दो राज्यों की राजधानी और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ देश का ऐसा राज्य बन गया है, जहां आबादी के अनुपात में सबसे ज्यादा वाहन हैं। पिछली जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी लगभग नौ लाख थी, अभी का आंकड़ा आना है। पिछली गणना में 44 प्रतिशत का इजाफा हुआ था, उससे ज्यादा पचास भी माने तो यहां की आबादी पंद्रह लाख के आसपास होती है। यहां वाहनों की तादाद आठ लाख तक पहुंच जाएगी, अर्थात हर दो में से एक व्यक्ति के पास अपना दुपहिया या चौपहिया वाहन है। यहां पंद्रह से बीस फीसदी आबादी कच्ची या अनधिकृत कालोनियों में रहती है, जहां वाहन खरीद की क्षमता न के बराबर है। इसका अर्थ हुआ कि शहर की 80 प्रतिशत आबादी के पास ही ये साढ़े आठ लाख वाहन हैं, यानी हर दो लोगों के पास तीन वाहन हैं। कुछ घरों में तो सदस्यों के हिसाब से भी ज्यादा वाहन हैं, तो कहीं पूरे घर के लिए एक भी वाहन नहीं है। इस अमीर शहर के गरीब लोगों को वाहनों की बढ़ती तादाद से कोई ईष्या नहीं है, उन्हें न वाहन पार्क करने की चिंता है, न रेट बढऩे की। हां जाम में वे भी फंसते हैं लेकिन इसमें उनका कोई कसूर नहीं है। 1952 में पांच लाख की ज्यादा से ज्यादा आबादी को ध्यान में रखते हुए शहर बसाया गया था और उसी लिहाज से यहां की सडक़ें बनाई गई थी, लेकिन आज क्या हुआ है। आबादी तीन गुना हो गई और वाहन की तादाद यहां बीस गुना ज्यादा हो गई।
यह सम्पन्नता का प्रतीक है, हो भी क्यों नहीं यहां प्रति व्यक्ति आय 67370 रुपए है, जबकि राष्ट्रीय औसत 23241 रुपए ही है, तीन गुना ज्यादा प्रति व्यक्ति आय यहां है। मोटे अनुमान के मुताबिक यहां रोज 125 नए वाहन सडक़ पर आते हैं और साल के 365 दिन से इसका गुणा किया जाए तो संख्या 45 हजार से ज्यादा होती है। जब शहर की सडक़ें ज्यादा से ज्यादा एक लाख वाहनों की हैं तो आठ लाख वाहनों में क्या होगा? जाम और पार्किंग की समस्या। पार्किंग की समस्या यहां विकराल हो चुकी है, आने वाले चार-पांच सालों में अगर ठोस नीति नहीं बनाई गई तो वाहनों की बिक्री में एकाएक कमी आ सकती है। जाम की समस्या भी सिर उठाने लगी है। सुबह-शाम व्यस्त मार्गों पर स्थिति देखी जा सकती है। आने वाले कुछ सालों में इस सुनियोजित शहर में भी दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता या चेन्नई की तरह वाहन रेंगते हुए चलते दिखने लगे और जल्द से जल्द गंतव्य तक पहुंचने की आपाधापी हो तो भी क्या आप इसे सिटी ब्यूटीफुल शहर ही कहेंगे?

