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मीडिया मंथन

भारत के गांवों से कितनी करीब मीडिया!

संजय कुमारसंचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टीवी, खबरिया चैनल, अंतरजाल और मोबाइल सहित आये दिन विकसित हो रहे अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह से कोसों दूर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बात साफ है, बढ़ते प्रतिस्पर्धा के दौर में मीडिया का दायरा व्यापक हुआ है। राष्ट्रीय अखबार राज्यस्तरीय और फिर जिलास्तरीय प्रकाशन पर उतर आये हैं। कुछ ऐसा ही हाल, राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनलों का भी है। चैनल भी राष्ट्रीय से राजकीय और फिर क्षेत्रीय स्तर पर आकर अपना परचम लहरा रहे हैं। मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी ज्यादा-से-ज्यादा ग्राहकों/श्रोताओं तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। यकीनन आज बाजार, मीडिया पर हावी हो चुका है। अखबार और टीवी आपसी प्रतिस्पर्धा में आ गये हैं। मीडिया का स्वरूप आज बदल चुका है। राष्ट्रीय अवधारणा में तबदीली हो चुकी है। एक अखबार राष्ट्रीय राजधानी फिर राज्य की राजधानी और फिर जिलों से प्रकाशित हो रही है। इसके पीछे भले ही शुरुआती दौर में, समाचारों को जल्द से जल्द पाठकों तक ले जाने का मुद्दा रहा हो। लेकिन आज खबर पर, बाजार का मुद्दा हावी है।

संजय कुमार

संजय कुमारसंचार क्रांति के दौर में मीडिया ने भी लंबी छलांग लगायी है। मीडिया के माध्यमों में रेडियो, अखबार, टीवी, खबरिया चैनल, अंतरजाल और मोबाइल सहित आये दिन विकसित हो रहे अन्य संचार तंत्र समाचारों को क्षण भर में एक जगह से कोसों दूर बैठे लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। बात साफ है, बढ़ते प्रतिस्पर्धा के दौर में मीडिया का दायरा व्यापक हुआ है। राष्ट्रीय अखबार राज्यस्तरीय और फिर जिलास्तरीय प्रकाशन पर उतर आये हैं। कुछ ऐसा ही हाल, राष्ट्रीय स्तर के टीवी चैनलों का भी है। चैनल भी राष्ट्रीय से राजकीय और फिर क्षेत्रीय स्तर पर आकर अपना परचम लहरा रहे हैं। मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी ज्यादा-से-ज्यादा ग्राहकों/श्रोताओं तक अपनी पहुंच बनाना चाहते हैं। यकीनन आज बाजार, मीडिया पर हावी हो चुका है। अखबार और टीवी आपसी प्रतिस्पर्धा में आ गये हैं। मीडिया का स्वरूप आज बदल चुका है। राष्ट्रीय अवधारणा में तबदीली हो चुकी है। एक अखबार राष्ट्रीय राजधानी फिर राज्य की राजधानी और फिर जिलों से प्रकाशित हो रही है। इसके पीछे भले ही शुरुआती दौर में, समाचारों को जल्द से जल्द पाठकों तक ले जाने का मुद्दा रहा हो। लेकिन आज खबर पर, बाजार का मुद्दा हावी है।

हर बड़ा अखबार समूह इसे देखते हुए अपने प्रकाशन के दायरे को बढ़ाने में लगा है। और आये दिन बड़े पत्र समूह छोटे-छोटे जिलों से समाचार पत्रों के प्रकाशन की घोषणा करते आ रहे हैं। एक अखबार दस राज्यों से भी ज्यादा स्‍थानों से प्रकाशित हो रहा है और उस राज्य के कई जिलों से भी प्रकाशन किया जा रहा है। साथ में दर्जनों संस्करण निकाले जा रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्‍कर, दैनिक आज, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर जैसे कई समाचार पत्र हैं, जो कई राज्यों की राजधानी के अलावा राज्य के कई जिलों से कई संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। राष्ट्रीय अखबार क्षेत्रीय में तब्दील हो चुके हैं। जो नहीं हुए है वे भी प्रयास कर रहे हैं। पूरे मामलों में देखा जा रहा है कि एक ओर कुछ अखबार समूहों ने अपने प्रसार/प्रकाशन को बढ़ाया है तो वहीं कुछ समाचार पत्रों का दायरा सिमटा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत की ज्यादा आबादी गांव में रहती है, फिर भी एक भी बड़ा अखबार समूह ग्रामीण क्षेत्रों को केन्द्र में रखकर प्रकाशन नहीं करता है।

