लगा रहे है, सूचना उच्चाधिकारियों को भी दी गयी है।

5- गाजीपुर की थाना कोतवाली में विगत दिनों तैनात कोतवाल सुरेन्द्र तिवारी ने फटा तिरंगा फहराया वह भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस मामले में शिकायत राष्ट्रपति तक की गयी। फटे तिरंगे की बीडीओ तक शासन प्रशासन को शिकायतकर्ता ने भेजा यहां तक कि जिला मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक आमरण अनशन भी किया, लेकिन कोतवाल पर मामला ही दर्ज नही हो सका। जब देश के सम्मान के मुद्दे पर भी यूपी पुलिस से रिश्तेदारी निभाई जा रही है तो आगे भगवान ही मालिक है। यहां के घांघ मीडियाकर्मियों व छायाकारों ने तो देश के सम्मान वाली इस समूची खबर ही काजू की बर्फी के साथ पचा लिया।

क्या उपर्युक्त मामलों में सूबे की सरकार या उनके प्रतिनिधियों को कानून के पालन का ख्याल नही रहता है, क्या ऐसे मामलों मे दोषी पुलिस विभाग के लोगों को जेल नहीं भेजा जाना चाहिए?

लेखक राकेश पाण्‍डेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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