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यह सब अजीब सा लगता है

जब कभी हमारे परिवार में कोई परेशानी आती है तो हम एड़ी-चोटी लगा कर उसको दूर कर देते हैं, परन्तु आज हमें क्या हो गया, कुछ लोग हमारे घर में घुस कर हमारे बच्चों को, परिवार के सदस्यों को कुचल रहे है और हम हाथ पर हाथ रखे सुस्ता रहे हैं! क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है. एक साम्यवादी देश हमारी देश की आर्थिक स्थिति का बाजा बजाने पर तुला हुआ है और कामयाब भी हो रहा है! उसके बनाये खिलौने, दूध, दिवाली और ईद पर झिलमिल करने वाली रोशनी हो या मोबाइल सब अव्‍वल दर्जे का घटिया सामान वह बड़ी आसानी से बेच रहा है और हमारे श्रमिक बेरोजगार हो रहे हैं. मतलब हम दोहरी तलवार से काटे जा रहे हैं, एक तरफ तो हमारे लोग बेरोजगार हो रहे हैं, दूसरे हमारी आर्थिक नीतियों का सत्यानाश हो रहा है. एक तो कड़वा करेला दूजा नीम चढ़ा. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है.

जब कभी हमारे परिवार में कोई परेशानी आती है तो हम एड़ी-चोटी लगा कर उसको दूर कर देते हैं, परन्तु आज हमें क्या हो गया, कुछ लोग हमारे घर में घुस कर हमारे बच्चों को, परिवार के सदस्यों को कुचल रहे है और हम हाथ पर हाथ रखे सुस्ता रहे हैं! क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है. एक साम्यवादी देश हमारी देश की आर्थिक स्थिति का बाजा बजाने पर तुला हुआ है और कामयाब भी हो रहा है! उसके बनाये खिलौने, दूध, दिवाली और ईद पर झिलमिल करने वाली रोशनी हो या मोबाइल सब अव्‍वल दर्जे का घटिया सामान वह बड़ी आसानी से बेच रहा है और हमारे श्रमिक बेरोजगार हो रहे हैं. मतलब हम दोहरी तलवार से काटे जा रहे हैं, एक तरफ तो हमारे लोग बेरोजगार हो रहे हैं, दूसरे हमारी आर्थिक नीतियों का सत्यानाश हो रहा है. एक तो कड़वा करेला दूजा नीम चढ़ा. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है.

भारत की संसद पर हमला करने वाला अफजल हो या नौटंकी करने वाला कसाब, ये दोनों हमारे संविधान का मजाक उड़ा सकते हैं, लेकिन हम इनको फाँसी नहीं दे सकते. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है. विश्व मानकों की कसौटी पर खरा उतरने पर ही सामान ख़रीदा जाए, ऐसे नियम अंतर्राष्ट्रीय कानून के दायरे में आते है, लेकिन हम आज कुछ देशों से घटिया सामान ना जाने किस दबाब में लेते जा रहे हैं. जबकि अमेरिका कद्दू भी इन मानकों के आधार पर खरीदता है. क्या हम इतने कमजोर हो गए है! क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है. हमारा युवा अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन में पिटता रहे पर हम और हमारी सरकार कान में तेल डाल अपने मानव संसाधन को पिटने और देश छोड़ कर जाने से नहीं रोक सकते, क्योकि उनके लिए यहाँ सही रोज़गार नहीं. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है.

होटलों में, माफ़ कीजियेगा पांच सितारा होटलों में आम लोगों और किसानों के लिए बनाईं गईं योजनाओं का लोकार्पण किया जाता है, जिनका बजट 4 से 5 लाख रूपये होता है. वहां मेरी बिरादरी में से कुछ लोग तो केवल लाल पानी, कुकीज और मुर्गे की टांग खाने के लिए जाते है, उनका बड़ा सम्मान होता है और तो और तोहफे भी दिए जाते हैं, जिसका बजट अलग से पास किया जाता है. परन्तु देश की सरहद की और आतंरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले एक सिपाही को प्रतिमाह 10000-20000 से ज्यादा नहीं दे सकते,  उनके लिए बजट नहीं ला सकते. क्या हम कुछ नहीं कर सकते? अजीब सा लगता है.

