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कारपोरेट से दया की भीख, हाय! लोकतंत्र के विधाता

तो भारतीय जन को अब दान-दया का मोहताज रहना पड़ेगा? लोकतंत्र में लोक के धन पर काबिज, मौज मस्ती उड़ाते दलीय रजवाड़े, कारपोरेट बांकुरे और शाही नौकर इतने मजबूत हो चुके हैं कि राजा और सामंत का जमाना फेल हो गया है। सरकार चाहती है कि अरबों-खरबों का वारा-न्यारा करने वाले दिखावे भर के लिए ही सही अपनी टेंट से सौ पचास रुपये दान-दया के तहत सेवा भाव से खर्च कर दें। हमारी सरकार के प्रमुख दल की प्रमुख ने हाल ही में एक प्रमुख राष्ट्रीय अखबार के प्रमुख कालम में मुखरता से इसकी वकालत की है। साथ ही भारतीय अस्मिता, परंपरा से इसका उदाहरण भी दिया है। ऊपर से अब भी ना समझने वाले धन कुबेरों को सामाजिक विषमता से आपराधिक और अराजक गतिविधियों में उछाल आने की चेतावनी भी दी है।

तो भारतीय जन को अब दान-दया का मोहताज रहना पड़ेगा? लोकतंत्र में लोक के धन पर काबिज, मौज मस्ती उड़ाते दलीय रजवाड़े, कारपोरेट बांकुरे और शाही नौकर इतने मजबूत हो चुके हैं कि राजा और सामंत का जमाना फेल हो गया है। सरकार चाहती है कि अरबों-खरबों का वारा-न्यारा करने वाले दिखावे भर के लिए ही सही अपनी टेंट से सौ पचास रुपये दान-दया के तहत सेवा भाव से खर्च कर दें। हमारी सरकार के प्रमुख दल की प्रमुख ने हाल ही में एक प्रमुख राष्ट्रीय अखबार के प्रमुख कालम में मुखरता से इसकी वकालत की है। साथ ही भारतीय अस्मिता, परंपरा से इसका उदाहरण भी दिया है। ऊपर से अब भी ना समझने वाले धन कुबेरों को सामाजिक विषमता से आपराधिक और अराजक गतिविधियों में उछाल आने की चेतावनी भी दी है।

इतना सहृदय, दयालुता और व्याकुलता दर्शाता सुझाव भी हृदय पर एक घाव सा कर गया है। उस पर नमक छिड़कती सरकार के बेहयापन के सारे रिकार्ड तोड़ महंगाई से कराहती जनता को संदेश दे रही है कि कीमतों पर काबू पाना उसके बस में नहीं रहा। इसी से मिलते जुलते बयान हाल ही भ्रष्टाचार पर काबूक पाने, अक्षम प्रशासनिक मशीनरी को संभाले जाने, अपराध के बढ़ते ग्राफ, वित्तीय मामलों में अनियंत्रित नैतिकता ढूढ़ते सामाजिक संबंधों पर भी सुनने को मिलते रहे हैं। हालत यह है कि एक चालाक कोशिश हर मसले का आरोप आमजन पर थोपने की होने लगी है। कहते हैं कि लोग ही भ्रष्ट हो गए हैं, फलां है या अलावा है। घटियापन की पराकाष्ठा भी शरमा जाएगी। अरे भई आदमी की अनैतिक प्रवृत्तियों के मद्देनजर ही सरकार, प्रशासन, संविधान व नियम कानून, की जरूरत समाज को पड़ी और एक व्यवस्था कायम हुई। जिसका स्वरूप आज इतना व्यापक हो गया है कि जीवन के लगभग हर पहलू पर सरकारी हस्तक्षेप देखा जा सकता है। जन्म, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, व्यापार, व्यवहार, परिवार, समाज, शादी, तलाक, बुढ़ापा जीवन-यापन और मृत्यु तक में उसकी भूमिका हर जगह नजर आएगी।

दरअसल भारतीय समाज की अपनी जो व्यवस्था रही है उसमें आधुनिक विदेशी तरीके के लोकतंत्र ने बेरहम घुसपैठ करते हुए उसके अधिकारों तौर तरीकों पर कब्जा कर लिया है। भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा देने मे इस गतिविधि का प्रमुख रोल रहा है। सरकार नाम की इस संस्था ने अपने समाज के हर पक्ष को हस्तगत करने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी है। हर काम के लिए सरकार, दफ्तर, कोर्ट कचहरी, पुलिस, नेता, अधिकारियों का मुंह जोहने के लिए आम जन को बाध्य कर दिया। नतीजा, नौकर मालिक से भी ऊपर हो गया। कोढ़ में खाज यह कि इससे कोई भी काम नहीं संभलता और हर चीज की जिम्‍मेवारी अपने सर कर ली है। हालत यह है कि विभाग गिरोह की तरह काम करते नजर आते हैं। यह आम जन के सारे संसाधन, अधिकार व मूल्य अपने कब्जे में लेकर सबका सुख चैन हराम करने पर तुले हैं। सरकार और समाज के इस द्वंद पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में आगे चर्चा होगी।