ग्रामीण क्षेत्र आज भी प्रिंट मीडिया से अछूते हैं। देश के कई गांवों में समाचार पत्र नहीं पहुंच पा रहे हैं। अंतिम कतार में खड़े व्यक्ति तक केवल आकाशवाणी की पहुंच बनी हुई है। भले ही प्रिंट मीडिया ने काफी तरक्की कर ली हो। संस्करण पर संस्करण प्रकाशित हो रहा हो। लेकिन, ये अखबार ग्रामीण जनता से कोसों दूर हैं। जो एक बड़ा सवाल है। देखा जाये तो जिले स्तर पर अखबरों के प्रकाशन के पीछे शहरी तबके को ही केन्द्र में रख कर प्रकाशन किया जा रहा है। अखबार की बिक्री ब्लॉक तक होती है। गांवों में अखबारों की पहुंच हो इस दिशा में शायद ही किसी मीडिया हाउस ने सार्थक प्रयास किया हो। सच तो यह है कि किसी एक गांव में समाचार पत्रों की प्रतियां 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाती है। बिहार को ही ले, यहां 8463 पंचायत हैं और इस पंचायत के तहत लाखों गांव आते हैं। फिर भी अखबारों की पहुंच सभी पंचायतों तक नहीं है। नवादा जिले में 187 पंचायत है। ब्लॉक की संख्या 14 है और गांव की संख्या 1099 है। इनमें मात्र 200 गांवों में अखबार पहुंचने की बात कही जाती है। अखबारों का सर्कुलेशन प्रति गांव कम से कम 10 और ज्यादा से ज्यादा 30 है।

इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार के एक जिले के हजारों गांवों में मात्र 20 प्रतिशत से भी कम गांव प्रिंट मीडिया के दायरे में हैं। समाचार पत्र समूह शहरों को केंद्र में रख कर खबरों का प्रकाशन करते हैं। क्योंकि, शहर एक बहुत बड़ा बाजार है और समाचार पत्रों में बाजार को देखते हुए शहर एवं ब्लॉक की खबरों को ही तरजीह दी जाती है। ब्लॉक स्तर पर अखबारों के लिए समाचार प्रेषित करने वाले पत्रकारों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र में बाजार का आभाव है। यानी ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सामने आती है। किसान फटे हाल हो और अनपढ़ हो तो, ऐसे में अखबार भला वह क्यों खरीदे? हालांकि यह पूरी तरह से स्वीकार्य नहीं है क्योंकि अब गांवों में पढ़े-लिखों की संख्या बढ़ी है। प्राथमिक विद्यालय सक्रिय हैं या फिर नौकरी पेशे से जुड़े लोग जब गांव जाते हैं तो उन्हें अखबार की तलब होती है। ऐसे में वे पास के ब्लॉक में आने वाले समाचार पत्र को मंगवाते हैं। कई सेवानिवृत्त लोग या फिर सामाजिक कार्यकत्ता चाहते हैं कि उनके गांव में समाचार पत्र आये। हालांकि इनकी संख्या काफी कम होती है फिर भी ऐसे कई गांव हैं जहां लोग अपनी पहल पर अखबार मंगवाते हैं।