ऐसा क्या क्या है जो हम नहीं कर सकते जरा गौरफरमाएं-

हम तकनीकी तौर पर मजबूत होते हुए भी आईटी में नंबर एक नहीं हो सकते, क्योकि सत्यम घोटाला, सुखराम का टेलीफ़ोन घोटाला भी तो हमने ही किया है.

कृषि प्रधान देश होते हुए भी हम नंबर एक नहीं हो सकते, ना ही किसानों के लिए बढ़िया योजनाएं ला सकते हैं और ना ही हम पशुधन में वृद्धि कर सकते. चारा घोटाला कौन करेगा.

हम सुरक्षा कर्मियों की शहादत को भूल सकते है, पर उनके परिवारों की जिम्मेदारी नहीं ले सकते. बोफोर्स घोटाला और ताबूत घोटाला कौन करेगा.
हम किसी आतंकी देश या व्यक्ति को मुंहतोड़ जबाब नहीं दे सकते.

हम एक मंच पर समस्त भारतीयों को नहीं ला सकते.

हम (मेरे सहित) गाल बजा सकते हैं, लिख सकते हैं पर कुछ कर नहीं सकते.

हम शिक्षा का स्तर नहीं सुधार सकते.

हम कश्मीर, अरुणाचल को अपना राज्य नहीं कह सकते. चाइना और पाक से हमको डर लगता है जी, दिल तो बच्चा है जी.

हम भारतीय नहीं कहलवा सकते शर्म आती है.

हम रोजगार नहीं दे सकते.

हम सत्यता को नहीं मान सकते.

हम किसी को अब गले नहीं लगा सकते.

ऐसे ही ना जाने कितनी बातें हम नहीं कर सकते, पर कुछ तो होगा जो हम कर सकते हैं?

हम अमेरिका के तलुए चाट सकते हैं, अपने रिश्ते और भी मजबूत कर सकते हैं, भले ही कोई गाँधी जी की समाधि पर कुत्ता घुमाये.

पड़ोसी से वार्ता कर सकते हैं, उसको बेवजह झुक कर सलाम कर सकते हैं, ताजमहल घूमने के लिए बुला सकते हैं.

बोफोर्स, ताबूत घोटाला कर सकते हैं.

विदेशी बैंकों में कला धन जमा कर सकते हैं.

हम गाँधी जी के अलावा बाकी सब क्रांतिकारियों को भूल सकते हैं और गाँधी परिवार की जयंती और मरण दिवस मना सकते हैं.

भाषा के नाम पर, हिंदुत्व के नाम पर लोगों का गला काट सकते हैं, हम बिहारी बन सकते हैं, मद्रासी बन सकते हैं, हम मराठी हैं, उत्तर भारतीय बन सकते हैं.

कश्मीर में घुसपैंठ करने दे सकते हैं.

मजदूरों को मजदूर बना रहने दे सकते हैं.

अधिकारी या नेता की कुर्सी पर बैठ कर किसी भी लड़की को रुचिका, मधुमिता बना सकते हैं.

किसी भी भारतीय का अंग किसी विदेशी खलीफा की बेच सकते हैं.

यहाँ तक कि हम कुछ पैसों के लिए अपनी कलम (आज जो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कर रहा है) को भी बेच सकते हैं. अब हमारा मूल्य कोई भी लगा सकता है.

सवाल बस यही कि हम क्या कर सकते है और क्या नहीं कर सकते, आखिर हम कितने पानी में हैं, यह सोचना जरूरी है, कुछ करना जरूरी है, वरना खड़े-खड़े तमाशा देखते-देखते खुद तमाशा बन जायेंगे. इस पर नवाब देवबंद जी का शेर बिल्‍कुल उपयुक्‍त बैठता है –

सितमगर वक्त का तेवर बदल जाये तो क्या होगा!
मेरा सर और तेरा पत्थर बदल जाये तो क्या होगा !!

कुछ तो शर्म करो इस देश का नमक खाने वाले बेशर्मों …कब तक इस देश का खाकर पाकिस्तान के गुण गाते हो, क्या अब फिर एक बार किसी नए क्रांति को जन्म देने का इरादा है, जो शांति के लिये युद्ध लड़ा जाएगा.

लेखक प्रकाश चंद पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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