आरक्षण एक ऐसा लड्डू है जिसे खाने वाला भी और न खाने वाला भी परेशान है। कारण जाहिर है आरक्षण से जिसने फायदा उठाया, वह मालामाल और जो नहीं उठा पाया वह फटे हाल है। आरक्षण जिसे मिला वह इसमें डूबना चाहता है और जो इसकी वजह से डूब रहा है वह इसकी मोह-माया तोड़ बाहर आना चाहता है। आरक्षण का जादू दो तरह से समाज में व्याप्त है। एक पक्ष वह जो इसे बंद करवाना चाहता है और दूसरा इसे और लागू करवाने के लिए नारे लगावाये जा रहा है। चारों तरफ आरक्षण की धूम है, शोर है तथा आंदोलनों की भरमार है। आरक्षण की ये दो चाबियाँ है। जिसके जो हाथ लगी वह मालामाल है और सत्ता बदलने में पूरी तरह से सक्षम है। ये हम नहीं कह रहे ये तो समय की धारा ही स्वयं बयां कर रही है। ओबीसी के लिए 1990 में, स्वर्गीय वीपी सिंह की केन्द्र में सरकार थी, मंडल आयोग की रिपोर्ट पटल पर रख वह सरकार ऐसी गई कि आज तक कहीं दिखाई नहीं दी, यदि यूं कह दे तो कोई बुरा नहीं है कि इस झटके से दल ही पूरी तरह से टूट गया जो आजतक एक नहीं हुआ है।
जब केंद्र में बीजेपी की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। उस समय आरक्षण बंद करने के लिए उच्च वर्ग के लोगों ने खूब नारे लगाए और धरना-प्रदर्शन किया और साथ ही मेडिकल और इंजीनियरिंग के छात्रों ने खूब रैलियाँ निकाली और इन रैलियों की तरह वाजपेयी सरकार भी आरक्षण की भेंट चढ़ गई थी। इन सभी से किसको फायदा हुआ ये तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर पता है कि इससे सियासत बीजेपी के हाथों से फिसल कांग्रेस के हाथों में फिर से आ गई। इसके बाद आरक्षण नाम का “जिन्न” छिटपुट रूप में बाहर आता गया लेकिन सियासत की आग को भड़का नहीं सका। लेकिन 2008 में यह “जिन्न” अपना चेहरा बदलकर सामने आया। इस बार यह यह आरक्षण में और आरक्षण की माँग को लेकर आया। इसे बाहर का रास्ता इस बार निकाला “गुर्जर” समुदाय के कर्मठ, जुझारू, क्रांतिकारियों ने और इसको बाहर निकालने की यज्ञ स्थली राजस्थान के बयाना जिले को रखा गया। इस आन्दोलन ने सरकारी खजाने को खूब फूंका कि आज तक उसके निशान कहीं-कहीं दिखाई दे देते हैं। इस बार “जिन्न” चेहरा तो बदलकर आया ही साथ ही वहाँ पर सत्तारूढ़ बीजेपी की सरकार को बदल गया और उसकी जगह सियासत की चाबी कांग्रेस के हाथों में थमा गया। अब ये चाबी फिर से घूमती दिखाई दे रही है अब इसका परिणाम क्या होगा यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन इस बार चाबी फिर बैसला जी के हाथों में है, अब वे क्या करेगें ये तो वे स्वयं ही जानें।
आरक्षण के खेल में किसको क्या मिला है यह कहना तो कठिन है, लेकिन इससे कौन कितना खोता है। यह जरूर सबको पता चल ही गया है। इस बार यह “जिन्न” क्या गुल खिलाता है अभी देखना बाकी है। लेकिन लोग आरक्षण समाज के नाम पर क्यों माँगते है, वास्तव में इसके लायक लोग इसका फायदा उठा पाते है? अब आप स्वयं ही देख लीजिए “गुर्जर” समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग में आता है और इसे 27 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है और यह लोग अनुसूचित जनजाति में जाना चाहते हैं। जबकि अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत मिला हुआ है। अब ये लोग इतने कम में क्यों जाना चाहते है। जबकि वे लोग 100 में से 27 जगह प्राप्त कर सकते हैं तो फिर क्यों 100 में से 7.5 जगह ही हासिल करना चाहते हैं। इससे तो लगता है कि इससे भोली-भाली जनता को गुमराह किया जा रहा है। ये तो मात्र सत्ता में आने का बहाना ही रह गया है। जनता को आरक्षण नाम के “जिन्न” की भूलभुलैया में ही घूमाया जा रहा है। ये भूलभुलैया कब तक चलेगा और पता नहीं कितनी मांताएं अपने बेटे खोती रहेंगी। अब देखना है इक्कीसवीं सदी में लोग कितना जागरूक है। आरक्षण को या तो गरीबी दूर करने की चाबी बनायेंगे या सियासत बदलने की चाबी रहने देंगे।
लेखक दिनेश कुमार रजक विभिन्न विषयों पर लेखन करते रहते हैं तथा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.

