आत्महत्या के मामले में दिन प्रतिदिन हो रही बढ़ोत्तरी का यह परिणाम है कि अब बैतूल जिले में भी औसतन प्रतिदिन दो आत्महत्या के मामले होने लगे हैं. कलेक्टर की जन सुनवाई में 23 नवम्बर 2010 को जहर पीने वाली फुलवा बाई तो किसी तरह से बच गई, लेकिन 24 नवम्बर 2010 दिन बुधवार चिचोली थाना क्षेत्र के ग्राम आमला करवा की आदिवासी महिला रंगोबाई पत्नी सोहनलाल ने कीटनाशक पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली. इसी कड़ी में बैतूल जिला मुख्यालय के विवेकानंद वार्ड की एक दंपति ने भी संग-संग आत्महत्या का प्रयास किया, जिसमें पुष्पा की जीवन लीला समाप्त हो गई जबकि पति राजू साहू जिदंगी और मौत के बीच जूझ रहा है. मध्यप्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता ने हाल ही में इसी विधानसभा सत्र में विधायक रामनिवास रावत के एक सवाल के जवाब में बताया कि प्रदेश में प्रतिदिन औसतन 21 लोग आत्महत्या कर रहे है. बीते 142 दिनों में 3096 लोगों ने आत्महत्या की है, जिसमें चार किसान भी है. जिनका पीपली लाइव जैसे नत्था की तरह हाल था. दो किसान भोपाल तथा एक उज्जैन का है.
जिस दिन आदिवासी महिला कलैक्टर कार्यालय मे जहर पी रही थी उस समय भाजपा की नेत्री एवं राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य सुश्री राजो मालवीय प्रदेश सरकार की 29 नवम्बर 2010 को भोपाल में आयोजित गौरव दिवस की तैयारी के संदर्भ में जिला भाजपा कार्यालय में जिले के भाजपाईयों के समक्ष मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सुराज के कसीदे पढ़ रही थी. अक्सर कहा जाता रहा है कि महिलायें भावुक एवं कमजोर दिल की होती है, उनका दिल किसी भी मामले में पहुंची पीड़ा से टूट जाता है. प्रताड़ना और मानसिक यातना तथा यौन उत्पीड़न के मामलों में अकसर पीडि़त महिला न्याय न मिलने की स्थिति में तथा कथित सामाजिक उलाहना एवं बहिष्कृत होने पर आत्महत्या कर लेती हैं.
प्रदेश में एक अन्य जानकारी के अनुसार पुरूष की अपेक्षा महिलायें द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के मामलों की संख्या ज्यादा है. बैतूल जैसे आदिवासी जिले में आदिवासी एवं दलित महिलाओं द्वारा सर्वण जातियों की प्रताड़ना से तंग आकर की जाने वाली आत्महत्याएं सबसे अधिक चिंताजनक बात है. बैतूल जिला महिला उत्पीड़न के मामलों में पूरे प्रदेश में कांग्रेस एवं भाजपा के शासनकाल में सुर्खियों में रहा है. जिले की आमला तहसील तो महिला उत्पीड़न के मामले में अव्वल है. जिले की आमला तहसील में खापाखतेडा गांव में तीन महिलाओं को जिंदा जलाने के मामले की कालिख अभी प्रदेश की सरकार के चेहरे से ठीक ढंग से साफ भी नहीं हो पाई है कि अब बैतूल जिले में घटित घटनाएं जिले को शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड रही है.
लेखक रामकिशोर पंवार पत्रकार हैं तथा सामाजिक सरोकारों पर लगातार लेखन करते रहते हैं.

