मीडिया के चूल्हे पर दलाली की रोटी। साल 2010 इस रोटी के साथ सत्ता की दलाली के बटर का स्वाद चखता रहा। हां इसने दलाली के कुछ पर्यायवाचियों के पेट का हाजमा जरूर खराब कर दिया। कहा जाए तो ये साल सत्ता की सबसे बड़ी दलाली की नई इबारत लिख गया। कुछ चेहरे जो टीवी स्क्रीन पर देश को ज्ञान बांटते थे। अखबारों-पत्रिकाओं में अपनी कलम का जादू बिखरते। लोकतंत्र में मीडिया की किरकिरी करा दी। साल 2010 इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। पर अपने आगे के वक्त के लिए छोड़ दिए काली स्याही से लिखे शब्द दलाली, धंधा और मीडिया। इस पर कई लेख लिखे गए। मीडिया के धुरंधरों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के दामन पर लगे दागों को धुलने की कोशिश की। मीडिया के खाते में आई कई कामयाबियों का जिक्र किया। पर कुछ कामयाबियों का जिक्र करना भूल गए। बस सब अपने आपको पाक साफ बताने में जुटे रहे। उन्होंने इस पर एक बार भी प्रकाश नहीं डाला कि चैनलों के अंदरखाने क्या होता है? खबरों के लिए क्या-क्या खेल पर्दे के पीछे खेले जातें है? शायद ये बात मीडिया के धुरंधर बताना भूल गए।
देश में बढ़ते चैनलों की होड़, देश के लिए फायदेमंद हैं या फिर नुकसानदायक? शायद इस पर एक दो महारथियों को छोड़ किसी ने बहस करना मुनासिब नहीं समझा। देश में पांच सौ से ज्यादा चैनल ऑन एयर हैं। कुछ पर ताला भी लटक गया है तो कुछ घिसट-घिसट कर चल रहे हैं। इन्हें मुनाफे के टॉनिक की जरुरत है। ये टॉनिक इन्हें कहां से मिलेगा? नेताओं से? मीडिया के दलालों से? या फिर कहीं और से? सवाल ये भी अहम है। देश में जो चैनल करोड़ों रूपए खर्च कर खोल रहा है। ये समाचार उपभोक्ताओं की कसौटी पर कितना भरोसेमंद साबित होंगे। सवाल ये भी अहम है? या फिर जो चैनल पहले से चल रहे हैं। वे कितना अपने आपको भरोसे लायक बना पाए हैं? ये सवाल भी अहम है। एक सवाल और भी है। जितनी तेजी से इलेक्ट्रानिक मीडिया का प्रसार हो रहा है। प्रिंट मीडिया भी उतनी ही तेजी से अपने पैर पसार रहा है। ऐसी दुकानें खुलने के बाद कितने दिन चलेंगी। ऐसी दुकानों के लिए पैसा कहां से आएगा? कहना मुश्किल हैं। पर इसका जवाब सभी के पास होगा?
आज देश का साक्षर तबका न्यूज़ चैनलों और अखबरों के जरिए देश-विदेश की हलचलों, खबरों से रूबरु होता है। पर जब प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में पत्रकारों की दलाली की खबरें छपती हैं। पत्रकार उनकी नजर में एक दल्ला के समान हो गया है। ट्रेन, बस या फिर विमान में सफर कर रहे हों। पास वाला पूछने लगे भाई क्या करते हो? आपने कह दिया पत्रकार हूं। खबरों से दिन की शुरुआत होती है, खबरों से ही दिन का अंत। पास वाले के मुंह से फौरन ही निकल जाएगा। अच्छा तो तुम भी दलाली वाली जमात में शामिल हो? क्या कहोगे आप? सिवाए अपनी सफाई देने के। राडिया के खेल में कुछ काबिल पत्रकार शामिल थे। इन काबिलों ने समाचार उपभोक्ता की नजर में हमारी एक और जाति बना दी। पत्रकार की जात। अब पत्रकार अपने उपभोक्ताओं को कैसे समझाए कि भइया सब एक जैसे नहीं होते। कुछ अच्छे लोग भी हैं, जो अपनी भूमिका को भलीभांति निभा कर रहे हैं। हां ये जरुर है कि जितने की जरुरत है, उतना नहीं कर रहे हैं। जहां तक हठ, दुराग्रह और प्रसिद्धि की बात है। मीडिया को इससे निकलने में कई साल लगेंगे।
हां आज की माडिया टीआरपी की होड़ के बीच फंसा रह गया है। इसके चलते मीडिया का चेहरा कैसा हो? समझना मुश्किल है। पत्रकार अपने बॉस के विरोधाभासी अपेक्षाओं में उलझा हुआ है कि वो ऐसा क्या दे। जिससे बॉस और चैनल का भला हो। चैनल पर चलाने के लिए जब कुछ नहीं होता तो फिर एंकर जज की भूमिका में आ ही जाएगा। इंडिया टीवी इसका सबसे बड़ा उदारहण है। सतही और साक्ष्यहीन खबरों को चलाने के मामले में इंडिया टीवी नंबर वन के पायदान पर खड़ा है। यहां खबरें तथ्यहीन तो हैं ही, साक्ष्यहीन भी हैं। जो सच के आगे घुटने टेक देतीं हैं। मीडिया को सच्चाई का आइना माना गया है। लेकिन लगता है आज इनसे सच्चाई कोसों दूर हो गई है। कुछ पत्रकार अपने जान पर खेलकर वाकई खबर निकालते हैं। बिना पक्षपात और डर के सच्चाई को दुनिया के सामने रखते हैं। पर पत्रकारों की कितनी पूछ होती है? उनसे पूछो तो जवाब आपको मिल जाएगा। राज्य सरकारें उन पर इतने मुकदमें लाद देती है कि जिस चैनल या अखबार के लिए वो खबरें निकाते हैं? वो खुद पीठ घुमा लेता है? लगता है आज मीडिया कॉरपोरेट और राजनीति हितों की ही पूर्ति कर रही है। इस पर चाहे कितने भी प्रवचन हो जाए। कितनी भी बहस हो जाए। लेकिन सच्चाई क्या है ये मीडिया में काम करने वाला हर पत्रकार जानता है कि विश्वसनीयता की खाई पाटने में कितना ही प्रयास क्यों ना करें? खाई भरना बहुत मुश्किल है?
लेखक सुरेश गंगवार पत्रकार हैं.

