: लखनऊ में ग्यारहवां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न : दुखः का दरिया फूट पड़ा… पल्ला झाड़ रहे यह गम है… बिलख रहा सारा मंजर तो… तबाह हुऐ तो सिर्फ हम है… कवि अग्निवेद को इस कविता की तरह लोकतन्त्र में पक्ष और विपक्ष में अपनी बात रखने का न्यायोचित अधिकारों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, आज नही तो कल भले ही वे हमारे दुश्मन नहीं है हमारे ही बंधु बान्धव है उन्हें अपने अधिकारों को देन की आवाश्यकता है। महात्मा गांधी के वचनों में अब विकास के नाम पर छलावा मंजूर नहीं है। एक दूसरे के पाले में गेंद डालकर मूकदर्शक बनने की कोशिश गहरे अराजकता पूर्णहालत में जाने को विवश कर देगा। युद्ध करना ही कोई चारा नहीं। यह बातें लखनऊ के सिटी मान्टेसरी स्कूल के तत्वावधान में आयोजित ‘विश्व के मुख्य न्यायाधीशों के ग्यारहवें अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ में पधारे 71 देशों के न्यायविदों व कानूनविदों ने कहा। न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि विश्व के दो अरब बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। न्यायविदों व कानूनविदों ने कहा कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ‘प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था’ सबसे सशक्त माध्यम है जिसका रास्ता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 से निकलता है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 की भावना को आत्मसात करके ही ‘विश्व संसद’ व ‘विश्व सरकार’ का गठन संभव है।
पत्रकारों से बातचीत करते हुए न्यायविदों व कानूनविदों ने कहा कि जब तक विश्व सरकार नहीं बन जाती, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे व विश्व एकता का अलख जगाते रहेंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि वह दिन दूर नहीं जब विश्व में एक नई विश्व व्यवस्था बनेगी और एकता व शान्ति का राज कायम होगा। ज्ञातव्य हो कि सिटी मोन्टेसरी स्कूल के तत्वावधान में 10 से 14 दिसम्बर तक आयोजित ‘‘विश्व के मुख्य न्यायाधीशों का ग्यारहवाँ अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन’’ अत्यन्त सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। इस ऐतिहासिक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के 71 देशों के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश, कानूनविद तथा ख्याति प्राप्त शान्ति संगठनों के प्रतिनिधियों ने ‘विश्व के 2 अरब बच्चों के सुरक्षा’ पर सारगर्भित चर्चा की एवं अपने गहन चिंतन-मनन का निष्कर्ष ‘‘लखनऊ घोषणा पत्र’’ के रूप में जारी किया। आज यहाँ सम्पन्न हुई प्रेस वार्ता में देश-विदेश के न्यायविदों व कानूनविदों ने ‘‘लखनऊ घोषणा पत्र’’ की विस्तृत जानकारी दी।
‘‘लखनऊ घोषणा पत्र’’ का सार रखते हुए न्यायविदों ने कहा कि इस सम्मेलन में सीएमएस के 39,000 बच्चों द्वारा विश्व के 2 अरब बच्चों व आने वाली पीढ़ियों की ओर से इस अपील को अन्तर्राष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश सम्मेलन के प्रतिभागियों द्वारा स्वीकार किया गया कि विश्व के दो अरब बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए विश्व सरकार के गठन का सतत प्रयास किया जाए जिससे विश्व में आतंकवाद, महामारी, युद्ध आदि जैसी विभीषिकाओं पर रोक लगे। धरती शान्तिमय और खुशहाल बने और एक विश्व संस्था प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था बनाए जिससे परमाणु बम व प्राकृतिक खतरों से धरती को सुरक्षा प्रदान की जाए। इससे बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी और उनको विरासत में सुरक्षित वातावरण और भविष्य मिलेगा।’
अपने विचार व्यक्त करते हुए उगांडा के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री बीजे ओडोकी ने कहा कि अब संसार भर के बच्चों के भविष्य को लेकर उठाये प्रश्नों को टाला नहीं जा सकता बल्कि इसे उज्ज्वल रूप प्रदान करने के लिए ठोस कानून व्यवस्था बनानी चाहिए जो सभी देशों पर समान रूप
