: नए साल में नई उम्मीद : पूरा साल जहाँ अच्छा करने की कोशिशों के बीच चला गया, वहीं एक व्यक्ति ऐसा भी रहा जिसका पूरा साल जेल के सलाखों के पीछे काली कोठरी में वक्त के घूमते हुए पहिये की गति को समझ पाने में ही गुजर गया। उसको निकालने के लिए छोटे से लेकर बड़े सभी ने प्रयास किया परन्तु थोड़ी बहुत कमी हर बार रह गई। अब उन्हीं सब लोगों की दुआओं से अब नए वर्ष के 12 तारीख को उसके बाहर की जादुई दुनिया में आने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है। यहां मैं सिर्फ अपने स्वयं के अनुभव को लिख रहा हूँ, इस साल पूरी दुनिया के बदलाव के लिए जाना जाएगा। एक तरफ जहां पूरी दुनिया में असांजे की धूम रही वहीं भारत देश में यशवंत का यश और भी फैला। यहां आरुषि केस में सीबीआई को हाथ उठाते देख बुरा लगा तो यशवंत की माताजी के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने जो किया वह निंदनीय और अस्वीकार्य था। सेन को उम्रकैद से लेकर ए. राजा और नेताओं के घोटाले चर्चित रहे, वहीं जम्मू-कश्मीर पर अपने बयानों को लेकर अरुंधति और आज़म विवादों में रहें।
कई घोटालों के लिए यह साल चर्चित रहेगा वहीं असांज़े के खुलासों से अमेरिका एकबार फिर से नए पैतरे बदलने में लग जाएगा, बुखारी द्वारा पत्रकार को थप्पड़ मारने से लेकर उमर अब्दुल्ला और चिदम्बरम के जूते खाने तक के लिए भी चर्चित इस साल में चर्चा के लिए और भी बहुत बाते हैं।
अब अपनी मूल समस्या पर.
घनी अंधेरी छत के नीचे वो दिया जलाए बैठा रहा,
वक्त गुजरता रहा वो टकटकी लगाये बैठा रहा,
सलाखों के साये के पीछे कब पूरा साल चला गया,
नए वर्ष में लाखों उम्मीदें सजाये बैठा रहा.
साल की उम्मीद- मेरे निर्दोष भाई के कैदी जीवन से बाहर आकर जीवन के नए सकारात्मक शुरुआत की।
आशा- सब कुछ अच्छा हो। हमारा बी4एम हमेशा की तरह आगे बढ़े। हमारी वेबसाईट दुनिया की नंबर एक साईट बने।
सकारात्मकता- मेहनत के बल पर सच्चाई और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता को सकारात्मक खोज में लगाने का अपने स्तर पर प्रयास।
निराशा- भाई के पूरे वर्ष जेल से छुड़ाने की लाख कोशिशों के बावजूद न छुड़ा पाने की। यह पूरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार रही।
अवसाद- जब कोई साथ न हो ..अपने सामने यशवंत को भी बेबस होते देखना। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी निराशा रहेगी…जब उन्होंने कहा..मैं न तो अब किसी की मदद कर सकता हूँ और न ही किसी से मांग सकता हूँ. उस वक्त कितना बेबस था ..कितनी गहरी निराशा थी …मेरा मनोभाव क्या था उसे मैं कतई नहीं याद रखना चाहता।
अकेलापन- अकेलापन मेरा सबसे बड़ा साथी रहा है..6 सदस्यीय परिवार के 4 टुकड़ों में बंटे होने के बावजूद उसे एक करने की कोशिश ..कब मैं खुद ही अकेला पड़ गया यह मुझे भी न पता चला ..बस बाहर की दुनिया ने मुझे सहारा दिया।
तनाव- जो मेरे लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। जिन्होंने मेरे भाई को कैदी जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए अपने स्तर पर कोशिशें की। इतना होने के बावजूद मेरी तरफ से जो कमी रह गई उसकी वजह से 2010 का इतना बुरा चले जाना ..भाई को बाहर न निकाल पाने की शर्मिंदगी की वजह से यशवंत जी तक के सामने न जा पाना सबसे बड़े तनाव का कारण है। आजतक उबर नहीं पाया, 2 महीने हो गए, मुंह दिखाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, अब जबकि लिखकर भेज दिया हूँ ..उम्मीद है मेरी मनोदशा समझेंगे।
नाउम्मीदी- नाउम्मीदी के लिए अब जगह ही नहीं बचती …हां एक ही नाउम्मीदी है क़ि आने वाले पूरे साल असफलता का मुंह न देखना पड़े.
एक सच्चाई-
जिनकी याद खुशी के लम्हों में आये, समझो तुम उसे प्यार करते हो।
और जो गम में आपके साथ हो समझो क़ि वो तुम्हें प्यार करते हैं ।।
अब इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद उम्मीद है नए साल में सबका सामना कर पाऊंगा।
मेरे लिए यशवंत सर द्वारा लगाया गया पोस्ट – एक पत्रकार साथी को मदद की दरकार
कहानी है छोटी, एक युवक नन्हा पत्रकार…
लेखक श्रवण कुमार शुक्ला युवा पत्रकार हैं.

