अरूंधति राय एकदम सही फरमा रही हैं। चेतावनी तो यह हरगिज है लेकिन ‘राजसत्ता’ की नहीं ‘न्यायसत्ता और लोकसत्ता’ की। नारायण सान्याल-बिनायक सेन के प्रकरण में रायपुर सत्र न्यायालय का आदेश स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि ‘भारत एक अखंड संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसकी संप्रभुता से खिलवाड़ करने की कोशिश करने वाले हर शख्स की जगह सड़क के चौराहे और टेलीविजन के रुपहले पर्दे न होकर जेल की कोठरी और जरूरत पड़ने पर फांसी के तख्त भी होंगे।’ नक्सलियों को निरंतर सहयोग करते रहने के कारण राजद्रोह के अपराध में दंडित किये गए डा. बिनायक सेन के समर्थन और अदालत के फैसले के खिलाफ गाल बजा रहे तमाम तथाकथित बुद्धिजीवियों के रवैये से अचंभित और विचलित होने की जरूरत नहीं है। हिंदुस्तान का तो आदिकाल से ही दुर्भाग्य रहा है कि हर ‘पृथ्वीराज चौहान’ के दौर में ‘जयचंद’ जैसे गद्दारों की मौजूदगी पायी गई है।
यह मौजूदगी राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य दोनों पर ही कालिख पोतती भी आई है। लेकिन, अब यह दुर्भाग्य इस कदर विराट स्वरूप ले चुका है कि देश में ‘पृथ्वीराज’ तो अब ढूंढे नहीं मिलते लेकिन चर्चित होने की खातिर और विलायती पुरस्कारों के लोभ में ‘जयचंदों’ की भीड़ जरूर चहुं और पसरी दिखाई देती है। अरुंधति राय से लेकर अग्निवेश तक तमाम महारथी पृथ्वीराज का मुखौटा धारण कर जयचंद की भूमिका अभिनीत करने में प्रणप्राण से जुटे हैं।
बिनायक सेन पर जिस किस्म के आरोप हैं और उनके समर्थन में जो प्रमाण हैं, उनका प्रतिफल जेल की काल कोठरी ही हो सकती है न कि राजभवन के शयनकक्ष। बारह लाख के इनामी दुर्दांत नक्सली नारायण सान्याल को राजधानी में मकान दिलाने से लेकर कुख्यात नक्सली शंकर और अनीता को उनके षड़यंत्रों में मदद पहुंचाने में प्रण-प्राण से जुटे रहे डा. सेन को उनकी इन करतूतों के लिए विदेशों में मौजूद भारत विरोधी ताकतें चाहे जितने ‘सम्मानों’ से नवाजें, लेकिन इस देश का कानून उन्हें चंद ‘जिंदाबाद-मुर्दाबाद’ के नारों और ‘धरना-प्रदर्शनों’ के भय से रिहा करने का हुक्म नहीं दे सकता। यदि धरना-प्रदर्शन के आधार पर अदालते फैसला देने लग जाए तो देश में कभी राजनेता को कोई सजा होगी नहीं।
बयानवे पृष्ठ के फैसले में वो तमाम कारण और सबूत विस्तार से उल्लेखित है जो डा. बिनायक सेन को अपराधी ठहराते हैं। लेकिन, ये तमाम बुद्धिजीवी उन तथ्यों को दरकिनार कर केवल अपनी मान्यताओं को जनसमर्थन दिलाने में जुटे हैं। उन्हें अदालत के फैसले के पृष्ठ क्रमांक 45 से 67 तक बिनायक सेन के कारनामों पर भी गौर करना चाहिए।
विनायक ने बिलासपुर जेल में बंद नारायण सन्याल को अपना भाई बताकर मुलाकातें की हैं। यह सिलसिला रायपुर जेल में भी दर्जनभर मुलाकातों के दौरान चलता रहा। कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे बुद्धिजीवियों को यह पता होना चाहिए कि नारायण सन्याल, हार्डकोर नक्सली अनिता श्रीवास्तव, शंकर सिंह जैसे दुर्दांत नक्सलियों को रायपुर में मकान दिलाने से लेकर नौकरी लगवाने और बैंकों में खाते खुलवाने की व्यवस्था सेन दंपत्ति ने की थी। जिस रूपांतर संस्था के बिनायक सेन प्रोजेक्ट अधिकारी रहे हैं, उसका एक कर्मचारी शंकर सिंह हार्डकोर नक्सली निकला और गिरफ्तारियों की खबर मिलते ही फरार हो गया। आखिर सेन दंपत्ति की मेहरबानी नक्सलियों पर क्यों थी। और क्या कथित बुद्धिजीवी इसी मेहरबानी को कालजयी मानवाधिकार सेवा करार देने पर तुले हैं।