फिलहाल हम पूछते हैं कि जब तुम्हारा किसी चीज पर नियंत्रण नहीं रहा तो सिंहासन खाली करो। इस अवसरवादी कथित सरकार को तत्काल इस्तीफा देना चाहिए। जनता ने जिसे शासन के लिए चुना, सारे अधिकार सौंपे पूरा तंत्र दिया उसके बाद वह काम न कर पाए तो किस बात की सरकार? बेहतर होगा वह तत्काल हट जाए। व्यर्थ की बयानबाजी और विपक्ष के साथ नूरा कुश्ती का प्रदर्शन भी बंद करे। मीडिया की मंचगत बकवाद से बहता मवाद भी लोगों मे घिन पैदा करने लगा है। दलीय महारथियों पर आम जन का भरोसा खत्म है। इसीसे राजनीतिक दल चाहकर भी आम जन के आंतरिक उबाल को प्रदर्शन, धरना व व्यापक  विरोध प्रदर्शन में बदलने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। बाढ़ में फंसे लोग मछली उड़ा रहे हैं जैसे लल्लू बयान कि लोगों की आमदनी बढ़ रही है, नमक छिड़कने भी नहीं नमक रगडऩे बराबर तकलीफ देने वाले बयान हैं। इन शब्दों पर तो इच्छा होती है कि पूछें, ‘तुम्‍हारी इतनी हिम्मत?’ जनता के धन पर ऐश करते करते खुद को मालिक समझने वाले इतने मगरूर हो गए हैं कि लोकतंत्र के मालिक लोक को मरने की स्थिति में छोड़ उसकी खिल्ली उड़ाने लगे हैं। जनता की सेवा के लिए पोषित तंत्र अपने ही पोषण में मगन है।

दूसरी तरफ कारपोरेट सेक्टर करोड़ों अरबों का खुला खेल जनता के सामने परोस कर अपने ऐशपरस्ती का घृणित नजारा पेश कर रहा है। जिस देश की दो तिहाई जनता 20 रुपये रोज पर गुजारा करने को बाध्य हो वहां करोड़ों की बोली लगाकर खिलाड़ी खरीदने बेचने का तमाशा इस कदर कुंठा और रोब भर देगा कि सड़क पर भीड़तंत्र का मजा जल्दी ही देखने को मिलेगा। जिसका भय व्यक्त किया जा रहा है। हाल ही कुछ घटनाएं इस दिशा में संकेत भी करती हैं। अक्सर छोटी-मोटी घटनाओं के लिए पुलिस व प्रशासन का सहयोग लेने में लोग हिचकने लगे हैं। कई जगह तो खुद ही चोर उचक्कों से निपटने, पीटकर मार डालने जैसी घटनाएं सामने आने लगी हैं। यह एकाध बार नहीं, अक्सर देखने में आने लगा है।
अपराध व सफेदपोश मामलों में तो खुल्लम खुल्ला खेल चलने लगा है।

आम लोग सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं। दिन दहाड़े, राह चलते, सरे बाजार लूटपाट, वसूली आदि रोजमर्रा की बातें हो गयी हैं। चोर की बजाय शिकार व्यक्ति को परेशान करने का पुलिसिया रवैया चुगली खाता है कि अपराधियों से गठजोड़ काफी मजबूत हो गया है। वित्तीय अनियिमितताओं, कंपनी, शेयर, इंश्योरेंश, हेल्थ स्कीम आदि जाने कई मामलों में तो जनता का धन समेट चंपत हो जाना आम हो गया है। सरकारी योजनाएं धन लूटने की नहरें बन गयी हैं। अधिकारी, ठेकेदार, एनजीओ सेक्टर बेहद सफाई से योजनाओं के सहारे सरकारी खजाने में जमा जनता का धन हस्तगत करने में लगे हैं। भयानक स्थिति यह है कि 50 रुपये का खर्च, 5,000 रुपये बनाने में एनजीओ ने महारत हासिल कर ली है। कॉमनवेल्थ गेम्‍स का कुल 567 करोड़ का आरंभिक बजट गोलमोल कर लाख करोड़ से ज्यादा रकम को चपेट गया तो लोग आंख मलना भूल गये हैं। फटी आंखों से जनता मुंह बिदोरे कोस रही है। इस नजारे से शह पाकर छोटे व्यापारी, दुकानदार, सब्जी वाले, रिक्शा, टेंपो, ट्रक, बस वाले अपने-अपने हिसाब से तीन तेरह में लग चुके हैं। सो चलनी डांटे सूप को की स्थिति में कौन किस पर नियंत्रण करेगा।

