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बहुत व्‍यस्‍त हो गए हो यशवंत

भूपेंद्र यदि भारतीय प्रशासनिक सेवा में होता तो रिटायरमेन्ट सम्बन्धी कागजात बनवाना शुरू कर देता, ताकि सेवानिवृत्ति के उपरान्त बाबुओं की गणेश परिक्रमा न करना पड़े। बहरहाल मैं क्यों बताऊँ कि मेरी उम्र क्या है। 37 वर्ष लेखन-पत्रकारिता के पूरे कर लिए हैं, लेकिन भड़ास के सीईओ से अधिक व्यस्त परसनालिटी से आज तक कभी पाला नहीं पड़ा। जी हाँ भाइयों और बहनों! यदि मैं कभी-कभार इस व्यवस्ततम व्यक्ति के पोर्टल पर प्रकाशनार्थ लेखादि भेजता हूँ तो उन्हें तरजीह न देकर ‘डिलिट’ कर दिया जाता है। आप बताओ मैं इस उम्र में नामचीन बनने की कोशिश कर रहा हूँ और उसके लिए यशवन्त का लोकप्रिय-चर्चित पोर्टल का चयन किया तो क्या बुरा किया? माना कि ‘भड़ास’ में नामचीन से लेकर अभिनव लेखक-पत्रकारों को स्थान मिलता है, बावजूद इसके मेरे आलेखों के प्रकाशन पर पाबन्दी क्यों लगाई गई है, मुझे स्वयं आश्चर्य होता है। साथ ही रेनबो न्यूज की एडिटर मेरी दोस्त रीता विश्वकर्मा को भी इस बात का दुःख होता है कि भेजे गए मेरे आलेखों का प्रकाशन क्यों नहीं किया जाता है?

भूपेंद्र यदि भारतीय प्रशासनिक सेवा में होता तो रिटायरमेन्ट सम्बन्धी कागजात बनवाना शुरू कर देता, ताकि सेवानिवृत्ति के उपरान्त बाबुओं की गणेश परिक्रमा न करना पड़े। बहरहाल मैं क्यों बताऊँ कि मेरी उम्र क्या है। 37 वर्ष लेखन-पत्रकारिता के पूरे कर लिए हैं, लेकिन भड़ास के सीईओ से अधिक व्यस्त परसनालिटी से आज तक कभी पाला नहीं पड़ा। जी हाँ भाइयों और बहनों! यदि मैं कभी-कभार इस व्यवस्ततम व्यक्ति के पोर्टल पर प्रकाशनार्थ लेखादि भेजता हूँ तो उन्हें तरजीह न देकर ‘डिलिट’ कर दिया जाता है। आप बताओ मैं इस उम्र में नामचीन बनने की कोशिश कर रहा हूँ और उसके लिए यशवन्त का लोकप्रिय-चर्चित पोर्टल का चयन किया तो क्या बुरा किया? माना कि ‘भड़ास’ में नामचीन से लेकर अभिनव लेखक-पत्रकारों को स्थान मिलता है, बावजूद इसके मेरे आलेखों के प्रकाशन पर पाबन्दी क्यों लगाई गई है, मुझे स्वयं आश्चर्य होता है। साथ ही रेनबो न्यूज की एडिटर मेरी दोस्त रीता विश्वकर्मा को भी इस बात का दुःख होता है कि भेजे गए मेरे आलेखों का प्रकाशन क्यों नहीं किया जाता है?

क्या मेरे आलेख स्तरहीन हैं और पोर्टल का टीआरपी (एलेक्‍सा रेटिंग) बढ़ाने में सक्षम नहीं हैं? भइया और बहिन जी आप लोगों को बता दूँ कि मैं विशुद्ध देहाती हूँ। हाँ यह बात दीगर है कि उच्च शिक्षा बड़े शहरों में हुई। यह बात अब 40 वर्ष पुरानी होने को है। आप क्या करोगे जानकर, ज्यादा लिख दूँगा तो आप पढ़ोगे ही नहीं (यदि यशवन्त ने छाप दिया तो…) और कहीं पढ़ लिए तो भड़ास के सीईओ को फोन करके यह कहोगे कि आइन्दा ऊल-जुलूल आलेखों का प्रकाशन न किया जाए वर्ना पोर्टल की टीआरपी पर कुअसर पड़ेगा।

