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निजी कारणों से हुई सरकारी मौत

नीरवबांसुरी प्रसादजी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि ज़िंदगीभर चैन की बांसुरी बजानेवाले बांसुरी प्रसाद की मौत सरकार के जी का जंजाल बन जाएगी। संवेदनशील सरकार का एक कलाकार की मौत पर परेशान होना लाजिमी है। और फिर बांसुरी प्रसादजी तो सरकार के बुलाने पर ही लोक-कला-संगीत के जलसे में भाग लेने के लिए राजधानी आए थे। बांसुरी प्रसादजी़ की ज़िंदगी की ये फर्स्ट एंड फाइनल हवाई यात्रा थी। सरकार के सौजन्य से एक साथ उन्हें पांच सितारा होटल में ठहरने और हवाई जहाज में बैठने का टू-इन-वन प्रसन्नतादायक मौका मिला था। शायद खुशी के हैप्पी लम्हों की इस हैवी डोज़ को बेचारे बांसुरी प्रसादजी झेल नहीं पाए और अपनी जान पर खेल गए। कलाकार थे। और कलाकार तो बेचारे होते ही घोर भावुक हैं। सरकारी खातिरदारी का ज़ोर का झटका उन्हें ज़रा ज्यादा ही ज़ोर से लग गया। अब बांसुरी प्रसादजी तो हैवन सिधार गए मगर सरकार की जान सांसत में डाल गए। पूरा तंत्र परेशान है कि इस राष्ट्रीय आपदा से निबटा कैसे जाए। समस्या एक हो तो उससे निबटें भी मगर यहां तो बांसुरी प्रसादजी की बॉडी पर तो धारावाहिक समस्याएं उछल-कूद कर रहीं हैं।

नीरव

नीरवबांसुरी प्रसादजी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि ज़िंदगीभर चैन की बांसुरी बजानेवाले बांसुरी प्रसाद की मौत सरकार के जी का जंजाल बन जाएगी। संवेदनशील सरकार का एक कलाकार की मौत पर परेशान होना लाजिमी है। और फिर बांसुरी प्रसादजी तो सरकार के बुलाने पर ही लोक-कला-संगीत के जलसे में भाग लेने के लिए राजधानी आए थे। बांसुरी प्रसादजी़ की ज़िंदगी की ये फर्स्ट एंड फाइनल हवाई यात्रा थी। सरकार के सौजन्य से एक साथ उन्हें पांच सितारा होटल में ठहरने और हवाई जहाज में बैठने का टू-इन-वन प्रसन्नतादायक मौका मिला था। शायद खुशी के हैप्पी लम्हों की इस हैवी डोज़ को बेचारे बांसुरी प्रसादजी झेल नहीं पाए और अपनी जान पर खेल गए। कलाकार थे। और कलाकार तो बेचारे होते ही घोर भावुक हैं। सरकारी खातिरदारी का ज़ोर का झटका उन्हें ज़रा ज्यादा ही ज़ोर से लग गया। अब बांसुरी प्रसादजी तो हैवन सिधार गए मगर सरकार की जान सांसत में डाल गए। पूरा तंत्र परेशान है कि इस राष्ट्रीय आपदा से निबटा कैसे जाए। समस्या एक हो तो उससे निबटें भी मगर यहां तो बांसुरी प्रसादजी की बॉडी पर तो धारावाहिक समस्याएं उछल-कूद कर रहीं हैं।

छोटे बाबू ने आकर बड़े बाबू से शिकायती लहजे में आकर खबर दी कि- बांसुरी प्रसादजी को दिल का दौरा पड़ा था। और उनके कलाकार दोस्त इत्ती-सी बात पर सरकार को भरोसे में लिए बिना उन्हें अस्पताल ले गए। और सर वो भी प्राइवेट अस्पताल में। सर…प्राइवेट अस्पताल का ढर्रा तो आप जानते ही हैं। अस्पताल वालों ने पूरी निष्ठा के साथ बांसुरी प्रसादजी के मरने के आठ घंटे बाद तक अपना इलाज जारी रखा और पांच लाख रुपए का बिल बना दिया है। अस्पताल प्रबंधक पूछ रहे हैं कि इस बिल का भुगतान कौन करेगा। मीडियावाले बांसुरी प्रसादजी की पत्नी को गांव से राजधानी बुलाने का भी दबाव डाल रहे हैं। सर, आप अपने बड़े बाबू से इस मसले पर तुरंत चर्चा कर लें। छोटे बाबू ने बड़े बाबू को अपना दफ्तरी धर्म याद दिलाया। और समस्याओं की गेंद उनकी पाली में डालकर निश्चिंत हो गए।