गांव से अछूते अखबारों के पीछे देखा जाये तो समाचार पत्र समूहों का रवैया भी एक कारण है। शहरों से छपने वाले समाचार पत्रों को गांव की खबरों से कोई लेना-देना नहीं रहता। अखबारों में गांव की खबरें नहीं के बराबर छपती है। जो भी खबर छपती है वह ब्लॉक में पदस्थापित प्रतिनिधियों से मिलती हैं, वह भी ज्यदातर सरकारी मामलों पर केन्द्रित रहती हैं। ब्लॉक का प्रतिनिधि ब्लॉक की खबरों को ही देने में दिलचस्पी रखता है ताकि ब्लॉक लेवल में अखबार बिक सके। गांव की एकाध खबरें ही समाचार पत्रों को नसीब हो पाता है। जब तक कोई बड़ी घटना न घट जाए तब तक गांव की खबर अखबार की सुर्खियां नहीं बन पाती। गांव पूरी तरह से मीडिया के लिए उपेक्षित है। जबकि गांव में जन समस्या के साथ-साथ किसानों की बहुत सारी समस्याएं बनी रहती है।

बिहार के पूर्णिया जिले के बनमंखी प्रखड के मसूरियामुसहरी गांव के प्रथमिक स्कूल में डेढ़ साल में कभी कभार शिक्षक पढ़ाने आते थे। लेकिन, आकाशवाणी पर 9 दिसंबर 2010 इस संबंध में खबर आयी। खबर के आने के बाद प्रशासन हरकत में आयी और दूसरे दिन से स्कूल में शिक्षक आने लगे। बात साफ है मीडिया की नजर गांव पर पड़ेगी तो गांव खबर में आयेगा और वहाँ की जनसमस्याओं पर प्रशासन सक्रिय हो पायेगा। हालांकि कभी कभार मीडिया में गांव की खबरें आती है लेकिन वह कई दिनों के बाद। असके पीछे कारण यह है कि मीडिया से जुड़े लोग शहर और कस्बा, ब्लॉक तक ही सीमित हैं। अखबार वाले अपने प्रतिनिधियों को गांव में नहीं रखते। इसके पीछे आर्थिक कारण नहीं है क्योंकि ज्यादातर अखबारों के ब्लॉक प्रतिनिधि बिना किसी मेहनाता के रखे जाते हैं। अगर वे विज्ञापन लाते हैं तो उन्हें उसका कमीशन भर दिया जाता है।

ग्रामीण भारत के नजरिए से देखा जाए तो कई गांवों में टीवी सेट नहीं हैं। उसके पीछे बिजली का नहीं होना सबसे बड़ा कारण है। हालांकि ब्लॉक के करीब के गांवों में टीवी सेट ही नहीं केबल टीवी आ चुका है या फिर बैटरी पर ग्रामीण टीवी का मजा लेते हैं। जहां तक बिहार के गांवों का सवाल है, प्रत्येक घर में टीवी सेट उपलब्ध नहीं है। कमोबेश देश के अन्य राज्यों के गांवों में भी यही स्थिति बनी हुई है। बडा ही र्दुभाग्य की बात है कि संचार क्रांति के दौर में गांवों में शहरों की तरह समाचार-पत्र/टीवी सेट तो नहीं पहुंच है। लेकिन मोबाइल फोन ने ग्रामीण क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया है। गांव का मुखिया हो या मनरेगा में काम करने वाला मजदूर आज मोबाइल के दायरे में आ चुका है। एनआरएस-2002 के आंकडों से पता चलता है कि बिहार के गांवों में 18 घरों में से केवल एक घर में टीवी सेट था। पंजाब में पांच से तीन था। वहीं उत्तर प्रदेश के गांवों में 80 प्रतिशत घरों में टीवी नहीं था।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जो मीडिया सिर्फ देश की राजधानी तक ही सीमित हुआ करता था आज वह राजपथ से होते हुए कस्बा और गांव तक पहुंच चुका है। थोड़ी देर के लिए प्रिंट मीडिया को दरकिनार कर दें तो पाएंगे कि रेडियो पत्रकारिता की पहुंच गांवों में ज्यादा है। प्रयास प्रिन्ट मीडिया का भी होना चाहिए इस दिशा में आगे आने की जरूरत है।

लेखक संजय कुमार बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद के ‘नवोदित साहित्‍य सम्‍मान’ से सम्‍मानित हैं तथा कई पुस्‍तकों का लेखन कर चुके हैं. पिछले बीस वर्षों से पत्रारिता के क्षेत्र में सक्रिय संजय कुमार वर्तमान में आकाशवाणी पटना में समाचार संपादक हैं.

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