अब तो स्थिति यह है कि घोटालों व भ्रष्टाचार के खुलासो पर चौंकना तो दूर, अभियुक्त बेहद मस्त, विजयी भाव से आरोप-प्रत्यारोप का चक्र चलाकर दुनिया भर में विचरते रहते हैं और जनता मानकर चलती है, यही जग की रीत है। अरे भाई, रोज सबको कहीं न कहीं सरकार या सरकारी कार्यालय से साबका पड़ता है और बगैर लिये- दिये काम नहीं होता तो कौन नहीं जानता कि कहां क्या हो रहा है? यह सार्वभौमिक जानकारी ही माहौल में इतनी विरक्ति पैदा कर रही है कि समाज में नैतिकता के मानदंड ध्वस्त हो रहे हैं। हजारों वर्षों से मानवीय व्यवहार में परिमार्जन के बाद कायम मूल्यों व मानदंडों को ढहाने में लगे कथित लोकतांत्रिक व्यवस्था के पहरूओं की मुश्कें कसनी जरूरी है। जो लोकतंत्र की आड़ में धनतंत्र कायम करने पर लगे हों, इन्हें समाज, संस्कृति, संस्कार, आचार-विचार, व्यवहार, न्याय, अन्याय आदि से कोई मतलब नहीं है। वह हर आयाम को पैसे से तौल देते हैं।

ऐसे लोग जब सत्ता पर काबिज हो जाएं तो कैसा संसार बनेगा यह अब दिखने लगा है। विपदाग्रस्त समाज कितना, आश्रित सा नजर आने लगा है। परजीवियों का प्रतिशत कितना बढ़ गया है, जरा अपने आसपास देखिए हर धंधे में दलालों, सलाहकारों, मध्यस्थतों, लॉबिस्टों, शेयर बाजारियों, वायदा कारोबारियों, सट्टेबाजों का बोलवाला है। जो इन तौर तरीकों में से बैठे बिठाये कमाने उड़ाने का खेल करने में सक्षम नहीं हैं, वह भी कम से कम काम कर ज्यादा से कमाने के दाव में लगे रहते हैं। ठेका, परमिट, राशन कार्ड, पासपोर्ट, लाइसेंस आदि के काम में विभागीय अधिकारी, कर्मचारी भरे होने के बावजूद दलालों की फौज आपको घूमती नजर आएगी।

जिस देश में करोड़ों लोग मूलभूत साधन सुविधाओं से वंचित हो वहां सात सितारा, पांच सितारा, तीन सितारा किस्म के प्रपंची साधन सुविधाओं का स्तर या श्रेणी बनाना और उसका भोग उपयोग प्रोत्साहित करना अन्याय ही नहीं पाप की श्रेणी में आता है। ऐश परस्ती के बेहूदा सरअंजामों से भरपूर इन साजों सामानों, होटलों आदि का प्रदर्शन पूरे समाज में कितनी कुंठा, कुत्सा और उत्तेजना भर रहा है, इसका अहसास किसी तरह पैसे कमा कर चकाचौंध में उड़ाने को आतुर युवाओं की फौज से जाहिर हो रहा है। हालत बेहिचक आपराधिक वारदातों में शामिल होने तक पहुंच गयी है। सफेदपोश वित्तीय अनियमित्तताओं को बरतने में तो कोई चूकता ही नहीं है। धन का इस्तेमाल कोई मतलब नहीं, अब सभी कमाने-फेंकने में रूचि रखते हैं। जब तक इस देश समाज के बच्चे-बच्चे तक मौलिक सुख सुविधाएं न पहुंच जाए किसी नेता, अधिकारी, व्यापारी को व्यर्थ के खर्चे से क्यों नहीं रोका जाए? ज्यादा से ज्यादा दो स्तरों की व्यवस्था हो। एक सामान्य और एक अच्छा इससे ज्यादा कुछ नहीं।

हमें किसी भी काम को खर्चीला बनाने के तौर तरीकों पर रोक लगाने में अब देर नहीं करनी चाहिए। मात्र सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने से देश का भला नहीं होगा। मात्र एक प्रतिशत है वो, इतना ही नहीं समृद्ध परिवार भी 4-6 प्रतिशत होंगे। शेष 80-90 प्रतिशत तक जनता वेतनमानों के बढऩे से कुलांचे मारने वाली महंगाई के उछाल से ज्यादा और नीचे पटक दी जाती है।

बहरहाल, बेहद सीधी बात यह कि हमारी जनता को दान और दया पर जीने के मार्ग पर धकेलना बर्दाश्त नहीं है। क्योंकि इन दोनों के लिए कमजोर लोगों की जरूरत होती है। इससे लोगों को चूस-लूट कर कमजोर करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसमें उसी के धन, संसाधनों, अधिकारों, पदों तंत्र आदि का इस्तेमाल, चंद लोग अपनी उपलब्धियों हेतु और शेष को कमजोर बनाने के लिए करती हैं। यह सब जारी है और हमारे शीर्ष पद धारी उनसे कमजोर जनता पर कृपा करने के लिए कहते हैं। धत्‍त हैं हमें, कौन कमजोर है? हम जनता की शक्ति को उभरने, इस्तेमाल होने देना नहीं चाहते हैं। सत्ता जनता की है, सत्ताधारी माली हैं मालिक नहीं। उसे चाहिए कि पूरे बाग का सजने संवरने खिलने बढऩे दे।

लेखक कुमार अमिताभ पत्रकार और फिल्‍मकार हैं.

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