इमराना प्रकरण को लेकर चर्चित रह चुके मुजफ्फरनगर में एक नया लेकिन बेहद विचित्र मामला प्रकाश में आया है। इद्दत में बैठी एक मुस्लिम महिला को धर्म गुरुओं ने अपनी बेटी और धेवते की मौत के बाद दामाद के घर जाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। समाज के जिम्मेदार लोग जमा हुए। मामले पर कई घंटे विचार विमर्श किया गया। अंत में बेटी और धेवते के जनाजे को कब्रिस्तान ले जाने से पहले इद्दत में बैठी महिला को आखिरी दर्शन कराने के लिए ले जाया गया। मुजफ्फरनगर के कसबा सिसौली निवासी शौकत अली ने अपनी बेटी समां का निकाह पिछले वर्ष सिसौली के ही वसीम नामक युवक के साथ किया था। समां की ससुराल और मायके में मुश्किल से एक किलोमीटर का अंतर है। दो महीने पहले दिल का दौरा पडऩे से शौकत की अचानक ही मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद शौकत की बेगम कमरुन इद्दत पर बैठ गई। गम में डूबे परिवार को तब खुशी मिली जब लगभग पन्द्रह दिन पहले समां ने एक पुत्र को जन्म दिया।
शौकत की मौत के बाद दोनों परिवारों के लिए खुशी का यह पहला मौका था। लेकिन दोनों परिवारों की यह खुशी अधिक दिनों तक बरकरार नहीं रह सकी। कई दिन पहले ठंड और बीमारी के चलते समां और नवजात शिशु की मौत हो गई। जिसे भी इस हादसे का पता चला वह पीडि़त परिवार को सांत्वना देने वसीम के घर पहुंचा। कमरुन की इच्छा भी नाजों से पाली अपनी बेटी और धेवते के आखिरी दर्शन करने की हुई। लेकिन ‘इद्दत’ बाधा बन गई। समाज के कुछ जिम्मेदार लोगों ने स्थानीय धर्म गुरुओं को बुलाकर कमरुन को बेटी के घर जाने की इजाजत देने की मांग की। धर्म गुरुओं ने कमरुन को घर से बाहर जाने की इजाजत देने से मना कर दिया। कमरुन के लिए यह फरमान बेहद पीड़ादायक था। मामले पर दोबारा विचार विमर्श हुआ। तय किया गया कि समां और उसके बेटे का जनाजा कब्रिस्तान ले जाने से पहले मायके लाया जाएगा जहां इद्दत पर बैठी कमरुन दोनों के आखिरी दर्शन कर सकें। सबने इस बात पर हामी भर दी। हुआ भी यही। मौलवी का इंसाफ चर्चा का विषय बना हुआ है।
लेखक मदन बालियान पत्रकार हैं तथा रोहतक में हरिभूमि के साथ जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क इनके ईमेल [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