से लागू की जा सके। यदि हम अभी नहीं चेते तो फिर बहुत देर हो जायेगी और मानव जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। अफगानिस्तान के मुख्य न्यायाधीश प्रो. अब्दुल सलाम अजीमी ने कहा कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है दुनिया के देशों में एकता की। हम केवल अपने बारे में न सोचें बल्कि अपने पड़ोसी के बारे में भी सोचें। इजिप्ट सुप्रीम कोर्ट के डिप्टी चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति डा. आदेल ओमार शेरीफ ने कहा कि आज जरूरत है कि सारे विश्व में महात्मा गांधी जी के विचारों को अपनाया जाए और अपने अहिंसा, सत्य और प्रेम के शक्तिशाली हथियारों से पृथ्वी के लोगों का मन जीत लें व आतंकवाद को सदा के लिए इस धरती से मिटा दें। इण्टरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के पूर्व उपाध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री सीजी वीरामंत्री ने कहा कि हम यह मानते हैं कि सीएमएस द्वारा आयोजित इन अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन से भारत की पवित्र भूमि में हमें विश्व सरकार गठित करने व अन्तर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था बनाने के लिए नई प्रेरणा शक्ति मिलेगी, जिससे हम आने वाले कल को सुधार सकेंगे और एक नई विश्व व्यवस्था कायम कर सकेंगे। इसी प्रकार गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस कुरैशी ने कहा कि कई बार भौगोलिक परिस्थिति भी मानवता के अनुकूल नहीं होती हैं, जैसे सुनामी या भूकम्प आदि जिसमें कितने ही लोग मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। यदि सभी देशों में सामन्जस्य होगा तो ऐसे वक्त में मानवता की सेवा की जा सकती है और प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था इसमें अहम भूमिका निभायेगी।
सम्मेलन के संयोजक प्रख्यात शिक्षाविद व संस्थापक सीएमएस डा. जगदीश गाँधी ने कहा कि यह अन्तर्राष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश सम्मेलन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(सी) पर आधारित था, जिसमें कहा गया है कि राज्य इस ओर प्रयासरत रहेगा कि अन्तर्राष्ट्रीय कानून का आदर करे। राज्य की इस परिभाषा में देश के सभी नागरिक शामिल हैं जिन पर यह संविधान लागू होता है। किन्तु अन्तर्राष्ट्रीय कानून का आदर तभी संभव है, जब एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून व्यवस्था हो जो ऐसे कानून बनाए और इनको समान रूप से सभी देशों पर लागू किया जाए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को और सशक्त करना होगा व इसमें सुधार करने होंगे, जिससे सभी देशों का प्रतिनिधित्व बराबरी से हो और लखनऊ घोषणा पत्र इस बात पर जोर देता है।
डा. गाँधी ने बताया कि इस ग्यारहवें अन्तर्राष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश सम्मेलन में विश्व के 71 देशों के लगभग 225 मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश व कानूनविदों ने भाग लेकर विश्व सरकार बनने के दिवास्वप्न को साकार किया है। उन्होंने जोरदार शब्दों में कहा कि अब वह दिन दूर नहीं जब विश्व की एक सरकार होगी, एक संसद होगी, एक विश्व न्यायालय होगा व एक मुद्रा होगी व दुनियावासी विश्व नागरिक और यह मुहिम विश्व सरकार बनने तक जारी रहेगी। डा. गाँधी ने कहा कि इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन को दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का जिस तरह से हमें समर्थन व प्रोत्साहन मिल रहा है, उससे साफ जाहिर होता है कि बारूद के ढेर पर बैठी विश्व मानवता को एकता व शान्ति की कितनी जरूरत है। उन्होंने बताया कि आगामी मुख्य न्यायाधीश अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में एक बार फिर से दुनिया भर के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश, राष्ट्राध्यक्ष व कानूनविदों को आमन्त्रित किया जायेगा।
लखनऊ से सुरेन्द्र अग्निहोत्री की रिपोर्ट.