मुझे बताया गया है कि यशवन्त के पोर्टल पर सचित्र छपने के लिए लेखक-पत्रकारों की भीड़ लम्बी रहती है। क्षमा चाहूँगा तिल का ताड़ करने में मीडिया की भूमिका अहम रहती है। नारद जी को ही देख लिया जाए वह ‘आल इन वन’ वेशभूषा में दिखते हैं। टीवी, पोर्टल से लेकर सब कुछ उनके शरीर पर रहता है। लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के आर्केस्ट्रा के कुछ वाद्ययन्त्र भी उनके साथ होते हैं, जैसे अमर अकबर एन्थनी में विनोद खन्ना ने अमर अकबर एन्थनी गीत के समय ले रखा था।

यशवन्त इतना बिजी रहते हैं- मुझे तो फिक्र होने लगी है तब क्या होगा उनका जो इन पर आश्रित हैं। हमारा क्या मैं भौंरा बेइमान… कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल पर या फिर दलबदलू नेता, अवसरवादी श्वेत वसनधारी या फिर थाली का बैंगन बन जाऊँगा। कसम है ऊपर वाले की मेरी यशवन्त से कभी भेंट-मुलाकात नहीं हुई। कहाँ वह और कहाँ मैं। वह तो राजा भोज और मुझ जैसे कलमकार गंगू तेली। यदि वह शादीशुदा है तो धन्य है वह नारी जो यशवन्त की धर्मपत्नी है, उसकी प्रतीक्षा में ही अपना अमूल्य समय काटती होगी। धन्य हैं वे किड्स जो अपने ‘पापा’ की गोद में खेलने को तरसते होंगे। यह तो उसकी ‘परसनल लाइफ’ है, सभी ने ‘एडजस्ट’ किया होगा।

जब पत्नी बच्चों के लिए ‘टाइम’ नहीं यशवन्त मियाँ के पास तो मुझ जैसे गँवई लेखकों-पत्रकारों को उधर ज्यादा सोचना ही नहीं चाहिए। नया साल लग गया है। मैं तो चाहूँगा कि ‘यशवन्त’ मीडिया जगत का बेताज बादशाह बन जाए, उससे मिलने के लिए दो-चार माह पूर्व ‘एप्वाइन्टमेन्ट’ लेना पड़े। उसके पीए की खुशामद करनी पड़े। डियर यशवन्त मीडिया एक ऐसा स्तम्भ है जिसकी कद्र सभी करते हैं। धन्ना सेठों की तरह मत बन जाना। मैंने देखा है कि मीडिया से सम्बद्ध उन लोगों को जो सेठों के संस्थानों में लाखों के पैकेज पर काम करते है, ओहदा अच्छा होता है, लेकिन अपवादों को छोड़कर वे ‘प्राउडी’ होते हैं।

कितने नाम गिनाऊँ। नवनीत लेपन करके कोई चीफ एडिटर या फिर अन्य कोई कथित बड़ा ओहदा जिस पर विराजमान लोगों के पास चले जावो तो लगता है कि किसी ‘शहंशाह’ के चैम्बर में आ गए हैं। कहीं गलती से सेवा करने की अर्जी दे दिया तो उत्तर मिलेगा कि पीएम, सीएम या किसी बड़े लीडर से सिफारिश पत्र लिखवाकर लाओ। तात्पर्य यह कि तुम भी अपने पोर्टल के सीईओ हो यदि गलती से यह भ्रम पाल लिए हो कि तुम्हारा पोर्टल विश्व का नम्बर वन है और तुम मुझ जैसों को ऐरा-गैरा, नत्थू खैरा समझने लगोगे तो बस उसी दिन से पराभव शुरू। ‘बिजी विदाउट बिजनेस’ का प्रदर्शन उससे किया जाता है जो ‘गुड फॉर नथिंग’ हो। लेखक-संपादक-पत्रकार एक दूसरे के पूरक हैं। हमेशा ध्यान देना वर्ना ‘प्राउडी’ लोगों की तरह बिहैव मत करना।

बस डियर! मेरे पूर्व में प्रेषित आलेखों पर दृष्टिपात कर डालो और तब जैसा चाहो वैसा करो। नया साल ढेरों खुशियाँ लाए। मौज करो-मस्त रहो। कलमकारों की भावनाओं की कद्र करो। चमचों से होशियार रहो, ठकुर सुहाती से दूर रहने वाला व्यक्ति सदा दीर्घायु (हर क्षेत्र में) होता है। स्वस्थ रहो, प्रसन्न रहो यदि इसको स्थान मिला तो समझूँगा कि ‘भड़ास’ निकालने में सुख की प्राप्ति होती है।

लेखक भूपेन्‍द्र सिंह गर्गवंशी अम्‍बेडकरनगर के निवासी तथा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ये अपने बेबाक लेखों के लिए जाने जाते हैं.

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