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पत्‍थर वही मारे जिसने पाप ना किया हो

चैतन्‍यनया साल आ गया, हर छोटे बड़े अखबारों के संपादकीय कॉलम में बड़ी बड़ी बातें कहीं गईं भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण, असमानता  के खिलाफ संकल्प लेने का कड़वा डोज देश के नेताओं, अफसरों और इन कामों में लिप्त लोगों को पिलाया गया. ये आशा भी व्यक्त की गई कि 2011 का नया साल एक नई सोच और एक नये समाज के निर्माण की सौगात लेकर जहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा. ठीक है आपके हाथों में अखबार है तो आप सबको उपदेश की घुट्टी पिला सकते हैं. आप संपादक हो अखबार के मालिक हो जो चाहे लिख सकते हो. अपने अखबार के पन्ने में कोई रोकने टोकने वाला नहीं है पर क्या आपको कोई संकल्प नहीं लेना चाहिये इस नये साल में? क्या आप सचमुच दूध के धुले हैं? क्या आपके दामन पर कोइ दाग नहीं हैं? सोचना होगा, अपनी अंतरात्मा को टटोलना होगा और तब पता लगेगा कि आप भी उसी गंदगी में सराबोर हैं, जिससे बाहर निकलने का उपदेश देकर आप अपने आप को तीस मार खां समझ रहे हैं. किसी को उपदेश देने के पहले अपने गिरेबां में झांक लेना चाहिये कि हम कहां हैं? दूसरे पर पत्थर उछालने के पहले हमें यह भी सोच लेना चाहिये कि हमारे घर भी शीशे के ही बने हुये हैं.

चैतन्‍यनया साल आ गया, हर छोटे बड़े अखबारों के संपादकीय कॉलम में बड़ी बड़ी बातें कहीं गईं भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण, असमानता  के खिलाफ संकल्प लेने का कड़वा डोज देश के नेताओं, अफसरों और इन कामों में लिप्त लोगों को पिलाया गया. ये आशा भी व्यक्त की गई कि 2011 का नया साल एक नई सोच और एक नये समाज के निर्माण की सौगात लेकर जहां सब कुछ अच्छा ही अच्छा होगा. ठीक है आपके हाथों में अखबार है तो आप सबको उपदेश की घुट्टी पिला सकते हैं. आप संपादक हो अखबार के मालिक हो जो चाहे लिख सकते हो. अपने अखबार के पन्ने में कोई रोकने टोकने वाला नहीं है पर क्या आपको कोई संकल्प नहीं लेना चाहिये इस नये साल में? क्या आप सचमुच दूध के धुले हैं? क्या आपके दामन पर कोइ दाग नहीं हैं? सोचना होगा, अपनी अंतरात्मा को टटोलना होगा और तब पता लगेगा कि आप भी उसी गंदगी में सराबोर हैं, जिससे बाहर निकलने का उपदेश देकर आप अपने आप को तीस मार खां समझ रहे हैं. किसी को उपदेश देने के पहले अपने गिरेबां में झांक लेना चाहिये कि हम कहां हैं? दूसरे पर पत्थर उछालने के पहले हमें यह भी सोच लेना चाहिये कि हमारे घर भी शीशे के ही बने हुये हैं.

सारे समाज को उपदेश देकर उनसे नये संकल्प लेने की कसम लेने वाले अखबारो को भी बहुत से संकल्प लेने जरूरी हैं. सबसे पहले तो अखबारों के मालिक संकल्प लें कि वे ‘‘पेड न्यूज’’ के लिये अपने संपादकों, अपने पत्रकारों को मजबूर नहीं करेंगे. वे ये भी संकल्प लें कि अपने अखबार की आड़ में वे सरकारों से, नेताओं से, अफसरों से बेजा लाभ नहीं लेंगे. वे ये भी संकल्प लें कि वे ‘‘प्याज के छिलको’’ की तरह संपादकों को नहीं बदलेंगे. उन्हें ये संकल्प लेना चाहिये कि वे अपने संस्थान में काम करने वाले पत्रकारों-कर्मचारियों का शोषण नहीं करेंगे, उन्हें वेतन आयोग के हिसाब से वेतन देंगे. अन्य सुविधायें प्रदान करेंगे. वे ये संकल्प भी लें कि वे जब मरजी चाहे किसी को काम से नहीं  निकालेंगे उन्हें ये भी संकल्प लेना होगा कि वे अखबार के नाम पर सरकार से सस्ती जमीन लेकर उसमें काम्पलेक्स या अन्य कोई व्यवसायिक गतिविधि शुरू नहीं करेंगे. वे विज्ञापन के लिये किसी पर बेवजह दबाब नहीं डालेंगे.

