Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

विदेश-ब्रह्मांड

‘पत्रकार बोले तो, बाल यौन शोषक!’

नूतन“हाय, बाल-यौन शोषकों. फिर मिलेंगे”- ये शब्द हैं निकोली सरकोजी के. वे आज कल गुस्से में हैं. जी हाँ, इन दिनों उनको बहुत अधिक गुस्सा आ रहा है क्योंकि अपना राज़ खुल जाने या अपनी बात पब्लिक में आ जाने पर गुस्सा करने का हक केवल भारत के नेताओं को नहीं है, फ़्रांस के इस चर्चित राष्ट्रपति को भी है. और स्वाभाविक तौर पर यह गुस्सा उतरता है, सबसे लाचार, सबसे कमजोर और बेचारे पत्रकारों पर- क्योंकि इन पत्रकारों को तो ऐसे “बड़े” लोगों की खबर छापनी ही है, इनकी बात सुननी ही है, इनके प्रेस कांफ्रेंस में शामिल होना ही है. आखिर “बड़े” आदमी हैं- लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं और इन्हें कवर करना मजबूरी है. इसके बाद ये लखनऊ में जैसे शाही इमाम ने सरे-आम प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को पीटा वैसे पीटें या जैसा सरकोजी ने खुले-आम गरिआया वैसे गरियायें जायें. तभी तो पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो (नोर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) की एक मीटिंग में गए सरकोजी ने सीधे-सीधे यह इल्जाम लगा दिया कि पत्रकार “बाल-यौन शोषक” होते हैं. जी हाँ, अब उसी सरकोजी को, जिन्हें कुछ साल पहले इन्हीं बेवकूफ पत्रकारों ने फ़्रांस और दुनिया में परिवर्तन के प्रतीक के रूप में और एक ताज़ी हवा के रूप में हाथों-हाथ लिया था, अब ये पत्रकार बाल-यौन शोषक लगने लगे हैं.

 

नूतन“हाय, बाल-यौन शोषकों. फिर मिलेंगे”- ये शब्द हैं निकोली सरकोजी के. वे आज कल गुस्से में हैं. जी हाँ, इन दिनों उनको बहुत अधिक गुस्सा आ रहा है क्योंकि अपना राज़ खुल जाने या अपनी बात पब्लिक में आ जाने पर गुस्सा करने का हक केवल भारत के नेताओं को नहीं है, फ़्रांस के इस चर्चित राष्ट्रपति को भी है. और स्वाभाविक तौर पर यह गुस्सा उतरता है, सबसे लाचार, सबसे कमजोर और बेचारे पत्रकारों पर- क्योंकि इन पत्रकारों को तो ऐसे “बड़े” लोगों की खबर छापनी ही है, इनकी बात सुननी ही है, इनके प्रेस कांफ्रेंस में शामिल होना ही है. आखिर “बड़े” आदमी हैं- लोग इनके बारे में जानना चाहते हैं और इन्हें कवर करना मजबूरी है. इसके बाद ये लखनऊ में जैसे शाही इमाम ने सरे-आम प्रेस कांफ्रेंस में एक पत्रकार को पीटा वैसे पीटें या जैसा सरकोजी ने खुले-आम गरिआया वैसे गरियायें जायें. तभी तो पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो (नोर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) की एक मीटिंग में गए सरकोजी ने सीधे-सीधे यह इल्जाम लगा दिया कि पत्रकार “बाल-यौन शोषक” होते हैं. जी हाँ, अब उसी सरकोजी को, जिन्हें कुछ साल पहले इन्हीं बेवकूफ पत्रकारों ने फ़्रांस और दुनिया में परिवर्तन के प्रतीक के रूप में और एक ताज़ी हवा के रूप में हाथों-हाथ लिया था, अब ये पत्रकार बाल-यौन शोषक लगने लगे हैं.

 

 

कारण और कुछ नहीं, मात्र इतना है कि जो सरकोजी दुनिया को तरह-तरह के सपने दिखा कर फ़्रांस की गद्दी पर आये थे, वे आज से साढ़े तीन साल पहले गद्दी-नशीं होने के बाद से अपनी प्रेमिका से पत्नी बनी सुंदरी कार्ला ब्रूनी के साथ अर्ध-नग्न तस्वीरों के अलावा किसी अन्य अच्छे काम से सुर्ख़ियों में नहीं आ सके हैं. उनके द्वारा दिखाए गये तमाम स्वप्न धराशाही होते चले गए और अब सिर्फ उनकी नाकामयाबियाँ ही उनके साथ चल रही दिखती हैं.

उस पर भी तुर्रा यह कि अब धीरे-धीरे कई ऐसी पुरानी बातें खुल कर सामने आने लानी हैं, जिसके कारण सरकोजी की इमेज पर और गहरा धक्का लग रहा है. इनमे से एक मामला है सरकोजी पर नब्बे की दशक में फ़्रांस के राजनेताओं को किकबैक (यानी घूस) देने का. इन दिनों यह मामला फ्रांस में काफी तूल पकड़े हुए है और इसमें स्वयं सरकोजी की भूमिका भी इंगित की जा रही है.

सरकोजी इन बातों से काफी नाराज़ हैं और अब मीडिया को बिलकुल ही पसंद नहीं कर रहे हैं. अब जहां फ़्रांस में उन्होंने मीडिया से बात-चीत लगभग बंद कर दी है, वहीं उन्हें यह उम्मीद शायद नहीं रही होगी कि पडोसी मुल्क पुर्तगाल में नाटो मीटिंग के दैरान भी पत्रकार यही बात पूछ बैठेंगे. लेकिन जैसे ही यह बात चर्चा में आई सरकोजी भड़क उठे और देखिये उन्होंने क्या कहा-“ दुनिया वास्तव में पागल हो गयी है. आप में से कोई यह बात नहीं मान रहा है कि मैंने इस पैसे के लेनदेन और किकबैक में कोई भूमिका नहीं निभाई है और ना ही पाकिस्तान में पनडुब्बियों की खरीद के कथित घोटाले से ही मेरा कोई मतलब है. यह बात अकल्पनीय है.”

लेकिन वे यहीं नहीं रुके और आगे कहा-“अब अगर इसी तरह बात करनी है तो मैं कहता हूँ कि आप बाल-यौन शोषक हैं. किसने कहा? मैं कह रहा हूँ क्योंकि यह मेरी व्यक्तिगत सोच है.” इतना कह कर सरकोजी प्रेस कांफ्रेंस से उठे और चलते समय हाथ हिला कर उन पत्रकारों से कहा- “हाय, बाल-यौन शोषकों. फिर मिलेंगे.” और आगे बढ़ गए. अब देखना यह है कि इसी गुस्से की स्थिति में सरकोजी पत्रकारों को आगे किस-किस पदवी से नवाजते हैं.

लेखिका डा. नूतन ठाकुर लखनऊ से प्रकाशित पीपल’स फोरम की संपादक हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...