: कानून नहीं समाज की जागरूकता से कम होगा भ्रष्टाचार : नीरा राडिया को पानी पी-पी कर कोसने वाले इस दौर में थोडा अन्य पहलू पर भी गौर करें. कल्पना करें कि अगर वैष्णवी कम्युनिकेशन आज कुछ नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी करे तो वहां अप्लाई करने के लिए कितने युवाओं की भीड़ लगेगी? साथ ही सफल होने वाले उम्मीदवार किस गर्व से लोगों को बताएँगे कि वह देश के कारपोरेट कम्युनिकेशन की सबसे बड़ी कम्पनी में कार्य कर रहे हैं. तो जब-तक भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिली हुई है, जब तक चाहे जिस तरह से भी प्राप्त की गयी सफलता, हासिल की गयी दौलत को सम्मान की नज़र से देखे जाने की प्रथा समाज में कायम रहेगी, तब तक पकड़ में आ गए किसी एक अपराधी या खुलासे होने से बच नहीं पाए किसी एक घोटाले की ही भर्त्सना करके हम क्या कर पायेंगे? अगर आज एक कथानक की तरह कोई यह चुनौती दे कि पहला पत्थर वह मारे जिसने कोई पाप ना किया हो तो इस सवा अरब की जनसंख्या वाले देश में आप मुट्ठी भर भी ऐसे व्यक्ति तलाश पायेंगे जो ‘पत्थर फेंकने’ का हकदार हो?
लगातार खुलासे होते हर नए टेप को इस उम्मीद में सुनता हूं कि कोई एक नेता या पत्रकार तो रहा हो ऐसा, जिसने नीरा को फटकार लगाकर ऐसा कहने का साहस दिखाया हो कि वह अपनी सीमा में रहे और दुबारा कभी दलाली आदि के बारे में बात करने की हिम्मत न करे. अभी कुछ साल पहले जब सांसदों को लेकर स्टिंग किया गया था उसमें भी एकाध ऐसे नेता निकल गए थे जिन्होंने किसी भी तरह का सौदा करने से इनकार कर दिया था. लेकिन अब तो ऐसा लग रहा है कि पूरा देश ही ‘हमाम’ में तब्दील हो गया है.
यह सही है कि पूर्णतः अपराध-भ्रष्टाचार मुक्त समाज की हम कल्पना नहीं कर सकते. व्यवहारिक दृष्टि से सोचा जाय तो यह संभव भी नहीं है. लेकिन ज़रूरत इस बात का है कि अगर लोगों में अच्छे कामों के प्रति आदर की भावना नही हो तो बुरे काम के प्रति खौफ तो हो. भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति थोडा अपराध बोध तो महसूस करे. समाज में उसके सम्मान में थोड़ी कमी तो हो. कम से सरकार तो ऐसा दिखे कि वह आर्थिक अपराधियों के प्रति काफी कठोर है. बस इन सब चीज़ों के अभाव के कारण ही आज सबसे ज्यादा समाज, संविधान एवं लोकतंत्र पर खतरा महसूस हो रहा है.
आजादी के बाद से ही भले ही छोटे-मोटे आर्थिक गबन आदि की शुरुआत हो गयी रही हो. लेकिन बड़े स्तर पर सबसे पहले भ्रष्टाचार को कानूनी मान्यता तब मिली जब आज के प्रधानमंत्री एवं तब के वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ने 1998 में VDIS नामक एक योजना लागू कर, भ्रष्टाचारियों को यह विकल्प दिया कि वे 30 प्रतिशत ‘कानूनी रिश्वत’ सरकार को देकर अपनी काली कमाई को श्वेत कर सकते हैं. उस समय भले ही इस योजना को सफल करार दिया गया हो. राजकोष में भले उस एक योजना से तब 7,800 करोड का इजाफा हो गया हो, बाजार में 33,000 करोड की रकम एक़ साथ उजला होकर आने के साथ अर्थव्यवस्था को मदद मिली हो. लेकिन तेज़ी से उदारीकरण की ओर दौड़ लगाते तब के सरकार के किसी भी नियंता को एक मिनट रुक कर इस पर विचार करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि आखिर उस समय तक जिसने भी ईमानदारी से कमाई करके आयकर भी जमा किया होगा उसने आखिर क्या सोचा होगा? क्या उसको यह नही लगा होगा कि ईमानदारी से काम कर उन्होंने गलती की है? कल तक ईमानदार रहे वो लोग या उनकी नयी पीढ़ी फिर इसी तरह से बेईमान हो जाने को प्रेरित नहीं हुई होगी?
यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे आप कुछ आतंकवादियों को पुरस्कार देकर छोड़ते हैं, और बाद में वही आतंकी समूचे संसद पर ही हमला करने की औकात में आ जाते हैं. तो यह योजना भी मोटे तौर पर कल को आर्थिक आतंक का शक्ल लेने वाले भ्रष्टाचार की बुनियाद ही साबित हुआ था. भले ही इस तरह की छोटी-मोटी योजनाओं द्वारा सरकार पहले भी राजस्व इकठ्ठा करती रही हो, लेकिन इस योजना के बाद से तो मानो आर्थिक आतंक की बाढ़ सी आने लगी. उस 7800 करोड़ के बदले, देश को प्रतिभूति घोटाला से लेकर 2 G स्पेक्ट्रम घोटाले तक कितने लाख करोड़ की चपत लगी है उसका अनुमान लगाना मुश्किल है. तो सत्ता खैर स्वभावतः भ्रष्ट ही हुआ करती है, उससे ज्यादे उम्मीद पालना ही व्यर्थ है. लेकिन असली सवाल समाज में भ्रष्टाचारियों को हसरत की नज़र से देखे जाने वाले फिनोमिना का है.
सामान्यतः क़ानून द्वारा किसी चीज़ को गलत ठहराने से ज्यादा समाज के नीति-नियम कारगर होते है. अक्सर ऐसा देखा गया है कि समाज के नियम, क़ानून पर हर वक्त हावी होते हैं. जैसे दहेज लेना कानून द्वारा दंडनीय है लेकिन समाज में वह आज भी स्टेटस का पर्याय है. दो बालिग़ की मर्जी से कोई सामान्य संबंध कानूनन प्रतिबंधित नहीं, लेकिन समाज के लिए यह हिकारत का सबब होता है. तो इन उदाहरणों के आलोक में सबसे बड़ी जिम्मेदारी समाज पर है कि वह भ्रष्टाचारियों को सम्मान देना बंद करे. उसका बहिष्कार करे. कुछ ऐसी लानत-मलानत करे कि लोगों को किसी भी तरह के बड़े भ्रष्टाचार करने से पहले दस बार सोचना पड़े.
नीरा प्रकरण के खुलासे के बाद का यह समय सबसे पहले आत्ममंथन का है. हर व्यक्ति दिल पर हाथ रख कर सोचे कि क्या उसने कभी कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है? अभी सामान्य तौर पर यही माना जा सकता है कि केवल वही ईमानदार है जिसे मौका न मिला हो. अवसर मिलने पर भी ईमानदार रहने वाले तो अब बिरले ही नज़र आयेंगे. चाहे किसी मजदूर द्वारा काम के कुछ घंटे चुरा लेने की बात हो या टाटा द्वारा नमक के भाव में स्पेक्ट्रम. हमारे मानसिकता में ही भ्रष्टाचार समाया हुआ है. यह पंक्ति लिखते हुए लेखक को खुद के द्वारा किये गए कई छोटे-मोटे भ्रष्टाचार भी याद आ रहे हैं. साथ ही आप जिस बड़े पद पर बैठे व्यक्ति को भी ईमानदार शिरोमणि मान रहे हैं, हो सकता है केवल सबूत नहीं मिलने के कारण ही वह भी ईमानदार दिखते हों.
तो आज ज़रूरत इस बात की भी है कि अलग-अलग तरह के भ्रष्टाचार के लिए दंड भी उसी स्तर का हो. अभी तो इस मामले में भी उल्टी गंगा ही बहाई जा रही है. अगर बस में कोई जेबकतरा सौ रूपये काटते हुए पकड़ा गया तो वहीं उसकी जान पर बन आयेगी, लोग पिटते-पिटते अधमरा कर देंगे, लेकिन गबन के आरोप में जेल जा कर जमानत पर छूटे शहर के नेताजी के स्वागत में ढोल-नगाड़ा एक कर दिया जाएगा. इसी तरह मोहल्ले के किसी हफ्ता वसूलने वाले गुंड़े पर पुलिस की नज़र टेढ़ी हो जाय तो शहर भर में उसका जुलूस निकाल देंगे, लेकिन वही पुलिस किसी धन्ना सेठ की सुरक्षा में आपको चाक चौबंद नज़र आयेगी.
तो अब वक्त आ गया है कि समाज के सभी अंग आत्ममंथन करें. दुनिया के सबसे बड़े और सबसे कम बुरे अपने लोकतंत्र को घुन की तरह खाए जा रहे भ्रष्टाचार के निवारण हेतु या उसे न्यून करने हेतु क़ानून में सुधार की ज़रूरत, उसे और कड़ाई से लागू करने की ज़रूरत है. लेकिन उससे भी ज्यादे ज़रूरत इस बात का है कि समाज खुद इस बारे में जिम्मेदार बने. हम भारतीय मोटे तौर पर एक हिप्पोक्रेट समाज हैं. जैसा की ऊपर लिखा गया है, राडिया-राजा-रतन को पानी पी-पी कर कोसने वाले हर व्यक्ति के मन में यह तमन्ना तो ज़रूर है कि इन विसंगतियों से लड़ने हेतु कोई भगत सिंह पैदा हो. लेकिन मन में ये भी होगा कि ‘भगत सिंह’ पड़ोसी के घर पैदा हों. हम तो अपने लाल को पब्लिक रिलेशन में डिग्री-डिप्लोमा दिला उसे वैष्णवी कंम्युनिकेशन में ही नौकरी दिलाने हेतु प्रयासरत रहेंगे.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

