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भारत का राजा धृतराष्ट्र और जनता गांधारी है

फ्रेंकलिन इन दिनों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर मशहूर कॉमेडी फिल्म जाने भी दो यारों के आखिरी दृश्य याद आते हैं। जिसमें एक मंच पर महाभारत का मंचन हो रहा है। सिंहासन पर अंधा राजा धृतराष्ट्र विराजमान है। जो मंच पर हो रही अफरातफरी, बेलगाम पात्रों और हंगामें के चलते यही पुकारता रहता है- ‘ये क्या हो रहा है।’ मंच पर हो रहे तमाशे को देखने आए दर्शक बस तालियां बजाते हैं। बिल्कुल इसी तरह के दृश्य वर्तमान में देखे जा सकते है। भारतीय मंच पर 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसाइटी, कर्नाटक में करोड़ों रुपये का भू-आंवटन घोटाला, न्यायालय में भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में घोटालों की खबरों ने देशभर में उथल-पुथल मचा रखी है। कथित लोकतंत्र में अफरा-तफरी मची है लेकिन सिहांसन पर बैठा मिस्टर क्लीन मनमोहन सिंह, धृतराष्ट्र की तरह अंधा है और देश भर में मजदूरों की कमाई मनरेगा से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम तक के घोटालों का तमाशा देख रही जनता गांधारी है।

फ्रेंकलिन

फ्रेंकलिन इन दिनों भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इस देश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर मशहूर कॉमेडी फिल्म जाने भी दो यारों के आखिरी दृश्य याद आते हैं। जिसमें एक मंच पर महाभारत का मंचन हो रहा है। सिंहासन पर अंधा राजा धृतराष्ट्र विराजमान है। जो मंच पर हो रही अफरातफरी, बेलगाम पात्रों और हंगामें के चलते यही पुकारता रहता है- ‘ये क्या हो रहा है।’ मंच पर हो रहे तमाशे को देखने आए दर्शक बस तालियां बजाते हैं। बिल्कुल इसी तरह के दृश्य वर्तमान में देखे जा सकते है। भारतीय मंच पर 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ, आदर्श सोसाइटी, कर्नाटक में करोड़ों रुपये का भू-आंवटन घोटाला, न्यायालय में भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में घोटालों की खबरों ने देशभर में उथल-पुथल मचा रखी है। कथित लोकतंत्र में अफरा-तफरी मची है लेकिन सिहांसन पर बैठा मिस्टर क्लीन मनमोहन सिंह, धृतराष्ट्र की तरह अंधा है और देश भर में मजदूरों की कमाई मनरेगा से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम तक के घोटालों का तमाशा देख रही जनता गांधारी है।

देश के सिहांसन पर बैठे धृतराष्ट्र मनमोहन सिंह और जनता गांधारी को ए राजा और कलमाड़ी जैसे दुर्योधनों की कार्यप्रणाली और राज्य में मची अफरा-तफरी का अहसास तो है। लेकिन बेचारे दोनों की मजबूरी है। क्योंकि धृतराष्ट्र मनमोहन सिंह को उनके अंधेपन ने अपाहिज बना रखा है, जिससे उनके मंत्रिमंडल में शामिल अपराधियों की जमात के हाथ में राज्य की लगाम है। वे चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते। बात गांधारी जनता की तो वे अपने पुत्रमोह में फंसी है। जनता का पुत्रमोह धूमिल की ये पक्तियां है – घर से निकलना काम पर और काम से वापस घर आना। यहीं कारण है कि बड़े-बड़े घोटाले जनता को परेशान तो करते हैं लेकिन उसके मोह के आगे तमाम घोटाले पीछे छूट जाते हैं।

हालात बदतर है। देश पर भ्रष्टाचारी राज कर रहे हैं। देश को चलाने वाले लोग भ्रष्ट हैं। लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाले जनता को लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखने की सलाह दे रहे हैं। चुनावों में जनता के सामने विकल्प के तौर पर दो लोग मौजूद होते है और दोनों की भ्रष्ट प्रवृत्ति के हो तो जनता के पास उनमें से किसी एक को चुनने के सिवा तीसरा विकल्प मौजूद नहीं।

देश में चल रहे इस तमाशे को देखकर जनता दर्शकों की तरह ताली पीट रही है और भ्रष्टाचार का ये मंचन ना खत्म होने वाला नाटक बनकर रह गया है। आखिर में फिल्म जाने भी दो यारों की तरह भ्रष्टाचार का खुलासा करने वाला अंत में फांसी चढ़ जाता है।

लेखक फ्रेंकलिन निगम इंडो एशियन न्‍यूज में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.

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