अब संपादकों के लिये संकल्प की बात है. हर अखबार के संपादक को यह संकल्प लेना होगा कि वे अपने मालिक की हर उल्टी-सीधी बात को सर नीचे और हाथ ऊपर कर समर्थन नहीं करेंगे. वे यह संकल्प भी लें कि वे ‘‘पेड न्यूज’’ के सहभागी नहीं बनेंगे और यदि उन पर इसके लिये दबाब भी डाला जाये तो वे अपने पद की परवाह न करते हुये इसका जमकर विरोध करेंगे. संपादको को इस बात का भी संकल्प लेना होगा कि वे मालिकों के दलाल बतौर काम न कर एक संपादक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभायेंगे. उन्हे यह संकल्प लेना  होगा कि वे अपने मालिक को इस बात के लिये प्रेरित करें कि वे पत्रकारिता के मापदंडो का पूरी ईमानदारी के साथ पालन करें. वे इस बात को भी संकल्प लें कि पद और नौकरी की लालसा में अपने आप को मालिक के तलवे चाटने वाला नौकर न बनने दें. वे अपनी और अपने पद की गरिमा को ख्याल रखें. उन्हे यह संकल्प लेना होगा कि वे राजनीति और व्यवसायिक घरों के बीच बतौर दलाल अपने आप को पेश न करें.

पत्रकारों के लिये भी नये साल में कई संकल्प हैं. पहला संकल्प तो उन्हें ये लेना होगा कि वे यदि सचमुच पत्रकारिता करने इस क्षेत्र में आये हैं तो केवल पत्रकारिता ही करें. उन्हें संकल्प लेना होगा कि वे खबर लिखने का काम छोड़कर विज्ञापन बटोरने के काम में नहीं लगेंगे. उन्हें यह संकल्प भी लेना होगा कि वे खबरों को सतही तौर पर न देखकर उसकी गहराई तक जाकर उसकी पूरी खोजबीन कर उसे प्रकाशित करेंगे. पत्रकारों को यह संकल्प भी लेना होगा कि होगा कि वे अफसरों की ‘‘लल्लो-चप्पो’’ की आदत छोड़कर सच को सामने रखेंगे.

इलेक्ट्रानिक मीडिया को तो कई संकल्प लेना इसलिये जरूरी है क्योंकि ये मीडिया पिछले कुछ समय से अपनी पूरी मर्यादा भूलता जा रहा है. दृश्य मीडिया को सबसे पहला संकल्प ये लेना होगा कि वह टीआरपी के चक्कर में वो सब कुछ न दिखाये जिससे समाज में अंधविश्वास और धर्मान्धता बढ़े. मीडिया को यह संकल्प भी लेना होगा कि वह किसी भी घटना में खुद ही वकील खुद ही जज न बने. उसे यह भी संकल्प लेना होगा कि वह ब्रेक्रिंग न्यूज के नाम पर कुछ भी उलूल-जुलूल अपने दर्शकों को न परोसें. इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को सबसे बड़ा संकल्प तो यह लेना होगा कि वह खबरों का चयन करे कि कौन सी खबर दिखाई जाने लायक है और कौन सी नहीं. उसे यह संकल्प लेना होगा कि वह किसी एक खबर को दिन दिन भी नहीं घसीटेगा.

यदि ये तमाम संकल्प इस देश का प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया ले सके तो उसे इस बात की इजाजत दी जा सकती है कि वह दूसरों को संकल्प लेने के उपदेश दे, क्योंकि किसी पापी को पत्थर मारने का हक उसी को होता है जिसने कभी पाप न किया हो.

लेखक चैतन्य भट्ट जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे कई अखबारों में संपादक रहे हैं.

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