बिनायक सेन को निरीह और निरपराध बताने में जुटे तमाम पैरोकार यह तो बतायें कि इस आदेश के खिलाफ नक्सलियों को एक हफ्ते के ‘बस्तर बंद’ का आव्हान करने की जरूरत भला क्यों आन पड़ी। उनका यह कदम भी तो डा. बिनायक के संदर्भ में अदालत के फैसले को जायज ही ठहराता है। जानने की जरूरत तो यह है कि पुलिस ने भला किस कारण से ऐमिला सेन के खिलाफ अपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध अभी तक नहीं किया, जबकि अदालती जिरह के दौरान यह तथ्य स्पष्ट हुआ है कि नक्सली अनीता का बैंक खाता खुलवाने और उसे विद्यालय में नौकरी दिलाने में एमिला सेन की सक्रिय भूमिका थी। उनके प्रति सदाशयता बरते जाने की क्या जरूरत आन पड़ी है?
अफसोसनाक है अरुंधति राय, स्वामी अग्निवेश और अमर्त्य सेन जैसे ख्यात शख्सियतों का यह रवैया, जिन्हें नक्सलियों के खिलाफ पुलिस की बंदूक से निकलने वाली हर गोली मानवाधिकारों की हत्यारी जान पड़ती है, लेकिन इन्हीं नक्सलियों के द्वारा राहत शिविरों में रह रहे आदिवासियों का ‘सामूहिक नरसंहार’ निंदा योग्य भी जान नहीं पड़ता। देश की राष्ट्रीय पत्रिका में अपने बीस पृष्ठीय आलेख में नक्सली करतूतों को भावुकता से दुलारती व खाकी वर्दी को गरियाती अरुंधति राय और असंख्य हत्याओं के आरोपी नक्सली कमांडर आजाद की मौत का अर्से से मातम मना रहे स्वामी अग्निवेश को हमारे जांबांज पुलिस अधिकारी वीके चौबे और उनके साथ शहीद अठ्ठाइस जवानों के परिवारों की पीड़ा का अनुभव क्यों नहीं होता?
तकलीफ तब और अधिक बढ़ जाती है जब इस कांव-कांव में सुर मिलाने के लिए दिग्विजय सिंह जैसे मंझे हुए राजनेता भी शामिल दिखाई देते हैं। ‘हिंदू आंतकवाद’ से आशंकित दिग्विजय न्यायिक प्रक्रिया को भूल फैसले की समीक्षा किये जाने की बात कह उठते हैं। आखिर इस देश के संविधान में सत्र न्यायालय के ऊपर उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था दी हुई है। जिनको भी यह महसूस हो रहा है कि फैसला न्यायपूर्ण नहीं है, वह बेहतर हो कि सड़कों पर हंगामा करना बंद कर ढंग का वकील ढूंढ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटायें। वैसे राम जेठमलानी तो खुली पेशकश दे ही चुके हैं। जब इंदिरा गांधी के हत्यारों की पैरवी करने से उन्हें गुरेज न रहा तो बिनायक सेन की पैरवी की उनकी पेशकश पर टिप्पणी कर हम अपनी स्याही क्यों खराब करें। हां, जिन्हें हमारे द्वारा तथाकथित बुद्धिजीवियों को ‘जयचंद’ करार दिये जाने पर आपत्ति हो, उनसे सिर्फ एक सवाल कि, ‘नक्सलियों के समर्थक बिनायक सेन की रिहाई के लिए इतना बवाल उठाने वाले, देश की संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद भी अब तक बिरियानी खिलाये जाने पर मुंह क्यों नहीं खोलते?’
लेखक डा. हिमांशु द्विवेदी पत्रकार हैं. उनका यह लेख हरिभूमि में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया जा रहा है.