बड़े बाबू ने हथेली पर रगड़ी जा रही खैनी को मुंह की गुल्लक में डालते हुए छोटे बाबू से पूछा- अभी टाइम क्या हो रहा है। छोटे बाबू ने सहमते हुए कहा- साढ़े पांच। और ये दफ्तर कितने बजे तक का है। पांच बजे तक का। और वो अस्पताल जिसमें बांसुरी प्रसाद मरे हैं, दफ्तर में है क्या। नहीं बड़े बाबू। तो फिर ऑफिस टाइम के बाद ऑफिस के बाहर की टिटपुंजिया घटनाओं के बुलेटिन पढ़ने का आपने पार्ट टाइम जॉब कर लिया है। बड़े बाबू ने छोटे बाबू के ढीले पेच कसे। और धमकी दी कि नौकरी करनी है तो अपनी सीमाओं को पहले समझो। जिस फाइल को देखने का तुम्हें जिम्मा दिया गया है उसके बाहर की बातों पर टिप्पणी की तुम्हें जरूरत नहीं है। याद रखो तुम एक सरकारी कर्मचारी हो कोई समाजसेवी नहीं। ऑफिस के प्रोटोकॉल को समझो। ध्यान से सुनो- बांसुरी प्रसाद की मौत का समाचार न तुम्हें मालूम है न हमें। क्योंकि जो चीज़ तुम्हारे अफसर को नहीं मालूम वो तुम्हें भी मालूम नहीं होना चाहिए। यही दफ्तर का दस्तूर है। अब अगर तुम्हारा अफसर कहे कि मुझे तुम्हारे पिताजी का नाम नहीं मालूम तो तुम्हें भी खीं—खीं करते हुए यही कहना चाहिए- सर… जब आपको नहीं मालूम तो मुझे भी कैसे मालूम हो सकता है। यही दफ्तर का दस्तूर है। अब तुमने मुझे जो सूचना दी है, वह ऑफ द रिकार्ड है।

तुम क्या समझते हो। कि मेरे बड़े बाबू को इस हादसे की खबर नहीं होगी। उनका सामाजिक दायरा तुमसे बहुत बड़ा है। अपनी औकात समझो। तुम छोटे कर्मचारी हो। तुम्हें किसी के मरने की खबर उसके मरने के बाद ही मिलती है। बड़े साहब को किसी के मरने की खबर मरने वाले के मरने से पहले ही मिल जाती है। जबकि मरनेवालों को तो अपने मरने की खबर मरने के बाद भी नहीं होती। बड़े साहब की बड़ी पहुंच है। सुनो चाहे सारी दुनिया को बांसुरी प्रसाद के मरने की खबर मिल जाए, हमें यह खबर दफ्तर में बड़े बाबू ही देंगे। और हम आंखें गोल करके और मुंह फाड़के चौंकते हुए पूछेंगे- अरे सर, कब डेथ हुई, बांसुरी प्रसाद की। समझ गए न। यही दफ्तरी रिवाज है। हमें क्या जरूरत है फालतू में किसी के फटे में पांव अड़ाने की। हम सरकारी कर्मचारी हैं। आज का दफ्तर-दफ्तर हम खेल चुके। दफ्तर खतम..चिंता हजम। चलो फटाफट हम अपने-अपने घर को कूच करें। बड़े बाबू ने कहा- माल-मत्ता भी लेना है। कल ड्राई डे है। जब शाम है इतनी मतवाली तो रात का आलम क्या होगा..गाते हुए बड़े बाबू घर को डिस्पैच हो लिए। रास्ते में सुलभ जन-सुविधा का संतोषजनक लाभ लेते हुए बड़े बाबू ने अपने बड़े बाबू को मोबाइल पर बांसुरी प्रसाद की मौत की खबर फुसफुसा दी।

