औद्योगिक खेती, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाओं पर निर्भरता और शहरी विकास ने हमारे रोजमर्रा के आहार में कुदरती गुणों की भारी कमी कर दी है, इससे हर इंसान की सेहत बिगड़ रही है. मानव जीवन से खिलवाड़ करने की यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साज़िश है, जिससे बचने और उसका प्रतिकार करने की जरूरत है. सभी जानते हैं कि नैसर्गिक खान-पान और शुद्ध हवा के भारी अभाव के बीच हम जी रहे हैं. आजकल बाजार में न असली कुदरती आहार मिलता है, न सांस लेने के लिए शुद्ध हवा. हालांकि जनसंख्या वृद्धि, जंगलों का नाश, शहरों-गांवों का सीमेंटीकरण और पर्यावरणीय असंतुलन से भी नैसर्गिक गुणों में कमी आ रही है, मगर अविवेकशील ढंग से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण ही पर्यावरण के नैसर्गिक गुणों का लगातार ह्रास हो रहा है. मेरा मानना है कि इन सब के पीछे बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खतरनाक साज़िश काम कर रही है. वह सहसा किसी की समझ में नहीं आती, लेकिन सच यही है.
आजकल प्रयोगशालाओं में फलों-सब्जियों पर अनगिनत प्रयोग किए जा रहे हैं. लेबोरेटरी में फसलें उगाई जा रही हैं. उनमें नकली जीन ट्रांसफर किए जा रहे हैं. कई कंपनियों ने ‘टर्मिनेटर’ नामक जीन फूलों-फलों में डालना शुरू किया है. इसे कारण कई फलों में बीज ही निर्मित नहीं होता. जैसे कि संकरित टमाटर. अगर उसमें बीज दिख भी जाएं, तब भी उनसे ‘जीव’ (नए टमाटर के पौधे) का निर्माण नहीं होता. यानी बीजांकुरण नहीं होता. यह सब ‘टर्मिनेटर’ या इससे मिलते-जुलते जीन के कारण होता है.
कड़वा सच यही है कि अब तक जो ‘बीज’ किसान और कुदरत की संपित्त थी, वह अब कुछ मल्टीनेशनल कंपनियों की संपित्त हो गई है. इस तरह की फसलों के भीतर उनके मूल विशिष्ट गुणसूत्र ही बदल दिए गए हैं. इन्हें बदलने के कारण ही फलों व सब्जियों में उचित परिणाम नहीं मिलते. उनकी पौष्टिकता और स्वाद भी प्रभावित होता है. इसे अलावा संकरित सब्जियों से कई प्रकार के अन्य दोष निर्मित होते हैं. यहां उस खबर का जिक्र करना प्रासंगिक होगा, जब गत 9 जुलाई को लौकी का जूस पीने से दिल्ली में सीएसआईआर के एक वैज्ञानिक सुशील शर्मा की मौत हो गई थी. बाद में तथ्यों और जांच रिपोर्ट से यह बात सामने आई कि बार-बार मौसम के बदलने और घातक कीटनाशकों के उपयोग से जमीन के अधिक उर्वरक हो जाने के कारण लौकी में टेट्रासाइकिल और ट्रिटरपिनाफड नामक केमिकल के पनपने से वह जहरीली हो गई और उससे वैज्ञानिक शर्मा की मौत हो गई.
अब कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की खतरनाक साज़िश के उदाहरण देखें. ये कंपनियां जान-बूझ कर जनता की जान से खेल रही हैं, ताकि जनस्वास्थ्य बिगड़े और उनकी दवाइयां खूब बिकें. इन कंपनियों का मूल धंधा ही दवाइयां बेचना है. कीटनाशक बेचना है. आजकल नैसर्गिक खेती हो नहीं रही है. इसलिए कई सब्जियां कड़वी लगती हैं. जैसे फूलगोभी 2-3 घंटे में खराब हो जाती है. आजकल गाजर-मूली-ककड़ी जैसे सलाद के कंद व फल अधिक दिनों तक सुरक्षित नहीं रह सकते. न उनमें नैसर्गिक स्वाद रहता है.
दूसरी ओर, काफी पहले जीवनरक्षक दवाइयां बहुत सस्ती हुआ करती थीं. किसी भी दवा दुकानदार के पास जाने पर वह दो-चार रुपये में सर्दी-बुखार दूर करने की दवा दे देता था. अब वैसी ही दवाइयों के लिए 40-50 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. छोटी-छोटी बीमारियों के लिए ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, शुगर टेस्ट कराना पड़ता है. उसी प्रकार कृषि-उपयोगी एंडोसल्फान जैसा कीटनाशक जो पहले 200 रु. प्रति लीटर था, वह अब 6000 रु. प्रति लीटर बेचा जा रहा है.
मोनोक्रोटोफास और नुवान जैसे कीटनाशक भी 6000 से 7000 रु. प्रति लीटर बेचे जा रहे हैं. यह सब बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों का गोरखधंधा है. उसी तरह मानव-समाज की दवा के लिए इन कंपनियों ने प्रसार माध्यमों को अपनी कठपुतली बना कर कई प्रकार की बीमारियों का हौवा खड़ा कर रखा है. आम आदमी इससे डर जाता है. वह ‘मरता क्या न करता’ की स्थिति में आ जाता है. मल्टीनेशनल कंपनियों ने बीज (सीड) और दवा (मेडिसीन) के व्यापार को अपने कब्जे में लेकर उसे मुनाफे का धंधा बना दिया है. इसमें समाजसेवा या मानवीय संवेदनाओं को कोई स्थान नहीं है. ऐसी ही कंपनियां कृत्रिम जूस, कृत्रिम दूध आदि बनाने लगी हैं. इने अलावा जेनेटिक फलों में आजकल पानी की मात्रा च्यादा पाई जा रही है. यह सब फलों का वजन बढ़ाने यानी जनता की जेबें काटने के लिए किया जा रहा है. जरा सोचें, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी से ही पैसा बना रही हैं, वह मानव-जीवन का भला क्या खाक सोचेंगी?
लेखक प्रकाश पोहरे देशोन्नति ग्रुप के चेयरमैन, कृषि आंदोलनकारी हैं तथा कृषि पत्रकारिता करते हैं. इन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.