बड़के बाबू क्लबनशीन हो चुके थे। और भरपेट घूंटायित भी। उन्होंने इस अनावश्यक सूचना को सुनने के बाद अपना मोबाइल बड़ी सावधानी के साथ बंद कर लिया। और अपने आप को मीडिया के संसार से सतर्कतापूर्वक अपने में ही सिकोड़ लिया। सूंघा पत्रकार और खोजी चैनलिया रातभर आइस-पाइस खेलते रहे, मगर बड़े बाबू की बरामदगी का सुराग उन्हें सुबह ऑफिस में ही आकर लगा। मीडिया ने पूछा कि- बांसुरी प्रसाद की मौत की खबर आपको है। बड़े साहब ने कहा- मुझे यह दुखद समाचार आप लोगों से ही सुनने को मिल रहा है। अस्पताल प्रबंधकों से भी हमें अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है। उनसे संपर्क हो जाने के बाद ही हम इस घटना पर कुछ कह सकेंगे। अच्छा नमस्कार। यह कहकर मीडिया को उन्होंने चलता कर दिया। और इसके बाद अपने सहयोगियों की आपातकालीन बैठक बुलाई और अपने स्तर पर मिस्टर सक्सेना को प्रकरण की वस्तुस्थिति का पता लगाकर तुरंत पूरे मामले को समुचित आख्या के साथ फाइल पर लाने का लिखित सरकारी आदेश दे डाला। चार घंटे की कठोर-मनोरंजक मशक्कत के बाद सक्सेना ने बड़े साहब के आगे अपनी मानवीय संवेदनाओं से भरपूर फाइल परोस दी। मजमून इस प्रकार था-

दिनांक 18 दिसंबर2010

पत्र संख्या-अ.ज. 420

श्रीमान निदेशक महोदय,

निवेदन है कि कला-संगीत समारोह में भाग लेने आए बांसुरी प्रसाद की हार्ट अटैक से हुई मृत्यु की पुष्टि अस्पताल प्रबंधकों ने की है। और अपने पक्ष को प्रामाणिक बनाने के लिए बांसुरी प्रसाद का डेथ सर्टिफिकेट भी हमें भिजवा दिया है। मगर उन्होंने बिना बिल का भुगतान किए बॉडी देने में अपनी असमर्थता जताई है। ऐसे मामलों में किस मद से राशि का भुगतान किया जाए, इस दिशा में ब्रिटिश सरकार से लेकर आज तक की फाइलों का अवलोकन कर लेने पर भी ऐसी कोई मिसाल सामने नहीं आई है। इसलिए कृपया  आप समुचित व्यवस्था दें।

हस्ताक्षर

चुन्नीलाल सक्सेना

सेक्शन ऑफिसर

सेक्शन ऑफिसर के मजमून को बारीकी से जांचने के बाद बड़े बाबू ने चंद मानवीय आपत्तियों के साथ कुछ जरूरी जानकारियां मांग लीं-

दिनांक 18 दिसंबर2010

पत्र संख्या-अ.ज. 420

अति आवश्यक

उपरोक्त पत्र के संदर्भ में बताएं कि-

(1) बांसुरी प्रसाद का देहांत जब उनके अपने निजी कारणों से हुआ है तो फिर सरकार द्वारा उनके बिल भुगतान का औचित्य कैसे तय किया जा सकेगा।

(2) कार्यक्रम में भाग लेने से पहले ही बांसुरी प्रसाद ने मरने की जो गैर-जिम्मेदाराना हरकत की है, उससे आयोजन की प्रतिष्ठा पर भी आंच आ सकती है। ऐसे में उनका पारिश्रमिक रोकने और हर्जाने के बतौर उनके परिवार से क्या जुर्माना वसूली की जा सकती है। ताकि भविष्य में भी कोई कलाकार कार्यक्रम के दौरान मरने-जैसी ओछी हरकत करने की हिम्मत न कर सके। इस संबंध में एकाउंट सेक्शन से तुरंत और विस्तृत आख्या ले लें।

(3) ध्यान दें कि बांसुरी प्रसाद को सरकार ने बुलाया था मगर अपने निजी फायदे के लिए बांसुरी प्रसाद ने मरने के लिए जानबूझकर निजी अस्पताल ही चुना। जबकि यह कार्य बड़ी आसानी के साथ सरकारी अस्पताल में भी संपन्न हो सकता था। मृतक के इस संदिग्ध आचरण को देखते हुए भी क्या सरकार उनके मरने के बिल का भुगतान करने को लिए बाध्य है। जरूरी समाधानों के साथ तुरंत टिप्पणी दें।

हस्ताक्षर

सचिव

बड़े साहब की फाइल पढ़कर सक्सेना बाबू ने तत्काल टिप्पणी भेज दी-

महोदय,

आपकी मांगी गई जानकारी के बाबत..

ऑफिस मेनुअल के अनुसार और फिर मृतक के संदिग्ध आचरण को देखते हुए सरकारी मद से उनके बिल का भुगतान करना निश्चित ही एक भावुक कृत्य होगा। लेकिन जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी तंत्र भावनाओं से नहीं नियम-कानून से चलता है। फिर भी आप को विवेकाधीन मद से बिल के निस्तारण का अधिकार है। मगर आपके संज्ञान में यह लाना भी जरूरी होगा कि ऐसा करने से जो नई परंपरा बनेगी उसकी आगे के समय में कलाकारों द्वारा दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि इस मामले में समाजसेवी संस्थाएं आरटीआई डालकर आपसे सवाल-पड़ताल करने को स्वतंत्र होंगी।

फाइलों की ये दफ्तरी बॉलीबाल पूरे शबाब पर थी। कि तभी बड़े साहब को मुख्यमंत्री कार्यालय ने तलब कर लिया। हाथ में फाइल और सिर पर पांव रख के बड़े साहब सशरीर मुख्यमंत्री धाम सिधार गए। बड़े साहब को हड़काते हुए मुख्यमंत्री ने पूछा- बांसुरी प्रसाद की बॉडी अभी तक अस्पताल में क्यों है। बड़े बाबू ने कांपते हाथों और हांफते गले से फाइल आगे बढ़ाते हुए कहा- सर अस्पताल का बिल सेटल होना है। पांच लाख रुपए का बिल है। पैसा किस मद से..बड़े बाबू की बात का मुख्यमंत्री ने गले में ही गला दबा दिया और बोले- मुख्यमंत्री कोष से पचास लाख रुपए निकाल लो बांसुरी प्रसाद- जैसे महान कलाकार रोज़-रोज़ थोड़े ही मरते हैं। फिर चुनाव भी सिर पर हैं। मेरे चुनाव क्षेत्र में इसकी जाति के डेढ़ लाख वोट हैं। मुझे इस चिरकुट की मौत को पूरी तरह भुनाना है। बांसुरी प्रसाद को गांव ले जाने के आप तुरंत इंतजाम करें। मैं भी साथ में जाऊंगा। चुनाव सिर पर हैं। मुख्यमंत्रीजी की राजनैतिक भावुकता देखकर बड़े बाबू के होठों पर भी एक सरकारी हंसी तैर गई। शाम को सारे देश ने मुख्यमंत्री को बिना आंसूवाली आंखें रूमाल से पौंछते हुए टीवी पर बार-बार देखा। संवेदनशील मुख्यमंत्री के लिए राजधानी के कला महोत्सव के मुकाबले अपने गांव की नौटंकी में शरीक होना ज्यादा फायदे का सौदा जो है। चुनाव में इस बार वोटों की फसल अच्छी होने की पूरी संभावना है क्योंकि बांसुरी प्रसाद रूपी जैविक खाद को सही ऋतु और सही समय में इस्तेमाल जो कर लिया गया है।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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